सादर सिवहि नाइ अब माथा
सादर सिवहि नाइ अब माथा
चौपाई २, दोहा ३४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥ संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥ २ ॥
अर्थ
अब मैं आदरपूर्वक श्रीशिवजी को सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की निर्मल कथा कहता हूँ। श्रीहरि के चरणों पर सिर रखकर संवत् १६३१ में इस कथा का आरम्भ करता हूँ।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।
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मानस का रूप और माहात्म्य