श्रीरामजी, लक्ष्मणजी, सीताजी का महाराज दशरथ के पास विदा माँगने जाना, दशरथजी का सीताजी को समझाना
श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी महाराज दशरथ से विदा लेने पहुँचते हैं। दशरथजी स्नेहवश सीताजी को रोकना चाहते हैं, पर वह अटल भाव से वन जाने पर दृढ़ रहती हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण १३ / ४९
प्रकरण पाठ
कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी॥ तन कृस मन दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने॥ २ ॥
अर्थ:
नगर के स्त्री-पुरुष आपस में कह रहे हैं कि विधाता ने खूब बनाकर बात बिगाड़ी! उनके शरीर दुबले, मन दुःखी और मुख मलीन हो रहे हैं। वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे शहद छीन लिये जाने पर मक्खियाँ व्याकुल हों।
सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा॥ औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई॥ ३ ॥
अर्थ:
परन्तु सीताजी का मन श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में अनुरक्त था। इसलिये उन्हें घर अच्छा नहीं लगा और न वन भयानक लगा। फिर और सब लोगों ने भी वन में विपत्तियों की अधिकता बता-बताकर सीताजी को समझाया।
सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी॥ तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू॥ ४ ॥
अर्थ:
मन्त्री सुमन्त्रजी की पत्नी और गुरु वसिष्ठजी की स्त्री अरुन्धतीजी तथा और भी चतुर स्त्रियाँ स्नेह के साथ कोमल वाणी से कहती हैं कि तुमको तो [राजा ने] वनवास दिया नहीं है। इसलिये जो ससुर, गुरु और सास कहें, तुम तो वही करो।