सोच बिकल मग परइ न पाऊ
सोच बिकल मग परइ न पाऊ
चौपाई २, दोहा ३९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ॥ उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूँछहिं सकल देखि मनु मारें॥ २ ॥
अर्थ
सुमन्त्र सोच से व्याकुल हैं, रास्ते पर पैर नहीं पड़ता (आगे बढ़ा नहीं जाता), [सोचते हैं--] रामजी को बुलाकर राजा क्या कहेंगे? किसी तरह हृदय में धीरज धरकर वे द्वार पर गये। सब लोग उनको मनमारे (उदास) देखकर पूछने लगे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना