श्रीनाम वन्दना और नाम महिमा
रामनाम की महिमा का गान करते हुए बताया गया है कि कलियुग में नाम ही सबसे सहज और कल्याणकारी आश्रय है। नाम स्मरण से भय, पाप और दुःख दूर होकर भक्ति दृढ़ होती है।
बालकाण्ड · प्रकरण ११ / ५९
प्रकरण पाठ
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥ बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥ १ ॥
अर्थ:
मैं श्रीरघुनाथजी के नाम 'राम' की वन्दना करता हूँ, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चन्द्रमा) का हेतु अर्थात् 'र', 'आ' और 'म' रूप से बीज है। वह रामनाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदों का प्राण है; निर्गुण, उपमारहित और गुणों का भण्डार है।
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥ महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥ २ ॥
अर्थ:
जो महामन्त्र है, जिसे महेश्वर श्रीशिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशी में मुक्ति का कारण है, तथा जिसकी महिमाको गणेशजी जानते हैं, जो इस राम नाम के प्रभाव से ही सबसे पहले पूजे जाते हैं।
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥ सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेईं पिय संग भवानी॥ ३ ॥
अर्थ:
आदिकवि श्रीवाल्मीकिजी रामनाम के प्रताप को जानते हैं, जो उलटा नाम ('मरा', 'मरा') जपकर पवित्र हो गये। श्रीशिवजी के इस वचन को सुनकर कि एक राम-नाम सहस्र नाम के समान है, पार्वतीजी सदा अपने पति (श्रीशिवजी) के साथ रामनाम का जप करती रहती हैं।
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को॥ नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥ ४ ॥
अर्थ:
नाम के प्रति पार्वतीजी के हृदय की ऐसी प्रीति देखकर श्रीशिवजी हर्षित हो गये और उन्होंने स्त्रियों में भूषणरूप (पतिव्रताओं में शिरोमणि) पार्वतीजी को अपना भूषण बना लिया (अर्थात् उन्हें अपने अङ्ग में धारण करके अर्धांगिनी बना लिया)। नाम के प्रभाव को श्रीशिवजी भलीभाँति जानते हैं, जिसके कारण कालकूट विष ने उनको अमृत का फल दिया।
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥ सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥ १ ॥
अर्थ:
दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमाला-रूपी शरीर के नेत्र हैं, भक्तों के जीवन हैं तथा स्मरण करने में सबके लिए सुलभ और सुख देनेवाले हैं, और जो इस लोक में लाभ और परलोक में निर्वाह करते हैं (अर्थात् भगवान् के दिव्य धाम में दिव्य देह से सदा भगवत्सेवा में नियुक्त रखते हैं)।
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के॥ बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती॥ २ ॥
अर्थ:
ये कहने, सुनने और स्मरण करने में बहुत ही अच्छे (सुन्दर और मधुर) हैं; तुलसीदास को तो श्रीराम-लक्ष्मण के समान प्यारे हैं। इनका ('र' और “म' का) अलग-अलग वर्णन करने में प्रीति बिलगाती है (अर्थात् बीजमन्त्र की दृष्टि से इनके उच्चारण, अर्थ और फल में भिन्नता दीख पड़ती है) परन्तु हैं ये जीव और ब्रह्म के समान स्वभाव से ही साथ रहनेवाले (सदा एकरूप और एकरस)।
नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता॥ भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥ ३ ॥
अर्थ:
ये दोनों अक्षर नर-नारायण के समान सुन्दर भाई हैं, ये जगत् का पालन और विशेषरूप से भक्तों की रक्षा करनेवाले हैं। ये भक्तिरूपिणी सुन्दर स्त्री के कानों के सुन्दर आभूषण (कर्णफूल) हैं और जगत् के हित के लिये निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं।
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के॥ जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से॥ ४ ॥
अर्थ:
ये सुन्दर गति (मोक्ष) रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं, कच्छप और शेषजी के समान पृथ्वी के धारण करनेवाले हैं, भक्तों के मनरूपी सुन्दर कमल में विहार करनेवाले भौरे के समान हैं और जीह-रूपी यशोदाजी के लिये श्रीकृष्ण और बलरामजी के समान (आनन्द देनेवाले) हैं।
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥ नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥ १ ॥
अर्थ:
समझने में नाम और नामी दोनों एक-से हैं, किन्तु दोनों में परस्पर स्वामी और सेवक के समान प्रीति है (अर्थात् नाम और नामी में पूर्ण एकता होने पर भी जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नाम के पीछे नामी चलते हैं। प्रभु श्रीरामजी अपने “राम” नाम का ही अनुगमन करते हैं, नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं)। नाम और रूप दोनों ईश्वर की उपाधि हैं; ये (भगवान् के नाम और रूप) दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि हैं और सुन्दर (शुद्ध भक्तियुक्त) बुद्धि से ही इनका [दिव्य अविनाशी] स्वरूप जानने में आता है।
को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥ देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥ २ ॥
अर्थ:
इन (नाम और रूप) में कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है। इनके गुणों का तारतम्य (कमी-बेशी) सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे। रूप नाम के अधीन देखे जाते हैं, नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता।
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥ अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी॥ ४ ॥
अर्थ:
नाम और रूप की गति की कहानी (विशेषता की कथा) अकथनीय है। वह समझने में सुखदायक है, परन्तु उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। निर्गुण और सगुण के बीच में नाम सुन्दर साक्षी है और दोनों का यथार्थ ज्ञान करानेवाला चतुर दुभाषिया है।
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी॥ ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥ १ ॥
अर्थ:
ब्रह्मा के बनाये हुए इस प्रपंच (दृश्य जगत्) से भलीभाँति छूटे हुए वैराग्यवान् मुक्त योगी पुरुष इस नाम को ही जीभ से जपते हुए [तत्त्वज्ञानरूपी दिन में] जागते हैं और नाम तथा रूप से रहित अनुपम, अनिर्वचनीय, अनामय ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं।
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ॥ साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥ २ ॥
अर्थ:
जो परमात्मा के गूढ़ रहस्य को (यथार्थ महिमा को) जानना चाहते हैं, वे (जिज्ञासु) भी नाम को जीभ से जपकर उसे जान लेते हैं। [लौकिक सिद्धियों के चाहनेवाले अर्थार्थी] साधक लौ लगाकर नाम का जप करते हैं और अणिमादि [आठों] सिद्धियों को पाकर सिद्ध हो जाते हैं।
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥ राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥ ३ ॥
अर्थ:
[संकट से घबराये हुए] आर्त भक्त नाम जप करते हैं तो उनके बड़े भारी बुरे-बुरे संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। जगत् में चार प्रकार के (१-अर्थार्थी—धनादि की चाह से भजनेवाले, २-आर्त—संकट की निवृत्ति के लिये भजनेवाले, ३-जिज्ञासु—भगवान् को जानने की इच्छा से भजनेवाले, ४-ज्ञानी—भगवान् को तत्त्व से जानकर स्वाभाविक ही प्रेम से भजनेवाले) रामभक्त हैं और चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं।
चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा॥ चहुँ जुग चहुँ श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ॥ ४ ॥
अर्थ:
चारों ही चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है; इनमें ज्ञानी भक्त प्रभु को विशेषरूप से प्रिय है। यों तो चारों युगों में और चारों ही वेदों में नाम का प्रभाव है, परन्तु कलियुग में विशेषरूप से है। इसमें तो [नाम को छोड़कर] दूसरा कोई उपाय ही नहीं है।
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन। नाम सुप्रेम पियूष ह्रद तिन्हहुँ किए मन मीन॥ २२ ॥
अर्थ:
जो सब प्रकार की (भोग और मोक्ष की भी) कामनाओं से रहित और श्रीरामभक्ति के रस में लीन हैं, उन्होंने भी नाम के सुन्दर प्रेमरूपी अमृत के सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है (अर्थात् वे नामरूपी सुधा का निरन्तर आस्वादन करते रहते हैं, क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते)।
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥ मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥ १ ॥
अर्थ:
निर्गुण और सगुण ब्रह्म के दो स्वरूप हैं। ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरी सम्मति में नाम इन दोनों से बड़ा है, जिसने अपने बल से दोनों को अपने वश में कर रखा है।
प्रौढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥ एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥ उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥ ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनँद रासी॥ २-३ ॥
अर्थ:
सज्जनगण इस बात को मुझ दास की ढिठाई या केवल काव्योक्ति न समझें। मैं अपने मन के विश्वास, प्रेम और रुचि की बात कहता हूँ। [निर्गुण और सगुण] दोनों प्रकार के ब्रह्म का ज्ञान अग्नि के समान है। निर्गुण उस अप्रकट अग्नि के समान है जो काठ के अंदर है, परन्तु दीखती नहीं; और सगुण उस प्रकट अग्नि के समान है जो प्रत्यक्ष दीखती है। [तत्त्वतः दोनों एक ही हैं; केवल प्रकट-अप्रकट के भेद से भिन्न मालूम होती हैं। इसी प्रकार निर्गुण और सगुण तत्त्वतः एक ही हैं। इतना होने पर भी] दोनों ही जानने में बड़े कठिन हैं, परन्तु नाम से दोनों सुगम हो जाते हैं। इसी से मैंने नाम को [निर्गुण] ब्रह्म से और [सगुण] राम से बड़ा कहा है, ब्रह्म व्यापक है, एक है, अविनाशी है; सत्ता, चैतन्य और आनन्द की घनराशि है।
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥ नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥ ४ ॥
अर्थ:
ऐसे विकाररहित प्रभु के हृदय में रहते भी जगत् के सब जीव दीन और दुखी हैं। नाम का निरूपण करके (नाम के यथार्थ स्वरूप, महिमा, रहस्य और प्रभाव को जानकर) नाम का जतन करने से (श्रद्धापूर्वक नाम-जप रूपी साधन करने से) वही ब्रह्म ऐसे प्रकट हो जाता है जैसे रत्न के जानने से उसका मूल्य।
राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥ नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी ने भक्तों के हित के लिये मनुष्य-शरीर धारण करके स्वयं कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया; परन्तु भक्तगण प्रेम के साथ नाम का जप करते हुए सहज ही में आनन्द और कल्याण के घर हो जाते हैं।
राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥ रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥ सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥ भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥ २-३ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी ने एक तपस्वी की स्त्री (अहल्या) को ही तारा, परन्तु नाम ने करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि सुधार दी। श्रीरामजी ने ऋषि विश्वामित्र के हित के लिये एक सुकेतु यक्ष की कन्या ताड़काकी सेना और पुत्र (सुबाहु) सहित समाप्ति की; परन्तु नाम अपने भक्तों के दोष, दुःख और दुराशाओं का इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रि का। श्रीरामजी ने तो स्वयं शिवजी के धनुष को तोड़ा, परन्तु नाम का प्रताप ही संसार के सब भयों का नाश करनेवाला है।
दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन॥ निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन॥ ४ ॥
अर्थ:
प्रभु श्रीरामजी ने [भयानक] दण्डक वन को सुहावना बनाया, परन्तु नाम ने असंख्य मनुष्यों के मनों को पवित्र कर दिया। श्रीरघुनाथजी ने राक्षसों के समूह को मारा, परन्तु नाम तो कलियुग के सारे पापों की जड़ उखाड़नेवाला है।
राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥ नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी ने तो भालू और बन्दरों की सेना बटोरी और समुद्र पर पुल बाँधने के लिए थोड़ा परिश्रम नहीं किया; परंतु नाम लेते ही संसार-समुद्र सूख जाता है। सज्जनगण ! मन में विचार कीजिए [कि दोनों में कौन बड़ा है]।
राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा॥ राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी॥ सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती॥ फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें॥ ३-४ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी ने कुटुम्ब सहित रावण को युद्ध में मारा, तब सीता सहित उन्होंने अपने नगर (अयोध्या) में प्रवेश किया। राम राजा हुए, अवध उनकी राजधानी हुई, देवता और मुनि सुन्दर वाणी से जिनके गुण गाते हैं। परंतु सेवक (भक्त) प्रेमपूर्वक नाम के स्मरणमात्र से बिना परिश्रम मोह की प्रबल सेना को जीतकर प्रेम में मग्न हुए अपने ही सुख में विचरते हैं, नाम के प्रसाद से उन्हें सपने में भी कोई चिन्ता नहीं सताती।
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि। रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि॥ २५ ॥
अर्थ:
इस प्रकार नाम [निर्गुण] ब्रह्म और [सगुण] राम दोनों से बड़ा है। यह वरदान देने वालों को भी वर देने वाला है। श्रीशिवजी ने अपने हृदय में यह जानकर ही सौ करोड़ रामचरितों में से इस 'राम' नाम को [साररूप से चुनकर] ग्रहण किया है।
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥ नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥ २ ॥
अर्थ:
नारदजी ने नाम के प्रताप को जाना है। हरि सारे संसार को प्यारे हैं, [हरि को हर प्यारे हैं] और आप (श्रीनारदजी) हरि और हर दोनों को प्रिय हैं। नाम के जपने से प्रभु ने कृपा की, जिससे प्रह्लाद भक्तशिरोमणि हो गये।
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥ सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥ ३ ॥
अर्थ:
ध्रुवजी ने ग्लानि से (विमाता के वचनों से दुखी होकर सकामभाव से) हरि नाम को जपा और उसके प्रताप से अचल अनुपम स्थान (ध्रुवलोक) प्राप्त किया। हनुमानजी ने पवित्र नाम का स्मरण करके श्रीरामजी को अपने वश में कर रखा है।
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥ बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥ १ ॥
अर्थ:
[केवल कलियुग की ही बात नहीं है,] चारों युगों में, तीनों कालों में और तीनों लोकों में नाम को जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतों का मत यही है कि समस्त पुण्यों का फल श्रीरामजी में [या रामनाम में] प्रेम होना है।
ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥ कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना॥ २ ॥
अर्थ:
पहले (सतयुग) में ध्यान से, दूसरे (त्रेता) युग में यज्ञ से और द्वापर में पूजन से भगवान् प्रसन्न होते हैं; परंतु कलियुग केवल पाप की जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्यों का मन पापरूपी समुद्र में मछली बना हुआ है (अर्थात् पाप से कभी अलग होना ही नहीं चाहता; इससे ध्यान, यज्ञ और पूजन नहीं बन सकते)।
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥ राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥ ३ ॥
अर्थ:
ऐसे कराल (कलियुग के) काल में तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसार के सब जंजालों को नाश कर देने वाला है। कलियुग में यह रामनाम मनोवांछित फल देने वाला है, परलोक का परम हितैषी और इस लोक का माता-पिता है (अर्थात् परलोक में भगवान् का परमधाम देता है और इस लोक में माता-पिता के समान सब प्रकार से पालन और रक्षण करता है)।