रिस परिहरु अब मंगल साजू
रिस परिहरु अब मंगल साजू
चौपाई २, दोहा ३२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
रिस परिहरु अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू॥ एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा॥ २ ॥
अर्थ
अब क्रोध छोड़ दे और मंगल साज सजाओ। कुछ दिनों बाद भरत युवराज हो जायँगे। एक ही बात का मुझे दुःख लगा कि तूने दूसरा वरदान बड़ी अड़चन का माँगा।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना