सोच बिकल बिबरन महि परेऊ
सोच बिकल बिबरन महि परेऊ
चौपाई ४, दोहा ३८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ॥ सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूँछी॥ ४ ॥
अर्थ
[देखा कि--] राजा सोच से व्याकुल हैं, चेहरे का रंग उड़ गया है। जमीन पर ऐसे पड़े हैं, मानो कमल जड़ छोड़कर (जड़ से उखड़कर) [मुर्झाया] पड़ा हो। मन्त्री मारे डर के कुछ पूछ नहीं सकते। तब अशुभ से भरी हुई और शुभ से विहीन कैकेयी बोली--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना