श्रीराम-कैकेयी-संवाद
कैकेयी वनवास और भरताभिषेक की बात कहती है, और श्रीरामजी उसे सहज भाव से स्वीकार कर लेते हैं। वे पिता के वचन को धर्म मानकर बिना क्षोभ के वन जाने का निश्चय करते हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ६ / ४९
प्रकरण पाठ
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू॥ सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरीं गनि लेई॥ १ ॥
अर्थ:
राजा के ओठ सूख रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणि के बिना साँप दुःखी हो रहा हो। पास ही क्रोध से भरी कैकेयी को देखा, मानो [साक्षात्] मृत्यु ही बैठी [राजा के जीवन की अन्तिम] घड़ियाँ गिन रही हो।
करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ॥ तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी का स्वभाव कोमल और करुणामय है। उन्होंने [अपने जीवन में] पहली बार यह दुःख देखा; इससे पहले कभी उन्होंने दुःख सुना भी न था। तो भी समय का विचार करके हृदय में धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनों से माता कैकेयी से पूछा--।
मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन॥ सुनहु राम सबु कारनु एहू। राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू॥ ३ ॥
अर्थ:
हे माता! मुझे पिताजी के दुःख का कारण कहो ताकि जिससे उसका निवारण हो (दुःख दूर हो) वह यत्न किया जाय। [कैकेयी ने कहा--] हे राम! सुनो, सारा कारण यही है कि राजा का तुम पर बहुत स्नेह है।
जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू॥ सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई॥ २ ॥
अर्थ:
[इस सारे साज-सामान के साथ] मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीर का शरीर धारण करके धनुषविद्या सीख रहा है। श्रीरघुनाथजी को सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है, मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किये हुए हो।
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी॥ तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा॥ ४ ॥
अर्थ:
हे माता! सुनो, वही पुत्र बड़भागी है, जो पिता-माता के वचनों का अनुरागी (पालन करनेवाला) है। [आज्ञा-पालन के द्वारा] माता-पिता को सन्तुष्ट करनेवाला पुत्र, हे जननी! सारे संसार में दुर्लभ है।
भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू॥ जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा॥ १ ॥
अर्थ:
और प्राणप्रिय भरत राज्य पावेंगे। [इन सभी बातों को देखकर यह प्रतीत होता है कि] आज विधाता सब प्रकार से मुझे सम्मुख हैं (मेरे अनुकूल हैं)। यदि ऐसे काम के लिये भी मैं वन को न जाऊँ तो मूर्खों के समाज में सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिये।
अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी॥ थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी॥ ३ ॥
अर्थ:
हे माता! मुझे एक ही दुःख विशेष रूप से हो रहा है, वह महाराज को अत्यन्त व्याकुल देखकर। इस थोड़ी-सी बात के लिये ही पिताजी को इतना भारी दुःख हो, हे माता! मुझे इस बात पर विश्वास नहीं होता।
राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि तें कछु बड़ अपराधू॥ जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सति भाऊ॥ ४ ॥
अर्थ:
क्योंकि महाराज तो बड़े ही धीर और गुणों के अथाह समुद्र हैं। अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है, जिसके कारण महाराज मुझसे कुछ नहीं कहते। तुम्हें मेरी सौगन्ध है, माता! तुम सच-सच कहो।
तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता॥ राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू॥ २ ॥
अर्थ:
हे तात! तुम अपराध के योग्य नहीं हो (तुमसे माता-पिता का अपराध बन पड़े, यह सम्भव नहीं)। तुम तो माता-पिता और भाइयों को सुख देनेवाले हो। हे राम! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सत्य है। तुम पिता-माता के बचनों में तत्पर हो।
पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई॥ तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे॥ ३ ॥
अर्थ:
मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ, तुम पिता को समझाकर वही बात कहो जिससे चौथेपन (बुढ़ापे) में इनका अपयश न हो। जिस पुण्य ने इनको तुम-जैसे पुत्र दिये हैं उसका निरादर करना उचित नहीं।
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे॥ रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए॥ ४ ॥
अर्थ:
कैकेयी के बुरे मुख में ये शुभ वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देश में गया आदिक तीर्थ! श्रीरामचन्द्रजी को माता कैकेयी के सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गङ्गाजी में जाकर [अच्छे-बुरे सभी प्रकार के] जल शुभ, सुन्दर हो जाते हैं।