आगें दीखि जरत रिस भारी
आगें दीखि जरत रिस भारी
चौपाई १, दोहा ३१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥ मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई॥ १ ॥
अर्थ
प्रचण्ड क्रोध से जलती हुई कैकेयी सामने इस प्रकार दिखायी पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार नंगी (म्यान से बाहर) खड़ी हो। कुबुद्धि उस तलवार की मूठ है, निष्ठुरता उसकी धार है और वह कुबरी (मन्थरा) रूपी सान पर धरकर तेज की गयी है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना