सती सिरोमनि सिय गुन गाथा
सती सिरोमनि सिय गुन गाथा
चौपाई ४, दोहा ४२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सती सिरोमनि सिय गुन गाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा॥ भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई॥ ४ ॥
अर्थ
सती-शिरोमणि श्रीसीताजी के गुणों की जो कथा है, वही इस जल का निर्मल और अनुपम गुण है। श्रीभरतजी का स्वभाव इस नदी की सुन्दर शीतलता है, जो सदा एक-सी रहती है और जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।
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मानस का रूप और माहात्म्य