होत प्रातु मुनिबेष धरि जौं न
होत प्रातु मुनिबेष धरि जौं न
दोहा ३३ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
होत प्रातु मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं। मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं॥ ३३ ॥
अर्थ
सबेरा होते ही मुनि-वेष धारण कर यदि राम वन को नहीं जाते, तो हे राजन्! मन में समझ लीजिए कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश [होगा]।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का दोहा ३३ है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना