दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ का शोक, सुमंत्र का महल में जाना और वहाँ से लौटकर श्रीरामजी को महल में भेजना

दशरथ कैकेयी को प्रसन्न करना चाहते हैं, पर वह दो वर माँगकर उन्हें गहन शोक में डाल देती है। सुमंत्र को भेजकर श्रीरामजी को महल में बुलाया जाता है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ५ / ४९

प्रकरण पाठ

दोहा

साँझ समय सानंद नृपु गयउ कैकई गेहँ। गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ॥ २४ ॥

अर्थ:

संध्या के समय राजा दशरथ आनन्द के साथ कैकेयी के महल में गये। मानो साक्षात् स्नेह ही शरीर धारण कर निष्ठुरता के पास गया हो!

दोहा 25 के अंतर्गत
चौपाई

कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ॥ सुरपति बसइ बाहँबल जाकें। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें॥ १ ॥

अर्थ:

कोपभवन का नाम सुनकर राजा सहम गये। डर के मारे उनका पाँव आगे को नहीं पड़ता। स्वयं देवराज इन्द्र जिनकी भुजाओं के बल पर [राक्षसों से निर्भय होकर] बसता है और सम्पूर्ण राजालोग जिनका रुख देखते रहते हैं।

चौपाई

सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई॥ सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे॥ २ ॥

अर्थ:

वही राजा दशरथ स्त्री का क्रोध सुनकर सूख गये। कामदेव का प्रताप और महिमा तो देखिये। जो त्रिशूल, वज्र और तलवार आदि की चोट अपने अँगों पर सहनेवाले हैं, वे रतिनाथ कामदेव के पुष्पबाण से मारे गये।

चौपाई

सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ॥ भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषन नाना॥ ३ ॥

अर्थ:

राजा डरते-डरते अपनी प्यारी कैकेयी के पास गये। उसकी दशा देखकर उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ। कैकेयी जमीन पर पड़ी है। पुराना मोटा कपड़ा पहने हुए है। शरीर के नाना आभूषणों को उतारकर फेंक दिया है।

चौपाई

कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अनअहिवातु सूच जनु भाबी॥ जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी॥ ४ ॥

अर्थ:

उस दुर्बुद्धि कैकेयी को यह कुवेषता (बुरा वेष) कैसी फब रही है, मानो भावी विधवापन की सूचना दे रही हो। राजा उसके पास जाकर कोमल वाणी से बोले-हे प्राणप्रिये! किसलिए रिसाई (रूठी) हो ?

छन्द

केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई। मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥ दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई। तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई॥

अर्थ:

“हे रानी! किसलिए रूठी हो ?' यह कहकर राजा उसे हाथ से स्पर्श करते हैं तो वह उनके हाथ को [झटककर ] हटा देती है और ऐसे देखती है मानो क्रोध में भरी हुई नागिन क्रूर दृष्टि से देख रही हो। दोनों [वरदानों की ] वासनाएँ उस नागिन की दो जीभें हैं और दोनों वरदान दाँत हैं; वह काटने के लिये मर्मस्थान देख रही है। तुलसीदासजी कहते हैं कि राजा दशरथ होनहार के वश में होकर इसे (इस प्रकार हाथ झटकने और नागिन की भाँति देखने को) कामदेव की क्रीड़ा ही समझ रहे हैं॥।

सोरठा

बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि। कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर॥ २५ ॥

अर्थ:

राजा बार-बार कह रहे हैं-हे सुमुखी ! हे सुलोचनी ! हे कोकिलबयनी ! हे गजगामिनी! मुझे अपने क्रोध का कारण तो सुना।

दोहा 26 के अंतर्गत
चौपाई

अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा॥ कहु केहि रंकहि करौं नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू॥ १ ॥

अर्थ:

हे प्रिये! किसने तेरा अनिष्ट किया? किसके दो सिर हैं? यमराज किसको लेना (अपने लोक को ले जाना) चाहते हैं ? कह, किस कंगाल को राजा कर दूँ या किस राजा को देश से निकाल दूँ।

चौपाई

सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी॥ जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू॥ २ ॥

अर्थ:

तेरा शत्रु अमर (देवता) भी हो, तो मैं उसे भी मार सकता हूँ। बेचारे कीड़े-मकोड़े-सरीखे नर-नारी तो चीज ही क्या हैं। हे सुन्दरि! तू तो मेरा स्वभाव जानती ही है कि मेरा मन सदा तेरे मुखरूपी चन्द्रमा का चकोर है।

चौपाई

प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें॥ जौं कछु कहौं कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही॥ ३ ॥

अर्थ:

हे प्रिये! मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सर्वस्व (सम्पत्ति), पुत्र, यहाँ तक कि मेरे प्राण भी, ये सब तेरे वश में (अधीन) हैं। यदि मैं तुझसे कुछ कपट करके कहता होऊँ तो हे भामिनी! मुझे सौ बार राम की सौगंध है।

चौपाई

बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता॥ घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥ ४ ॥

अर्थ:

तू हँसकर (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी मनचाही बात माँग ले और अपने मनोहर अंगों को आभूषणों से सजा। मौका-बेमौका तो मन में विचारकर देख। हे प्रिये! जल्दी इस बुरे वेष को त्याग दे।

दोहा

यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद। भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद॥ २६ ॥

अर्थ:

यह सुनकर और मन में रामजी की बड़ी सौगन्ध को विचारकर मन्दबुद्धि कैकेयी हँसती हुई उठी और गहने पहनने लगी; मानो कोई भीलनी मृग को देखकर फंदा तैयार कर रही हो !।

दोहा 27 के अंतर्गत
चौपाई

पुनि कह राउ सुहृद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी॥ भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा॥ १ ॥

अर्थ:

अपने जी में कैकेयी को सुहृद् जानकर राजा दशरथजी प्रेम से पुलकित होकर कोमल और सुन्दर वाणी से फिर बोले--हे भामिनि! तेरा मनचाहा हो गया। नगर में घर-घर आनन्द के बधावे बज रहे हैं।

चौपाई

रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू॥ दलकि उठेउ सुनि हृदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू॥ २ ॥

अर्थ:

मैं कल ही राम को युवराज-पद दे रहा हूँ। इसलिये हे सुनयनी! तू मंगल-साज सज। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा (फटने लगा)। मानो पका हुआ बालतोड़ (फोड़ा) छू गया हो।

चौपाई

ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई॥ लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई॥ ३ ॥

अर्थ:

ऐसी भारी पीड़ा को भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोर की स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती (जिसमें उसका भेद न खुल जाय)। राजा उसकी कपट-चतुराई को नहीं लख रहे हैं। क्योंकि वह करोड़ों कुटिलों की शिरोमणि गुरु मन्थरा की पढ़ायी हुई है।

चौपाई

जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू॥ कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

यद्यपि राजा नीति में निपुण हैं; परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है। फिर वह कपटयुक्त प्रेम बढ़ाकर (ऊपर से प्रेम दिखाकर) नेत्र और मुँह मोड़कर हँसती हुई बोली--।

दोहा

मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु। देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु॥ २७ ॥

अर्थ:

हे प्रियतम! आप माँग-माँग तो कहा करते हैं, पर देते-लेते कभी कुछ भी नहीं। आपने दो वरदान देने को कहा था, उनके भी मिलने में सन्देह है।

दोहा 28 के अंतर्गत
चौपाई

जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई॥ थाती राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ॥ १ ॥

अर्थ:

राजा ने हँसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मर्म (मतलब) समझा। मान करना तुम्हें परम प्रिय है। तुमने उन वरों को थाती (धरोहर) रखकर फिर कभी माँगा ही नहीं और मेरा भूलने का स्वभाव होने से मुझे भी वह प्रसंग याद नहीं रहा।

चौपाई

झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू॥ रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥ २ ॥

अर्थ:

मुझे झूठ-मूठ दोष मत दो। चाहे दो के बदले चार माँग लो। रघुकुल में सदासे यही रीति चली आयी है कि प्राण भले ही चले जायूँ, पर वचन नहीं जाता।

चौपाई

नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा॥ सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए॥ ३ ॥

अर्थ:

असत्य के समान पापों का समूह भी नहीं है। क्या करोड़ों घुँघचियाँ मिलकर भी कहीं पहाड़ के समान हो सकती हैं। 'सत्य' ही समस्त उत्तम सुकृतों (पुण्यों) की जड़ है। यह बात वेद-पुराणों में प्रसिद्ध है और मनुजी ने भी यही कहा है।

चौपाई

तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई॥ बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली॥ ४ ॥

अर्थ:

उस पर मेरे द्वारा श्रीरामजी की शपथ कर आई (मुँह से निकल पड़ी)। श्रीरघुनाथजी मेरे सुकृत (पुण्य) और स्नेह की सीमा हैं। इस प्रकार बात पक्की कराके दुर्बुद्धि कैकेयी हँसकर बोली, मानो उसने कुमत (बुरे विचार) रूपी दुष्ट पक्षी (बाज) की कुलही (आँखों पर की टोपी) खोल दी।

दोहा

भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु। भिल्लिनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु॥ २८ ॥

अर्थ:

राजा का मनोरथ सुन्दर वन है, सुख सुन्दर पक्षियों का समुदाय है। उस पर भीलनी की तरह कैकेयी अपना वचनरूपी भयंकर बाज छोड़ना चाहती है।

दोहा 29 के अंतर्गत
चौपाई

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका॥ मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥ १ ॥

अर्थ:

[वह बोली--] हे प्राणप्यारे! सुनिये, मेरे मन को भाने वाला एक वर तो दीजिये, भरत को राजतिलक; और हे नाथ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, मेरा मनोरथ पूरा कीजिये--।

चौपाई

तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी॥ सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥ २ ॥

अर्थ:

तपस्वियों के वेष में विशेष उदासीन भाव से (राज्य और कुटुम्ब आदि की ओर से भलीभाँति उदासीन होकर विरक्त मुनियों की भाँति) राम चौदह वर्ष तक वन में निवास करें। कैकेयी के कोमल (विनययुक्त) वचन सुनकर राजा के हृदय में ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमा की किरणों के स्पर्श से चकवा विकल हो जाता है।

चौपाई

गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा॥ बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू॥ ३ ॥

अर्थ:

राजा सहम गये, उनसे कुछ कहते न बना, मानो बाज वन में बटेर पर झपटा हो। राजा का रंग बिलकुल उड़ गया, मानो ताड़ के पेड़ को बिजली ने मारा हो (जैसे ताड़ के पेड़ पर बिजली गिरने से वह झुलसकर बदरंगा हो जाता है, वही हाल राजाका हुआ)।

चौपाई

माथें हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन॥ मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला॥ ४ ॥

अर्थ:

माथे पर हाथ रखकर, दोनों नेत्र बंद करके राजा ऐसे सोच करने लगे, मानो साक्षात् सोच ही शरीर धारण करके सोच कर रहा हो। [वे सोचते हैं--हाय!] मेरा मनोरथरूपी कल्पवृक्ष फूल चुका था, परन्तु फलते समय कैकेयी ने हथिनी की तरह उसे जड़ समेत उखाड़कर नष्ट कर डाला।

चौपाई

अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हिसि अचल बिपति कै नेईं॥ ५ ॥

अर्थ:

कैकेयी ने अवध को उजाड़ कर दिया और विपत्ति की अचल (सुदृढ़) नींव डाल दी।

दोहा

कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास। जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास॥ २९ ॥

अर्थ:

किस अवसर पर क्या हो गया। स्त्री का विश्वास करके मैं वैसे ही मारा गया, जैसे योग की सिद्धि फल के समय योगी को अविद्या नष्ट कर देती है।

दोहा 30 के अंतर्गत
चौपाई

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा॥ भरतु कि राउर पूत न होंही। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार राजा मन-ही-मन झींख रहे हैं। राजा का ऐसा बुरा हाल देखकर दुर्बुद्धि कैकेयी मन में बुरी तरह से क्रोधित हुई। [और बोली--] क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं? क्या मुझे आप दाम देकर खरीद लाये हैं? (क्या मैं आपकी विवाहिता पत्नी नहीं हूँ?)

चौपाई

जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारें॥ देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं॥ २ ॥

अर्थ:

जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिये—हाँ कीजिये या नहीं कीजिये। आप रघुकुल में सत्यसंध [सत्यप्रतिज्ञ] हैं।

चौपाई

देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहु सत्य जग अपजसु लेहू॥ सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना॥ ३ ॥

अर्थ:

आपने ही वर देने को कहा था, अब भले ही न दीजिये। सत्य को छोड़ दीजिये और जगत् में अपयश लीजिये। सत्य की बड़ी सराहना करके वर देने को कहा था। समझा था कि यह चबेना ही माँग लेगी!।

चौपाई

सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा॥ अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई॥ ४ ॥

अर्थ:

राजा शिबि, दधीचि और बलि ने जो कुछ कहा, शरीर और धन त्यागकर भी उन्होंने अपने वचन की प्रतिज्ञा को निभाया। कैकेयी बहुत ही कड़वे वचन कह रही है, मानो जले पर नमक छिड़क रही हो।

दोहा

धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ। सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ॥ ३० ॥

अर्थ:

धर्म की धुरी को धारण करनेवाले राजा दशरथ ने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लंबी साँस लेकर इस प्रकार कहा कि इसने मुझे बड़े कुठौर मारा (ऐसी कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे बच निकलना कठिन हो गया)।

दोहा 31 के अंतर्गत
चौपाई

आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥ मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई॥ १ ॥

अर्थ:

प्रचण्ड क्रोध से जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखायी पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार नंगी (म्यान से बाहर) खड़ी हो। कुबुद्धि उस तलवार की मूठ है, निष्ठुरता उसकी धार है और वह कुबरी (मन्थरा) रूपी सान पर धरकर तेज की गयी है।

चौपाई

लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा॥ बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती॥ २ ॥

अर्थ:

राजा ने देखा कि यह [तलवार] बड़ी ही भयानक और कठोर है [और सोचा--] क्या सत्य ही यह मेरा जीवन लेगी? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रता के साथ उसे (कैकेयी को) प्रिय लगनेवाली वाणी बोले--।

चौपाई

प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥ मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरु साखी॥ ३ ॥

अर्थ:

हे प्रिये! बुरी तरह के वचन कैसे कह रही हो? विश्वास और प्रेम को छोड़कर ऐसे वचन क्यों कह रही हो। मेरे तो भरत और राम दोनों आँखें हैं; यह मैं शंकरजी की साक्षी देकर सत्य कहता हूँ।

चौपाई

अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता॥ सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं अवश्य सबेरे ही दूत भेजूँगा। दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) सुनते ही तुरंत आ जायँगे। अच्छा दिन (शुभ मुहूर्त) शोधवाकर, सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरत को राज्य दे दूँगा।

दोहा

लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति। मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति॥ ३१ ॥

अर्थ:

राम को राज्य का लोभ नहीं है और भरत पर उनका बहुत प्रेम है। मैं ही अपने मन में बड़े-छोटे का विचार करके राजनीति का पालन कर रहा था (बड़े को राजतिलक देने जा रहा था)।

दोहा 32 के अंतर्गत
चौपाई

राम सपथ सत कहउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ॥ मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें॥ १ ॥

अर्थ:

राम की सौ सौगंध खाकर मैं स्वभाव से ही कहता हूँ कि राम की माता ने [इस विषय में] मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। अवश्य ही मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया। इसी से मेरा मनोरथ खाली गया।

चौपाई

रिस परिहरु अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू॥ एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा॥ २ ॥

अर्थ:

अब क्रोध छोड़ दे और मंगल साज सजाओ। कुछ दिनों बाद भरत युवराज हो जायँगे। एक ही बात का मुझे दुःख लगा कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड़चन का माँगा।

चौपाई

अजहूँ हृदउ जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा॥ कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू॥ ३ ॥

अर्थ:

उसकी आँच से अब भी मेरा हृदय जल रहा है। यह दिल्लगी में, क्रोध में अथवा सचमुच ही (वास्तव में) सच्चा है? क्रोध को त्यागकर राम का अपराध तो बता। सब कोई तो कहते हैं कि राम बड़े ही साधु हैं।

चौपाई

तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू॥ जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला॥ ४ ॥

अर्थ:

तू स्वयं भी राम की सराहना करती और उन पर स्नेह किया करती थी। अब यह सुनकर मुझे सन्देह हो गया है [कि तुम्हारी प्रशंसा और स्नेह कहीं झूठे तो न थे?] जिसका स्वभाव शत्रु के लिए भी अनुकूल है, वह माता के प्रतिकूल आचरण क्यों करेगा?

दोहा

प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु। जेहिं देखौं अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु॥ ३२ ॥

अर्थ:

हे प्रिये! हँसी और क्रोध छोड़ दे और विवेक (उचित-अनुचित) विचारकर वर माँग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरत का राज्याभिषेक देख सकूँ।

दोहा 33 के अंतर्गत
चौपाई

जिऐ मीन बरु बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना॥ कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

मछली चाहे बिना पानी के जीती रहे और साँप भी चाहे बिना मणि के दीन-दुखी होकर जीता रहे। परन्तु मैं स्वभाव से ही कहता हूँ, मन में [जरा भी] छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन राम के बिना नहीं है।

चौपाई

समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना॥ सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई॥ २ ॥

अर्थ:

हे चतुर प्रिये! जी में समझकर देख, मेरा जीवन श्रीराम के दर्शन के अधीन है। राजा के मृदु वचन सुनकर दुर्बुद्धि कैकेयी अत्यन्त जल रही है। मानो अग्नि में घी की आहुतियाँ पड़ रही हैं।

चौपाई

कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया॥ देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

आप करोड़ों उपाय क्यों न करें, यहाँ आपकी माया नहीं लगेगी। देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मुझे बहुत प्रपंच नहीं सुहाते।

चौपाई

रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने॥ जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका॥ ४ ॥

अर्थ:

राम साधु हैं, आप साधु सयाने हैं और राम माता भली हैं; मैंने सबको पहचान लिया है। जैसा कौसिलाँ मोर भल ताका, तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।

दोहा

होत प्रातु मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं। मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं॥ ३३ ॥

अर्थ:

सबेरा होते ही मुनि-वेष धारण कर यदि राम वन को नहीं जाते, तो हे राजन्! मन में समझ लीजिए कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश [होगा]।

दोहा 34 के अंतर्गत
चौपाई

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥ पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥ १ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोध की नदी उमड़ी हो। वह नदी पापरूपी पहाड़ से प्रकट हुई है और क्रोधरूपी जल से भरी है; [ऐसी भयानक है कि] देखी नहीं जाती!

चौपाई

दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला॥ २ ॥

अर्थ:

दोनों वरदान उस नदी के दो किनारे हैं, कैकेयी का कठिन हठ ही उसकी [तीव्र] धारा है और कुबरी (मन्थरा) के वचनों की प्रेरणा ही भँवर है। [वह क्रोधरूपी नदी] राजा दशरथरूपी वृक्ष को जड़-मूल से ढहाती हुई विपत्ति रूपी समुद्र की ओर [सीधी] चली है।

चौपाई

लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥ गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥ ३ ॥

अर्थ:

राजा ने समझ लिया कि बात सचमुच सच्ची है, स्त्री के बहाने मेरी मृत्यु ही सिर पर नाच रही है। [तदनन्तर राजाने कैकेयी के] चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि तू सूर्यकुल [रूपी वृक्ष] के लिये कुल्हाड़ी मत बन।

चौपाई

मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥ राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥ ४ ॥

अर्थ:

तू मेरा मस्तक माँग ले, मैं तुझे अभी दे दूँ। पर राम के विरह में मुझे मत मार। जिस किसी प्रकार से हो तू राम को रख ले। नहीं तो जन्म भर तेरी छाती जलेगी।

दोहा

देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ। कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ॥ ३४ ॥

अर्थ:

राजा ने देखा कि रोग असाध्य है, तब वे अत्यन्त आर्त वाणी से 'हा राम! हा राम! हा रघुनाथ!' कहते हुए सिर पीटकर जमीन पर गिर पड़े।

दोहा 35 के अंतर्गत
चौपाई

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता॥ कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी॥ १ ॥

अर्थ:

राजा व्याकुल हो गये, उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनी ने कल्पवृक्ष को उखाड़ फेंका हो। कण्ठ सूख गया, मुख से बात नहीं निकलती, मानो पानी के बिना पाठीनु दीन मछली तड़प रही हो।

चौपाई

पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई॥ जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ॥ २ ॥

अर्थ:

कैकेयी फिर कड़वे और कठोर वचन बोली, मानो घाव में जहर भर रही हो। [कहती है--] जो अन्त में ऐसा ही करना था, तो आपने 'माँग, माँग' किस बल पर कहा था।

चौपाई

दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला॥ दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई॥ ३ ॥

अर्थ:

हे राजा! ठहाका मारकर हँसना और गाल फुलाना-क्या ये दोनों एक साथ हो सकते हैं? दानी भी कहाना और कंजूसी भी करना। क्या रजपूती में क्षेम-कुशल भी रह सकती है? (लड़ाई में बहादुरी भी दिखावें और कहीं चोट भी न लगे!)।

चौपाई

छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू॥ तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी॥ ४ ॥

अर्थ:

या तो वचन (प्रतिज्ञा) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये। यों असहाय स्त्री की भाँति रोइये-पीटिये नहीं। सत्यसंध के लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी--सब तिनके के बराबर कहे गये हैं।

दोहा

मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर। लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर॥ ३५ ॥

अर्थ:

कैकेयी के मर्मभेदी वचन सुनकर राजा ने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है। मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वही तुझसे यह सब कहला रहा है।

दोहा 36 के अंतर्गत
चौपाई

चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें॥ सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू॥ १ ॥

अर्थ:

भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते। होनहारवश तेरे ही जी में कुमति आ बसी। यह सब मेरे पापों का परिणाम है, जिससे कुसमय में विधाता विपरीत हो गया।

चौपाई

सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई॥ करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई॥ २ ॥

अर्थ:

[तेरी उजाड़ी हुई] यह सुन्दर अयोध्या फिर भलीभाँति बसेगी और समस्त गुणों के धाम श्रीराम की प्रभुता भी होगी। सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकों में श्रीराम की बड़ाई होगी।

चौपाई

तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँन मिटिहि न जाइहि काऊ॥ अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई॥ ३ ॥

अर्थ:

केवल तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरने पर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जायगा। अब तुझे जो अच्छा लगे वही कर। मुँह छिपाकर मेरी आँखों की ओट जा बैठ (अर्थात्‌ मेरे सामने से हट जा, मुझे मुँह न दिखा)।

चौपाई

जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी॥ फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारू लागी॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ कि जब तक मैं जीता रहूँ, तब तक फिर कुछ न कहना (अर्थात्‌ मुझसे न बोलना)। अरी अभागिनी! फिर तू अन्त में पछतायेगी जो तू नहारू (ताँत) के लिये गाय को मार रही है।

दोहा

परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु। कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु॥ ३६ ॥

अर्थ:

राजा करोड़ों प्रकार से (बहुत तरह से) समझाकर [और यह कहकर] कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वी पर गिर पड़े। पर कपट करने में चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, मानो [मौन होकर] मसान जगा रही हो (श्मशान में बैठकर प्रेतमन्त्र सिद्ध कर रही हो)।

दोहा 37 के अंतर्गत
चौपाई

राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू॥ हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई॥ १ ॥

अर्थ:

राजा 'राम-राम' रट रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी पंख के बिना बेहाल हो। वे अपने हृदय में मनाते हैं कि सबेरा न हो, और कोई जाकर श्रीरामचन्द्रजी से यह बात न कहे।

चौपाई

उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर॥ भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई॥ २ ॥

अर्थ:

हे रघुकुल के गुरु (बड़ेरे मूलपुरुष) सूर्य भगवान्‌! आप अपना उदय न करें। अयोध्या को [बेहाल] देखकर आपके हृदय में बड़ी पीड़ा होगी। राजा की प्रीति और कैकेयी की निष्ठुरता दोनों को ब्रह्मा ने सीमा तक रचकर बनाया है (अर्थात् राजा प्रेम की सीमा हैं और कैकेयी निष्ठुरता की)।

चौपाई

बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा॥ पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक॥ ३ ॥

अर्थ:

विलाप करते-करते ही राजा को सबेरा हो गया। राजद्वार पर वीणा, बाँसुरी और शंख की ध्वनि होने लगी। भाट लोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये गुणों का गान कर रहे हैं। सुनने पर राजा को वे बाण-जैसे लगते हैं।

चौपाई

मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें॥ तेहि निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू॥ ४ ॥

अर्थ:

राजा को ये सब मंगल-साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पति के साथ सती होने वाली स्त्री को आभूषण! श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की लालसा और उत्साह के कारण उस रात्रि में किसी को भी नींद नहीं आयी।

दोहा

द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि। जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि॥ ३७ ॥

अर्थ:

राजद्वार पर मन्त्रियों और सेवकों की भीड़ लगी है। वे सब सूर्य को उदय हुआ देखकर कहते हैं कि ऐसा कौन-सा विशेष कारण है कि अवधपति दशरथजी अभी तक नहीं जागे?

दोहा 38 के अंतर्गत
चौपाई

पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा॥ जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई॥ १ ॥

अर्थ:

राजा नित्य ही रात के पिछले पहर जाग जाया करते हैं, किन्तु आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। हे सुमन्त्र! जाओ, जाकर राजा को जगाओ। उनकी आज्ञा पाकर हम सब काम करें।

चौपाई

गए सुमंत्रु तब राउर माहीं। देखि भयावन जात डेराहीं॥ धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा॥ २ ॥

अर्थ:

तब सुमन्त्र राजमहल में गये, पर महल को भयानक देखकर वे जाते हुए डर रहे हैं। [ऐसा लगता है] मानो दौड़कर काट खायेगा, उसकी ओर देखा भी नहीं जाता। मानो विपत्ति और विषाद ने वहाँ डेरा डाल रखा हो।

चौपाई

पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेहिं भवन भूप कैकेई॥ कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई॥ ३ ॥

अर्थ:

पूँछने पर कोई जवाब नहीं देता; वे उस महल में गये, जहाँ राजा और कैकेयी थे। 'जय-जीव' कहकर सिर नवाकर (वन्दना करके) बैठे और राजा की दशा देखकर तो वे सूख ही गये।

चौपाई

सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ॥ सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूँछी॥ ४ ॥

अर्थ:

[देखा कि--] राजा सोच से व्याकुल हैं, चेहरे का रंग उड़ गया है। जमीन पर ऐसे पड़े हैं, मानो कमल जड़ छोड़कर (जड़ से उखड़कर) [मुर्झाया] पड़ा हो। मन्त्री मारे डर के कुछ पूछ नहीं सकते। तब अशुभ से भरी हुई और शुभ से विहीन कैकेयी बोली--।

दोहा

परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु। रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु॥ ३८ ॥

अर्थ:

राजा को रात भर नींद नहीं आयी, इसका कारण जगदीश्वर ही जानें। इन्होंने 'राम-राम' रटकर सबेरा कर दिया, परन्तु इसका भेद राजा कुछ भी नहीं बतलाते।

दोहा 39 के अंतर्गत
चौपाई

आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई॥ चलेउ सुमंत्रु राय रुख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी॥ १ ॥

अर्थ:

तुम जल्दी राम को बुला लाओ। तब आकर समाचार पूछना। राजा का रुख जानकर सुमन्त्रजी चले, समझ गये कि रानी ने कुछ कुचाल की है।

चौपाई

सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ॥ उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूँछहिं सकल देखि मनु मारें॥ २ ॥

अर्थ:

सुमन्त्र सोच से व्याकुल हैं, रास्ते पर पैर नहीं पड़ता (आगे बढ़ा नहीं जाता), [सोचते हैं--] रामजी को बुलाकर राजा क्या कहेंगे? किसी तरह हृदय में धीरज धरकर वे द्वार पर गये। सब लोग उनको मनमारे (उदास) देखकर पूछने लगे।

चौपाई

समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका॥ राम सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा॥ ३ ॥

अर्थ:

सब लोगों का समाधान करके (किसी तरह समझा-बुझाकर) सुमन्त्र वहाँ गये, जहाँ सूर्यकुल के तिलक श्रीरामचन्द्रजी थे। श्रीरामचन्द्रजी ने सुमन्त्र को आते देखा तो पिता के समान समझकर उनका आदर किया।

चौपाई

निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई॥ रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के मुख को देखकर और राजा की आज्ञा सुनाकर वे रघुकुल के दीपक श्रीरामचन्द्रजी को [अपने साथ] लिवा चले। श्रीरामचन्द्रजी मन्त्री के साथ बुरी तरह से (बिना किसी लवाजमे के) जा रहे हैं, यह देखकर लोग जहाँ-तहाँ विषाद कर रहे हैं।

दोहा

जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु॥ सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु॥ ३९ ॥

अर्थ:

रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी ने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त ही बुरी हालत में पड़े हैं, मानो सिंहनी को देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो।