राम सुप्रेमहि पोषत पानी
राम सुप्रेमहि पोषत पानी
चौपाई २, दोहा ४३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी॥ भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥ २ ॥
अर्थ
यह जल श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर प्रेम को पुष्ट करता है, कलियुग के समस्त पापों और उनसे होनेवाली ग्लानि को हर लेता है। संसार के (जन्म-मृत्युरूप) श्रम को सोख लेता है, सन्तोष को भी सन्तुष्ट करता है और पाप, ताप, दरिद्रता और दोषों को नष्ट कर देता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।
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मानस का रूप और माहात्म्य