सुमति भूमि थल हृदय अगाधू
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू
चौपाई २, दोहा ३६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू॥ बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी॥ २ ॥
अर्थ
सुन्दर (सात्त्विकी) बुद्धि भूमि है, हृदय ही उसमें गहरा स्थान है, वेद-पुराण समुद्र हैं और साधु-संत मेघ हैं। वे (साधुरूपी मेघ) श्रीरामजी के सुयशरूपी सुन्दर, मधुर, मनोहर और मंगलकारी जल की वर्षा करते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।
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मानस का रूप और माहात्म्य