मंगल सकल सोहाहिं न कैसें
मंगल सकल सोहाहिं न कैसें
चौपाई ४, दोहा ३७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें॥ तेहि निसि नीद परी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू॥ ४ ॥
अर्थ
राजा को ये सब मंगल-साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पति के साथ सती होने वाली स्त्री को आभूषण! श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन की लालसा और उत्साह के कारण उस रात्रि में किसी को भी नींद नहीं आयी।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।
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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना