जद्यपि नीति निपुन नरनाहू

चौपाई ४, दोहा २७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू॥ कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी॥ ४ ॥

अर्थ

यद्यपि राजा नीति में निपुण हैं; परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है। फिर वह कपटयुक्त प्रेम बढ़ाकर (ऊपर से प्रेम दिखाकर) नेत्र और मुँह मोड़कर हँसती हुई बोली--।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।

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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना