श्रीसीताजी का यज्ञशाला में प्रवेश
सीताजी सखियों सहित यज्ञशाला में प्रवेश करती हैं। सभा में उपस्थित सभी जन उनके सौंदर्य, लज्जा और तेज से अभिभूत हो उठते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण ४८ / ५९
प्रकरण पाठ
सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा॥ मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई॥ ४ ॥
अर्थ:
सीताजी चकित चित्त से श्रीरामजी को देखने लगीं, तब सब राजालोग मोह के वश हो गये। सीताजी ने मुनि के पास [बैठे हुए] दोनों भाइयों को देखा तो उनके नेत्र अपना खजाना पाकर ललचाकर वहीं (श्रीरामजी में) जा लगे (स्थिर हो गये)।
राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें॥ सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी का रूप और सीताजी की छबि देखकर स्त्री-पुरुषों ने पलक मारना छोड़ दिया (सब एकटक उन्हीं को देखने लगे)। सभी अपने मन में सोचते हैं, पर कहते सकुचाते हैं। मन-ही-मन वे विधाता से विनय करते हैं--