जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें
चौपाई २, दोहा ३० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारें॥ देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं॥ २ ॥
अर्थ
जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण-सा लगा तो आप सोच-समझकर बात क्यों नहीं कहते? उत्तर दीजिये—हाँ कीजिये या नहीं कीजिये। आप रघुकुल में सत्यसंध [सत्यप्रतिज्ञ] हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना