केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि
छन्द, दोहा २५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
छन्द पाठ
केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई। मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥ दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई। तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई॥
अर्थ
“हे रानी! किसलिए रूठी हो ?' यह कहकर राजा उसे हाथ से स्पर्श करते हैं तो वह उनके हाथ को [झटककर ] हटा देती है और ऐसे देखती है मानो क्रोध में भरी हुई नागिन क्रूर दृष्टि से देख रही हो। दोनों [वरदानों की ] वासनाएँ उस नागिन की दो जीभें हैं और दोनों वरदान दाँत हैं; वह काटने के लिये मर्मस्थान देख रही है। तुलसीदासजी कहते हैं कि राजा दशरथ होनहार के वश में होकर इसे (इस प्रकार हाथ झटकने और नागिन की भाँति देखने को) कामदेव की क्रीड़ा ही समझ रहे हैं॥।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का छन्द, दोहा २५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।