रामहि देउँ कालि जुबराजू
रामहि देउँ कालि जुबराजू
चौपाई २, दोहा २७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू॥ दलकि उठेउ सुनि हृदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू॥ २ ॥
अर्थ
मैं कल ही राम को युवराज-पद दे रहा हूँ। इसलिये हे सुनयनी! तू मंगल-साज सज। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय दलक उठा (फटने लगा)। मानो पका हुआ बालतोड़ (फोड़ा) छू गया हो।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना