जिऐ मीन बरु बारि बिहीना

चौपाई १, दोहा ३३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जिऐ मीन बरु बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना॥ कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं॥ १ ॥

अर्थ

मछली चाहे बिना पानी के जीती रहे और साँप भी चाहे बिना मणि के दीन-दुखी होकर जीता रहे। परन्तु मैं स्वभाव से ही कहता हूँ, मन में [जरा भी] छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन राम के बिना नहीं है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।

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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना