सीय स्वयंबर कथा सुहाई

चौपाई १, दोहा ४१ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई॥ नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका॥ १ ॥

अर्थ

श्रीसीताजी के स्वयंवर की जो सुन्दर कथा है, वही इस नदी में सुहावनी छवि छा रही है। अनेकों सुन्दर विचारपूर्ण प्रश्न ही इस नदी की नावें हैं और उनके विवेकयुक्त उत्तर ही चतुर केवट हैं।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “मानस का रूप और माहात्म्य” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में मानस सरोवर के रूपक में उसके अंगों, रसों और आध्यात्मिक माहात्म्य का वर्णन है।

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मानस का रूप और माहात्म्य