तुहूँ सराहसि करसि सनेहू
तुहूँ सराहसि करसि सनेहू
चौपाई ४, दोहा ३२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू॥ जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला॥ ४ ॥
अर्थ
तू स्वयं भी राम की सराहना करती और उन पर स्नेह किया करती थी। अब यह सुनकर मुझे सन्देह हो गया है [कि तुम्हारी प्रशंसा और स्नेह कहीं झूठे तो न थे?] जिसका स्वभाव शत्रु के लिए भी अनुकूल है, वह माता के प्रतिकूल आचरण क्यों करेगा?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना