मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि
मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि
दोहा ४३ (क) · बालकाण्ड
दोहा पाठ
मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ। सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ॥ ४३ (क) ॥
अर्थ
अपनी बुद्धि के अनुसार इस सुन्दर जल के गुणों को गिनकर, उसमें अपने मन को स्नान कराकर और भवानी-शंकरजी को स्मरण करके कवि (तुलसीदास) सुन्दर कथा कहता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का दोहा ४३ (क) है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।
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मानस का रूप और माहात्म्य