पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग
दोहा ३७ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु। माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु॥ ३७ ॥
अर्थ
कथामें जो रोमाञ्च होता है वही वाटिका, बाग और वन हैं; और जो सुख होता है, वही सुन्दर पक्षियोंका विहार है। निर्मल मन ही माली है जो प्रेमरूपी जलसे सुन्दर नेत्रोंद्राय उनको सींचता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का दोहा ३७ है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।
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मानस का रूप और माहात्म्य