कैकेयी का कोपभवन में जाना
मंथरा की बातों से विचलित कैकेयी कोपभवन में जा बैठती है। यहीं से अयोध्या के आनंदमय वातावरण पर संकट की छाया गहराने लगती है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४ / ४९
प्रकरण पाठ
कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी॥ तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा॥ १ ॥
अर्थ:
कुबरी को रानी ने प्राणों के समान प्रिय समझकर बार-बार उसकी बड़ी बुद्धि का बखान किया और बोली--संसार में मेरा तेरे समान हितकारी और कोई नहीं है। तू मुझ बहे जाती हुई के लिए सहारा हुई है।
बाल सखा सुनि हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं॥ प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी के बालसखा राजतिलक का समाचार सुनकर हृदय में हर्षित होते हैं। वे दस-पाँच मिलकर श्रीरामचन्द्रजी के पास जाते हैं। प्रेम पहचानकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी उनका आदर करते हैं और कोमल वाणी से कुशल-क्षेम पूछते हैं।
फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई॥ को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेहु निबाहनिहारा॥ २ ॥
अर्थ:
अपने प्रिय सखा श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर वे आपस में एक-दूसरे से श्रीरामचन्द्रजी की बड़ाई करते हुए घर लौटते हैं और कहते हैं--संसार में श्रीरघुबीर के समान शील और स्नेह को निभाने वाला कौन है ?