छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू
छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू
चौपाई ४, दोहा ३५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू॥ तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी॥ ४ ॥
अर्थ
या तो वचन (प्रतिज्ञा) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये। यों असहाय स्त्री की भाँति रोइये-पीटिये नहीं। सत्यसंध के लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी--सब तिनके के बराबर कहे गये हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना