श्रीसीताजी का यज्ञशाला में प्रवेश

सीताजी सखियों सहित यज्ञशाला में प्रवेश करती हैं। सभा में उपस्थित सभी जन उनके सौंदर्य, लज्जा और तेज से अभिभूत हो उठते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ४८ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

चलीं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी॥ सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी॥ १ ॥

अर्थ:

सयानी सखियाँ सीताजी को साथ लेकर मनोहर वाणी से गीत गाती हुई चलीं। सीताजी के नवल शरीर पर सुन्दर साड़ी सुशोभित है। जगज्जननी की महान्‌ छबि अतुलनीय है।

चौपाई

भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए॥ रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी॥ २ ॥

अर्थ:

सब आभूषण अपनी-अपनी जगह पर शोभित हैं, जिन्हें सखियों ने अंग-अंग में भलीभाँति सजाकर पहनाया है। जब सीताजी ने रंगभूमि में पैर रखा, तब उनका [दिव्य] रूप देखकर स्त्री-पुरुष--सभी मोहित हो गये।

चौपाई

हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि प्रसून अपछरा गाईं॥ पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला॥ ३ ॥

अर्थ:

देवताओं ने हर्षित होकर नगाड़े बजाये और पुष्प बरसाकर अप्सराएँ गाने लगीं। सीताजी के करकमलों में जयमाला सुशोभित है। सब राजा चकित होकर अचानक उनकी ओर देखने लगे।

चौपाई

सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा॥ मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई॥ ४ ॥

अर्थ:

सीताजी चकित चित्त से श्रीरामजी को देखने लगीं, तब सब राजालोग मोह के वश हो गये। सीताजी ने मुनि के पास [बैठे हुए] दोनों भाइयों को देखा तो उनके नेत्र अपना खजाना पाकर ललचाकर वहीं (श्रीरामजी में) जा लगे (स्थिर हो गये)।

दोहा

गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि। लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि॥ २४८ ॥

अर्थ:

परन्तु गुरुजनों की लाज से तथा बहुत बड़े समाज को देखकर सीताजी सकुचा गयीं। वे श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में लाकर सखियों की ओर देखने लगीं।

दोहा 249 के अंतर्गत
चौपाई

राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें॥ सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी का रूप और सीताजी की छबि देखकर स्त्री-पुरुषों ने पलक मारना छोड़ दिया (सब एकटक उन्हीं को देखने लगे)। सभी अपने मन में सोचते हैं, पर कहते सकुचाते हैं। मन-ही-मन वे विधाता से विनय करते हैं--

चौपाई

हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई॥ बिनु बिचार पनु तजि नरनाहू। सीय राम कर करै बिबाहू॥ २ ॥

अर्थ:

हे विधाता! जनक की जड़ताई शीघ्र हर लीजिये और हमारी ही ऐसी सुन्दर बुद्धि उन्हें दीजिये कि जिससे बिना ही विचार किये राजा अपना प्रण छोड़कर सीताजी का विवाह रामजी से कर दें।

चौपाई

जगु भल कहिहि भाव सब काहू। हठ कीन्हें अंतहुँ उर दाहू॥ एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू॥ ३ ॥

अर्थ:

संसार उन्हें भला कहेगा, क्योंकि यह बात सब किसी को अच्छी लगती है। हठ करने से अन्त में भी हृदय जलेगा। सब लोग इसी लालसा में मग्न हो रहे हैं कि जानकीजी के योग्य वर तो यह साँवला ही है।