बिहसि मागु मनभावति बाता

चौपाई ४, दोहा २६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता॥ घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू॥ ४ ॥

अर्थ

तू हँसकर (प्रसन्नतापूर्वक) अपनी मनचाही बात माँग ले और अपने मनोहर अंगों को आभूषणों से सजा। मौका-बेमौका तो मन में विचारकर देख। हे प्रिये! जल्दी इस बुरे वेष को त्याग दे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।

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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना