जिन्ह एहिं बारि न मानस धोए
जिन्ह एहिं बारि न मानस धोए
चौपाई ४, दोहा ४३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जिन्ह एहिं बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए॥ तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहिं मृग जिमि जीव दुखारी॥ ४ ॥
अर्थ
जिन्होंने इस (राम-सुयशरूपी) जल से अपने मानस को नहीं धोया, वे कायर कलिकाल के द्वारा बिगोए गये। जैसे प्यासा हिरन सूर्य की किरणों के जल-भ्रम को वास्तविक जल समझकर पीने को दौड़ता है और जल न पाकर दुखी होता है, वैसे ही वे (कलियुग से ठगे हुए) जीव भी [विषयों के पीछे भटककर] दुःखी होंगे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।
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मानस का रूप और माहात्म्य