कैकेयी का कोपभवन में जाना

मंथरा की बातों से विचलित कैकेयी कोपभवन में जा बैठती है। यहीं से अयोध्या के आनंदमय वातावरण पर संकट की छाया गहराने लगती है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी॥ तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा॥ १ ॥

अर्थ:

कुबरी को रानी ने प्राणों के समान प्रिय समझकर बार-बार उसकी बड़ी बुद्धि का बखान किया और बोली--संसार में मेरा तेरे समान हितकारी और कोई नहीं है। तू मुझ बहे जाती हुई के लिए सहारा हुई है।

चौपाई

जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली॥ बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनी कैकेई॥ २ ॥

अर्थ:

यदि विधाता कल मेरा मनोरथ पूरा कर दें तो हे सखी! मैं तुझे आँखों की पुतली बना लूँ। इस प्रकार दासी को बहुत तरह से आदर देकर कैकेयी कोपभवन में चली गयी।

चौपाई

बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकई केरी॥ पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा॥ ३ ॥

अर्थ:

विपत्ति बीज है, वर्षा ऋतु दासी है, कैकेयी की कुबुद्धि भूमि हो गयी। उसमें कपट रूपी जल पाकर अंकुर फूट निकला। दोनों वरदान उस अंकुर के दो पत्ते हैं और अंत में इसका दुःख रूप फल होगा।

चौपाई

कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई॥ राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई॥ ४ ॥

अर्थ:

कैकेयी कोप का सब साज सजकर [कोपभवन में] जा सोयी। राज्य करती हुई वह अपनी दुष्ट बुद्धि से नष्ट हो गयी। राजमहल और नगर में धूम-धाम मच रही है। इस कुचाल को कोई कुछ नहीं जानता।

दोहा

प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं सुमंगलचार। एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार॥ २३ ॥

अर्थ:

बड़े ही आनन्दित होकर नगर के सब स्त्री-पुरुष शुभ मङ्गलाचार के साज सज रहे हैं। कोई भीतर जाता है, कोई बाहर निकलता है; राजद्वार में बड़ी भीड़ हो रही है।

दोहा 24 के अंतर्गत
चौपाई

बाल सखा सुनि हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं॥ प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के बालसखा राजतिलक का समाचार सुनकर हृदय में हर्षित होते हैं। वे दस-पाँच मिलकर श्रीरामचन्द्रजी के पास जाते हैं। प्रेम पहचानकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी उनका आदर करते हैं और कोमल वाणी से कुशल-क्षेम पूछते हैं।

चौपाई

फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई॥ को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेहु निबाहनिहारा॥ २ ॥

अर्थ:

अपने प्रिय सखा श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर वे आपस में एक-दूसरे से श्रीरामचन्द्रजी की बड़ाई करते हुए घर लौटते हैं और कहते हैं--संसार में श्रीरघुबीर के समान शील और स्नेह को निभाने वाला कौन है ?

चौपाई

जेहिं जेहिं जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं॥ सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू॥ ३ ॥

अर्थ:

भगवान् हमें यही दें कि हम अपने कर्मवश भ्रमते हुए जिस-जिस योनि में जन्में, वहाँ-वहाँ हम तो सेवक हों और सीतापति श्रीरामचन्द्रजी हमारे स्वामी हों और यह नाता अन्त तक निभ जाय।

चौपाई

अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता हृदयँ अति दाहू॥ को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई॥ ४ ॥

अर्थ:

नगर के सब की ऐसी ही अभिलाषा है। परन्तु कैकेयी के हृदय में बड़ी जलन हो रही है। कुसंगति पाकर कौन नष्ट नहीं होता। नीच के मत के अनुसार चलने से चतुराई नहीं रह जाती।