ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई
ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई
चौपाई ३, दोहा २७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
ऐसिउ पीर बिहसि तेहिं गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई॥ लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई॥ ३ ॥
अर्थ
ऐसी भारी पीड़ा को भी उसने हँसकर छिपा लिया, जैसे चोर की स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती (जिसमें उसका भेद न खुल जाय)। राजा उसकी कपट-चतुराई को नहीं लख रहे हैं। क्योंकि वह करोड़ों कुटिलों की शिरोमणि गुरु मन्थरा की पढ़ायी हुई है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना