दोउ बर कूल कठिन हठ धारा
दोउ बर कूल कठिन हठ धारा
चौपाई २, दोहा ३४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा॥ ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला॥ २ ॥
अर्थ
दोनों वरदान उस नदी के दो किनारे हैं, कैकेयी का कठिन हठ ही उसकी [तीव्र] धारा है और कुबरी (मन्थरा) के वचनों की प्रेरणा ही भँवर है। [वह क्रोधरूपी नदी] राजा दशरथरूपी वृक्ष को जड़-मूल से ढहाती हुई विपत्ति रूपी समुद्र की ओर [सीधी] चली है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना