आरति बिनय दीनता मोरी
आरति बिनय दीनता मोरी
चौपाई १, दोहा ४३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥ अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥ १ ॥
अर्थ
मेरा आर्तभाव, विनय और दीनता इस सुन्दर और निर्मल जल का कम हलकापन नहीं है (अर्थात् अत्यन्त हलकापन है)। यह जल बड़ा ही अनोखा है, जो सुनने से ही गुणकारी है और आशा-प्यास तथा मनोमल को हर लेता है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
मानस का रूप और माहात्म्य