एहि बिधि सब संसय करि दूरी
एहि बिधि सब संसय करि दूरी
चौपाई १, दोहा ३४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी॥ पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी॥ १ ॥
अर्थ
इस प्रकार सब संदेहों को दूर करके और श्रीगुरु के चरणकमलों की रज को सिर पर धारण करके मैं पुनः हाथ जोड़कर सबकी विनती करता हूँ, जिससे कथा की रचना में कोई दोष स्पर्श न करने पाए।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।
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मानस का रूप और माहात्म्य