जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह

दोहा ३८ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ। तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥ ३८ ॥

अर्थ

जिनके पास श्रद्धारूपी संबल नहीं है और संतों का साथ नहीं है और जिनको श्रीरघुनाथजी प्रिय नहीं हैं, उनके लिए यह मानस अत्यन्त ही अगम है। (अर्थात् श्रद्धा, सत्संग और भगवत्प्रेम के बिना कोई इसे नहीं पा सकता)।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का दोहा ३८ है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।

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मानस का रूप और माहात्म्य