सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का
चौपाई १, दोहा २९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका॥ मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी॥ १ ॥
अर्थ
[वह बोली--] हे प्राणप्यारे! सुनिये, मेरे मन को भाने वाला एक वर तो दीजिये, भरत को राजतिलक; और हे नाथ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, मेरा मनोरथ पूरा कीजिये--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना