तुलसीदासजी की दीनता और रामभक्तिमयी कविता की महिमा

तुलसीदासजी अपनी अल्पता और दीनता प्रकट करते हुए स्वीकार करते हैं कि यह कार्य केवल प्रभु-कृपा से संभव है। साथ ही वे रामभक्ति से ओतप्रोत कविता की पवित्रता और लोकमंगलकारी शक्ति का वर्णन करते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ७ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा॥ हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही॥ १ ॥

अर्थ:

किन्तु दुष्टों के परिहास से मेरा हित ही होगा। मधुर कण्ठवाली कोयल को कौए कठोर ही कहा करते हैं। जैसे बगुले, मेढक, चातकही को हँसते हैं, वैसे ही मलिन खल निर्मल बतकही को हँसते हैं।

चौपाई

कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू॥ भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी॥ २ ॥

अर्थ:

जो न तो कविता के रसिक हैं और न जिनका श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में प्रेम है, उनके लिए भी यह कविता सुखद हास्यरस का काम देगी। प्रथम तो यह भाषा की रचना है, दूसरे मेरी बुद्धि भोली है; इससे यह हँसने के योग्य ही है, हँसने में उन्हें कोई दोष नहीं।

चौपाई

प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागिहि फीकी॥ हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुबर की॥ ३ ॥

अर्थ:

जिन्हें न तो प्रभु के चरणों में प्रेम है और न अच्छी समझ ही है, उनको यह कथा सुनने में फीकी लगेगी। जिनकी श्रीहरि (भगवान् विष्णु) और श्रीहर (भगवान् शिव) के चरणों में प्रीति है और जिनकी बुद्धि कुतर्क करनेवाली नहीं है [जो श्रीहरि-हर में भेद की या ऊँच-नीच की कल्पना नहीं करते], उन्हें श्रीरघुनाथजी की यह कथा मीठी लगेगी।

चौपाई

राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी॥ कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू॥ ४ ॥

अर्थ:

सज्जनगण इस कथा को अपने जी में श्रीरामजी की भक्ति से भूषित जानकर सुन्दर वाणी से सराहते हुए सुनेंगे। मैं न तो कवि हूँ, न वाक्य-रचना में ही कुशल हूँ, मैं तो सब कलाओं तथा सब विद्याओं से रहित हूँ।

चौपाई

आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना॥ भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥ ५ ॥

अर्थ:

नाना प्रकार के अक्षर, अर्थ और अलंकार, अनेक प्रकार की छन्द-रचना, भावों और रसों के अपार भेद और कविताके भाँति-भाँति के गुण-दोष होते हैं।

चौपाई

कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरें॥ ६ ॥

अर्थ:

इनमें से काव्यसम्बन्धी एक भी बात का ज्ञान मुझमें नहीं है, यह मैं कोरे कागज पर लिखकर [शपथपूर्वक] सत्य-सत्य कहता हूँ।

दोहा

भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक। सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिबेक॥ ९ ॥

अर्थ:

मेरी रचना सब गुणों से रहित है; इसमें बस, जगत् प्रसिद्ध एक गुण है। उसे विचारकर अच्छी बुद्धिवाले पुरुष, जिनके निर्मल विवेक हैं, इसको सुनेंगे।

दोहा 10 के अंतर्गत
चौपाई

एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा॥ मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥ १ ॥

अर्थ:

इसमें श्रीरघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यन्त पवित्र है, वेद-पुराणों का सार है, कल्याण का भवन है और अमंगलों को हरनेवाला है, जिसे पार्वतीजी सहित भगवान्‌ शिवजी सदा जपा करते हैं।

चौपाई

भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ॥ बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोह न बसन बिना बर नारी॥ २ ॥

अर्थ:

जो अच्छे कवि के द्वारा रची हुई बड़ी अनूठी कविता है, वह भी राम नाम के बिना शोभा नहीं पाती। जैसे चन्द्रमा के समान मुखवाली सुन्दर स्त्री सब प्रकार से सुसज्जित होने पर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं देती।

चौपाई

सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी॥ सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही॥ ३ ॥

अर्थ:

इसके विपरीत, कुकवि की रची हुई सब गुणों से रहित कविता को भी, राम के नाम एवं यश से अंकित जानकर, बुद्धिमान् लोग आदरपूर्वक कहते और सुनते हैं; क्योंकि संतजन भौंरे की भाँति गुणही को ग्रहण करनेवाले होते हैं।

चौपाई

जदपि कबित रस एकउ नाहीं। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं॥ सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा॥ ४ ॥

अर्थ:

यद्यपि मेरी इस रचना में कविताका एक भी रस नहीं है, तथापि इसमें श्रीरामजी का प्रताप प्रकट है। मेरे मन में यही एक भरोसा है। भले संग से, किसने बड़प्पन नहीं पाया ?।

चौपाई

धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई॥ भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी॥ ५ ॥

अर्थ:

धुआँ भी अगर के संग से सुगन्धित होकर अपने स्वाभाविक कड़वेपन को छोड़ देता है। मेरी कविता अवश्य भद्दी है, परन्तु इसमें जगत् का कल्याण करनेवाली रामकथारूपी उत्तम वस्तु का वर्णन किया गया है। [इससे यह भी अच्छी ही समझी जायगी]।

छन्द

मंगल करनि कलिमलहरनि तुलसी कथा रघुनाथ की। गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥ प्रभुसुजस संगति भनिति भलिहोइहि सुजन मन भावनी। भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥

अर्थ:

तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजी की कथा कल्याण करनेवाली और कलियुग के पापों को हरनेवाली है। मेरी इस भद्दी कवितारूपी नदी की चाल पवित्र जलवाली नदी (गंगाजी) की चाल की भाँति टेढ़ी है। प्रभु श्रीरघुनाथजी के सुन्दर यश के संग से यह कविता सुन्दर तथा सज्जनों के मन को भानेवाली हो जायगी। श्मशान की अपवित्र राख भी श्रीमहादेवजी के अंग के संग से सुहावनी लगती है और स्मरण करते ही पवित्र करनेवाली होती है॥।

दोहा

प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग। दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग॥ १० (क) ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के यश के संग से मेरी कविता सभी को अत्यन्त प्रिय लगेगी, जैसे मलय पर्वत के संग से काष्ठमात्र [चन्दन बनकर] वन्दनीय हो जाता है, फिर क्या कोई काठ [की तुच्छता] का विचार करता है ?।

दोहा

स्यामसुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान। गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान॥ १० (ख) ॥

अर्थ:

श्यामा गौ काली होने पर भी उसका दूध उज्ज्वल और बहुत गुणकारी होता है। यही समझकर सब लोग उसे पीते हैं। इसी तरह गँवारू भाषा में होने पर भी श्रीसीता-रामजी के यश को बुद्धिमान् लोग बड़े चाव से गाते और सुनते हैं।

दोहा 11 के अंतर्गत
चौपाई

मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी॥ नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई॥ १ ॥

अर्थ:

मणि, माणिक और मोती की जैसी सुन्दर छबि है, वह साँप, पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पाती। राजा के मुकुट और नवयुवती स्त्री के शरीर को पाकर ही ये सब अधिक शोभा को प्राप्त होते हैं।

चौपाई

तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं॥ भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई॥ २ ॥

अर्थ:

इसी तरह, बुद्धिमान् लोग कहते हैं कि सुकवि की कविता भी उत्पन्न और कहीं होती है और शोभा अन्यत्र कहीं पाती है (अर्थात्‌ कवि की वाणी से उत्पन्न हुई कविता वहाँ शोभा पाती है जहाँ उसका विचार, प्रचार तथा उसमें कथित आदर्श का ग्रहण और अनुसरण होता है)। कवि के स्मरण करते ही उसकी भक्ति के कारण सरस्वतीजी ब्रह्मलोक को छोड़कर दौड़ी आती हैं।

चौपाई

राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ॥ कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी॥ ३ ॥

अर्थ:

सरस्वतीजी की दौड़ी आने की वह थकावट रामचरितरूपी सरोवर में उन्हें नहलाये बिना दूसरे करोड़ों उपायों से भी दूर नहीं होती। कवि और पण्डित अपने हृदय में ऐसा विचारकर कलियुग के पापों को हरनेवाले श्रीहरि के यश का ही गान करते हैं।

चौपाई

कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना॥ हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना॥ ४ ॥

अर्थ:

संसारी मनुष्यों का गुणगान करने से सरस्वतीजी सिर धुनकर पछताने लगती हैं [कि मैं क्यों इसके बुलाने पर आयी]। बुद्धिमान् लोग हृदय को समुद्र, बुद्धि को सीप और सरस्वती को स्वाति नक्षत्र के समान कहते हैं।

चौपाई

जौं बरषइ बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू॥ ५ ॥

अर्थ:

इसमें यदि श्रेष्ठ विचाररूपी जल बरसता है तो मुक्तामणि के समान सुन्दर कविता होती है।

दोहा

जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग। पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग॥ ११ ॥

अर्थ:

उन कवितारूपी मुक्तामणियों को युक्ति से बेधकर फिर रामचरित्ररूपी सुन्दर तागे में पिरोकर सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं, जिससे अत्यन्त अनुरागरूपी शोभा होती है (वे आत्यन्तिक प्रेम को प्राप्त होते हैं)।

दोहा 12 के अंतर्गत
चौपाई

जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला॥ चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़े॥ १ ॥

अर्थ:

जो कराल कलियुग में जन्मे हैं, जिनकी करनी कौए के समान है और वेष हंस का-सा है, जो वेदमार्ग को छोड़कर कुमार्ग पर चलते हैं, जो कपट की मूर्ति और कलियुग के पापों के भाँड़े हैं।

चौपाई

बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥ तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी॥ २ ॥

अर्थ:

जो श्रीरामजी के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन (लोभ), क्रोध और काम के गुलाम हैं और जो धींगाधींगी करनेवाले, धर्मध्वजी (धर्म की झूठी ध्वजा फहरानेवाले-दम्भी) और कपट के धन्धों का बोझ ढोनेवाले हैं, संसार के ऐसे लोगों में सबसे पहले मेरी गिनती है।

चौपाई

जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ॥ ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने॥ ३ ॥

अर्थ:

यदि मैं अपने सब अवगुणों को कहने लगूँ तो कथा बहुत बढ़ जायगी और मैं पार नहीं पाऊँगा। इससे मैंने बहुत कम अवगुणों का वर्णन किया है। बुद्धिमान् लोग थोड़े ही में समझ लेंगे।

चौपाई

समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी॥ एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका॥ ४ ॥

अर्थ:

मेरी अनेकों प्रकार की विनती को समझकर, कोई भी इस कथाको सुनकर दोष नहीं देगा। इतने पर भी जो शंका करेंगे, वे तो मुझसे भी अधिक मूर्ख और बुद्धि के कंगाल हैं।

चौपाई

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥ कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥ ५ ॥

अर्थ:

मैं न तो कवि हूँ, न चतुर कहलाता हूँ; अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीरामजी के गुण गाता हूँ। कहाँ तो श्रीरघुनाथजी के अपार चरित्र, कहाँ संसार में आसक्त मेरी बुद्धि!।

चौपाई

जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं॥ समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई॥ ६ ॥

अर्थ:

जिस हवा से सुमेरु-जैसे पहाड़ उड़ जाते हैं, कहिये तो, उसके सामने रूई किस गिनती में है। श्रीरामजी की असीम प्रभुता को समझकर कथा रचने में मेरा मन बहुत हिचकता है--।

दोहा

सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान। नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान॥ १२ ॥

अर्थ:

सरस्वतीजी, शेषजी, शिवजी, ब्रह्माजी, शास्त्र, वेद और पुराण-ये सब “नेति-नेति' कहकर (पार नहीं पाकर ' ऐसा नहीं ', 'ऐसा नहीं ' कहते हुए) सदा जिनका गुणगान किया करते हैं।

दोहा 13 के अंतर्गत
चौपाई

सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥ तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा॥ १ ॥

अर्थ:

यद्यपि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की प्रभुता को सब ऐसी (अकथनीय) ही जानते हैं तथापि कहे बिना कोई नहीं रहा। इसमें वेद ने ऐसा कारण बताया है कि भजन का प्रभाव बहुत तरह से कहा गया है। (अर्थात्‌ भगवान्‌ की महिमा का पूरा वर्णन तो कोई कर नहीं सकता; परन्तु जिससे जितना बन पड़े उतना भगवान्‌ का गुणगान करना चाहिये। क्योंकि भगवान्‌ के गुणगानरूपी भजन का प्रभाव बहुत ही अनोखा है, उसका नाना प्रकार से शास्त्रों में वर्णन है। थोड़ा-सा भी भगवान्‌ का भजन मनुष्य को सहज ही भवसागर से तार देता है)।

चौपाई

एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा॥ ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना॥ २ ॥

अर्थ:

जो परमेश्वर एक हैं, जिनकी कोई इच्छा नहीं है, जिनका कोई रूप और नाम नहीं है, जो अजन्मा, सच्चिदानन्द और परमधाम हैं और जो सबमें व्यापक एवं विश्वरूप हैं, उन्हीं भगवान् ने दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकार की लीला की है।

चौपाई

सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी॥ जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥ ३ ॥

अर्थ:

वह लीला केवल भक्तों के हित के लिये ही है; क्योंकि भगवान्‌ परम कृपालु हैं और शरणागत के बड़े प्रेमी हैं। जिनकी भक्तों पर बड़ी ममता और कृपा है, जिन्होंने एक बार जिस पर कृपा कर दी, उस पर फिर कभी क्रोध नहीं किया।

चौपाई

गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥ बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज बानी॥ ४ ॥

अर्थ:

वे प्रभु श्रीरघुनाथजी गयी हुई वस्तु को फिर प्राप्त करानेवाले, गरीबनिवाज (दीनबन्धु), सरलस्वभाव, सर्वशक्तिमान् और सबके स्वामी हैं। यही समझकर बुद्धिमान् लोग उन श्रीहरि का यश वर्णन करके अपनी वाणी को पवित्र और उत्तम फल (मोक्ष और दुर्लभ भगवत्प्रेम) देनेवाली बनाते हैं।

चौपाई

तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा॥ मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई॥ ५ ॥

अर्थ:

उसी बल से (महिमा का यथार्थ वर्णन नहीं, परन्तु महान् फल देनेवाला भजन समझकर भगवत्कृपा के बल पर ही) मैं श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाकर श्रीरघुनाथजी के गुणों की कथा कहूँगा। इसी विचार से [वाल्मीकि, व्यास आदि] मुनियों ने पहले हरि की कीर्ति गायी है, भाई! उसी मार्ग पर चलना मेरे लिये सुगम होगा।

दोहा

अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं। चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं॥ १३ ॥

अर्थ:

जो अत्यन्त बड़ी श्रेष्ठ नदियाँ हैं, यदि राजा उन पर पुल बाँधा देता है तो अत्यन्त छोटी चींटियाँ भी उन पर चढ़कर बिना ही परिश्रम के पार चली जाती हैं [इसी प्रकार मुनियों के वर्णन के सहारे मैं भी श्रीरामचरित्र का वर्ण सहज ही कर सकूँगा]।