अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि
दोहा ४३ (ख) · बालकाण्ड
दोहा पाठ
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद। कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद॥ ४३ (ख) ॥
अर्थ
मैं अब श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों को हृदय में धारण कर और उनका प्रसाद पाकर दोनों श्रेष्ठ मुनियों के मिलन का सुन्दर संवाद वर्णन करता हूँ।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का दोहा ४३ (ख) है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।
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मानस का रूप और माहात्म्य