मागु माथ अबहीं देउँ तोही

चौपाई ४, दोहा ३४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥ राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥ ४ ॥

अर्थ

तू मेरा मस्तक माँग ले, मैं तुझे अभी दे दूँ। पर राम के विरह में मुझे मत मार। जिस किसी प्रकार से हो तू राम को रख ले। नहीं तो जन्म भर तेरी छाती जलेगी।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।

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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना