उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर

चौपाई २, दोहा ३७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर॥ भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई॥ २ ॥

अर्थ

हे रघुकुल के गुरु (बड़ेरे मूलपुरुष) सूर्य भगवान्‌! आप अपना उदय न करें। अयोध्या को [बेहाल] देखकर आपके हृदय में बड़ी पीड़ा होगी। राजा की प्रीति और कैकेयी की निष्ठुरता दोनों को ब्रह्मा ने सीमा तक रचकर बनाया है (अर्थात् राजा प्रेम की सीमा हैं और कैकेयी निष्ठुरता की)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में दशरथ-कैकेयी संवाद, दो वरों की माँग और सुमंत्र द्वारा श्रीराम को महल में बुलाने का वर्णन है।

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दशरथ-कैकेयी संवाद, सुमंत्र का राम को बुलाना