श्रीरामावतार के हेतु

शिवजी पार्वतीजी को बताते हैं कि भक्तों के हित, धर्म की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए भगवान अवतार धारण करते हैं। वे विशेष रूप से श्रीरामावतार से जुड़े कारणों का वर्णन करते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण २९ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू॥ राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी॥ ३ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो जो बात मैंने पहले आपसे पूछी थी, वही कहिये। [यह सत्य है कि ] श्रीरामचन्द्रजी ब्रह्म हैं, चिन्मय (ज्ञानस्वरूप) हैं, अविनाशी हैं, सब से रहित और सब के हृदयरूपी नगरी में निवास करनेवाले हैं।

चौपाई

नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू॥ उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर हे नाथ! उन्होंने मनुष्य का शरीर किस कारण से धारण किया? हे वृषकेतु! यह मुझे समझाकर कहिये। पार्वती के अत्यन्त नम्र वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजी की कथा में उनका विशुद्ध प्रेम देखकर--।

दोहा

हियँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान। बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान॥ १२० (क) ॥

अर्थ:

तब कामदेव के शत्रु, स्वाभाविक ही सुजान, कृपानिधान शिवजी हृदय में बहुत ही हर्षित हुए और बहुत प्रकार से पार्वती की प्रशंसा करके फिर बोले--।

सोरठा

सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल। कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड़॥ १२० (ख) ॥

अर्थ:

हे पार्वती। निर्मल रामचरितमानस की वह मंगलमयी कथा सुनो जिसे भुसुंडि ने विस्तार से कहा और पक्षियों के नायक गरुड़जी ने सुना था।

सोरठा

सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब। सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ॥ १२० (ग) ॥

अर्थ:

वह श्रेष्ठ संवाद जिस प्रकार हुआ, वह मैं आगे कहूँगा। अभी तुम श्रीरामचन्द्रजी के अवतार का परम सुन्दर और पवित्र (पापनाशक) चरित्र सुनो।

सोरठा

हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित। मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु॥ १२० (घ) ॥

अर्थ:

श्रीहरि के गुण, नाम, कथा और रूप सभी अपार, अगणित और असीम हैं। फिर भी हे पार्वती! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कहता हूँ, तुम आदरपूर्वक सुनो।

दोहा 121 के अंतर्गत
चौपाई

सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए॥ हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥ १ ॥

अर्थ:

हे पार्वती! सुनो, वेद-शास्त्रों ने श्रीहरि के सुन्दर, विस्तृत और निर्मल चरित्रों का गान किया है। हरि के अवतार का जिस कारण से होता है, वह कारण “बस यही है' ऐसा नहीं कहा जा सकता (अनेकों कारण हो सकते हैं और ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें कोई जान ही नहीं सकता)।

चौपाई

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी॥ तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥ २ ॥

अर्थ:

हे सयानी! सुनो, हमारा मत तो यह है कि बुद्धि, मन और वाणी से श्रीरामचन्द्रजी की तर्कना नहीं की जा सकती। तथापि संत, मुनि, वेद और पुराण अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार जैसा कुछ कहते हैं,

चौपाई

तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही॥ जब जब होइ धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥ ३ ॥

अर्थ:

और जैसा कुछ मेरी समझ में आता है, हे सुमुखि! वही कारण मैं तुमको सुनाता हूँ। जब-जब धर्म का हास होता है और नीच अभिमानी राक्षस बढ़ जाते हैं।

चौपाई

करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी॥ तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा॥ ४ ॥

अर्थ:

और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा ब्राह्मण, गौ, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं, तब-तब वे कृपानिधान प्रभु भाँति-भाँति के [दिव्य] शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं।

दोहा

असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु। जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥ १२१ ॥

अर्थ:

वे असुरों को मारकर देवताओं को स्थापित करते हैं, अपने [श्वासरूप] वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं और जगत् में अपना निर्मल यश फैलाते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के अवतार का यह कारण है।

दोहा 122 के अंतर्गत
चौपाई

सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं॥ राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका॥ १ ॥

अर्थ:

उसी यश को गा-गाकर भक्तजन भवसागर से तर जाते हैं। कृपासागर भगवान् भक्तों के हित के लिये शरीर धारण करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के जन्म लेने के अनेक कारण हैं, जो एक-से-एक बढ़कर विचित्र हैं।

चौपाई

जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी॥ द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ॥ २ ॥

अर्थ:

हे सुन्दर बुद्धिवाली भवानी! मैं उनके दो-एक जन्मों का विस्तार से वर्णन करता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। श्रीहरि के जय और विजय दो प्यारे द्वारपाल हैं, जिनको सब कोई जानते हैं।

चौपाई

बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई॥ कनककसिपु अरु हाटकलोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन॥ ३ ॥

अर्थ:

उन दोनों भाइयों ने ब्राह्मण (सनकादि) के शाप से असुरों का तामसी शरीर पाया। एक का नाम था हिरण्यकशिपु और दूसरे का हिरण्याक्ष। ये देवराज इन्द्र के गर्व को छुड़ाने वाले सारे जगत् में प्रसिद्ध हुए।

चौपाई

बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता॥ होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा॥ ४ ॥

अर्थ:

वे युद्ध में विजय पाने वाले विख्यात वीर थे। इनमें से एक (हिरण्याक्ष) को भगवान् ने वराह (सूअर) का शरीर धारण करके मारा; फिर दूसरे (हिरण्यकशिपु) का नरसिंहरूप धारण करके वध किया और अपने भक्त प्रह्लाद का सुन्दर यश फैलाया।

दोहा

भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान। कुंभकरन रावन सुभट सुर बिजई जग जान॥ १२२ ॥

अर्थ:

वे ही जाकर देवताओं को जीतने वाले तथा बड़े योद्धा, रावण और कुम्भकर्ण नामक बड़े बलवान् और महावीर राक्षस हुए, जिन्हें सारा जगत् जानता है।

दोहा 123 के अंतर्गत
चौपाई

मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना॥ एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी॥ १ ॥

अर्थ:

भगवान् के द्वारा मारे जाने पर भी वे मुक्त नहीं हुए, क्योंकि ब्राह्मण के वचन (शाप) का प्रमाण तीन जन्मों के लिए था। अतः एक बार उनके कल्याण के लिये भक्तानुरागी भगवान् ने फिर अवतार लिया।

चौपाई

कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता॥ एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित पवित्र किए संसारा॥ २ ॥

अर्थ:

वहाँ (उस अवतार में) कश्यप और अदिति उनके माता-पिता हुए, जो दशरथ और कौसल्या के नाम से प्रसिद्ध थे। एक कल्प में इस प्रकार अवतार लेकर उन्होंने संसार में पवित्र लीलाएँ कीं।

चौपाई

एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे॥ संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा॥ ३ ॥

अर्थ:

एक कल्प में सब देवताओं को जलन्धर दैत्य से युद्ध में हार जाने के कारण दुःखी देखकर शिवजी ने उसके साथ बड़ा घोर युद्ध किया; पर वह महाबली दैत्य मारे नहीं मरता था।

चौपाई

परम सती असुराधिप नारी। तेहिं बल ताहि न जितहिं पुरारी॥ ४ ॥

अर्थ:

उस दैत्यराज की स्त्री परम सती (बड़ी ही पतिक्रता) थी। उसी के प्रताप से त्रिपुरासुर [जैसे अजेय शत्रु] का विनाश करने वाले शिवजी भी उस दैत्य को नहीं जीत सके।

दोहा

छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह। जब तेहिं जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह॥ १२३ ॥

अर्थ:

प्रभु ने छल से उस स्त्री का व्रत भंग कर देवताओं का काम किया। जब उस स्त्री ने यह भेद जाना, तब उसने क्रोध करके भगवान् को शाप दिया।

दोहा 124 के अंतर्गत
चौपाई

तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना॥ तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ॥ १ ॥

अर्थ:

लीलाओं के भण्डार कृपालु हरि ने उस स्त्री के शाप को प्रामाण्य दिया (स्वीकार किया)। वही जलन्धर उस कल्प में रावण हुआ, जिसे श्रीरामचन्द्रजी ने युद्ध में मारकर परम पद दिया।

चौपाई

एक जनम कर कारन एहा। जेहि लगि राम धरी नरदेहा॥ प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी॥ २ ॥

अर्थ:

एक जन्म का कारण यह था, जिससे श्रीरामचन्द्रजी ने मनुष्य देह धारण किया। हे मुनि! सुनो, प्रभु के प्रत्येक अवतार की कथा का कवियों ने नाना प्रकार से वर्णन किया है।

चौपाई

नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा॥ गिरिजा चकित भईं सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानी॥ ३ ॥

अर्थ:

एक बार नारदजी ने शाप दिया, अतः एक कल्प में उसके लिये अवतार हुआ। यह बात सुनकर पार्वतीजी बड़ी चकित हुईं [और बोलीं कि] नारदजी तो विष्णुभक्त और ज्ञानी हैं।

चौपाई

कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा॥ यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी॥ ४ ॥

अर्थ:

मुनि ने भगवान् को शाप किस कारण से दिया? लक्ष्मीपति भगवान् ने उनका क्या अपराध किया था? हे पुरारि (शिवजी)! यह कथा मुझसे कहिये। मुनि नारद के मन में मोह होना बड़े आश्चर्य की बात है।

दोहा

बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ। जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ॥ १२४ (क) ॥

अर्थ:

तब महादेवजी ने हँसकर कहा—न कोई ज्ञानी है न मूर्ख। श्रीरघुनाथजी जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है।

सोरठा

कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु। भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद॥ १२४ (ख) ॥

अर्थ:

मैं श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की कथा कहता हूँ, हे भरद्वाज! तुम आदर से सुनो। तुलसीदासजी कहते हैं—मान और मद को छोड़कर आवागमन का नाश करने वाले रघुनाथजी को भजो।

दोहा 125 के अंतर्गत
चौपाई

हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥ आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा॥ १ ॥

अर्थ:

हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उसके समीप ही सुन्दर सुरसरी बहती थी। आश्रम परम पवित्र सुहावना था। देखकर देवरिषि के मन को बहुत भाया।

चौपाई

निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा॥ सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥ २ ॥

अर्थ:

पर्वत, नदी और वन के [सुन्दर] विभागों को देखकर नारदजी का लक्ष्मीपति भगवान् के चरणों में प्रेम हो गया। भगवान् का स्मरण करते ही उन (नारद मुनि) के शाप की (जो शाप उन्हें दक्ष प्रजापति ने दिया था और जिसके कारण वे एक स्थान पर नहीं ठहर सकते थे) गति रुक गयी और मन के स्वाभाविक ही निर्मल होने से उनकी समाधि लग गयी।

चौपाई

मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना॥ सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू॥ ३ ॥

अर्थ:

मुनि की गति देखकर देवराज इन्द्र डर गया। उसने कामदेव को बुलाकर उसका आदर-सत्कार किया [और कहा कि] मेरे हित के लिए तुम अपने सहायकों सहित [नारद की समाधि भंग करने को] जाओ। [यह सुनकर] मीनध्वज कामदेव मन में प्रसन्न होकर चला।

चौपाई

सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा॥ जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

इन्द्र के मन में यह डर हुआ कि देवर्षि नारद मेरी पुरी (अमरावती) का निवास चाहते हैं। जगत् में जो कामी और लोभी होते हैं, वे कुटिल कौए की तरह सबसे डरते हैं।

दोहा

सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज। छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज॥ १२५ ॥

अर्थ:

जैसे मूर्ख कुत्ता सिंह को देखकर सूखी हड्डी लेकर भागे और वह मूर्ख यह समझे कि कहीं वह हड्डी सिंह छीन न ले, वैसे ही इन्द्र को [नारदजी मेरा राज्य छीन लेंगे, ऐसा सोचते] लाज नहीं आयी।

दोहा 126 के अंतर्गत
चौपाई

तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ॥ कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहिं भृंगा॥ १ ॥

अर्थ:

जब कामदेव उस आश्रम में गया, तब उसने अपनी माया से वहाँ वसंत-ऋतु को उत्पन्न किया। तरह-तरह के वृक्षों पर रंग-बिरंगे फूल खिल गये, उन पर कोयलें कूकने लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे।

चौपाई

चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी॥ रंभादिक सुरनारि नबीना। सकल असमसर कला प्रबीना॥ २ ॥

अर्थ:

कामाग्नि को भड़काने वाली तीन प्रकार की (शीतल, मन्द और सुगन्ध) सुहावनी हवा चलने लगी। रम्भा आदि नवयुवती देवांगनाएँ, जो सभी काम-कला में निपुण थीं।

चौपाई

करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हिं पानि पतंगा॥ देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना॥ ३ ॥

अर्थ:

वे बहुत प्रकार की तानों की तरंग के साथ गाने लगीं और हाथ में गेंद लेकर नाना प्रकार के खेल खेलने लगीं। कामदेव अपने इन सहायकों को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और फिर उसने नाना प्रकार के मायाजाल किये।

चौपाई

काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी॥ सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू॥ ४ ॥

अर्थ:

परन्तु कामदेव की कोई भी कला मुनि पर असर न कर सकी। तब तो पापी कामदेव अपने ही [नाश के] भय से डर गया। लक्ष्मीपति भगवान् जिसके बड़े रक्षक हों, भला, उसकी सीमा (मर्यादा) को कोई दबा सकता है ?

दोहा

सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन। गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन॥ १२६ ॥

अर्थ:

तब अपने सहायकों समेत कामदेव ने बहुत डरकर और अपने मन में हार मानकर बहुत ही आर्त (दीन) वचन कहते हुए मुनि के चरणों को जा पकड़ा।

दोहा 127 के अंतर्गत
चौपाई

भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा॥ नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई॥ १ ॥

अर्थ:

नारदजी के मन में कुछ भी क्रोध न आया। उन्होंने प्रिय वचन कहकर कामदेव को संतुष्ट किया। तब मुनि के चरणों में सिर नवाकर और उनकी आज्ञा पाकर कामदेव अपने सहायकों सहित लौट गया।

चौपाई

मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी॥ सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा॥ २ ॥

अर्थ:

देवराज इन्द्र की सभा में जाकर उसने मुनि की सुशीलता और अपनी करतूत सब कही, जिसे सुनकर सबके मन में आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुनि की प्रशंसा करके श्रीहरि को सिर नवाया।