भरतजी का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट में पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिता का शोक और श्राद्ध
मंदाकिनी में स्नान करके भरतजी चित्रकूट पहुँचते हैं और श्रीरामजी, श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी तथा समस्त परिवार से करुण मिलन होता है। पिता महाराज दशरथ के वियोग का शोक प्रकट किया जाता है और श्राद्धादि कर्तव्य संपन्न किए जाते हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३८ / ४९
प्रकरण पाठ
जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना॥ अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता॥ २ ॥
अर्थ:
जगत में यश के पात्र तो चातक और मछली ही हैं, जो अपने नेम और प्रेम को नित्य नया बनाए रखने में निपुण हैं। ऐसा मन में सोचते हुए भरतजी मार्ग में चले जा रहे हैं। उनके सब अंग संकोच और स्नेह से शिथिल हो रहे हैं।
फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी॥ जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
माता की की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरज की धुरी को धारण करनेवाले भरतजी भक्ति के बल से चलते रहते हैं। जब श्रीरघुनाथजी के स्वभाव को समझते हैं, तब मार्ग में उनके पैर जल्दी-जल्दी पड़ने लगते हैं।
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी॥ जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी॥ २ ॥
अर्थ:
जैसे ईति और भीति से दुःखी प्रजा तीनों तापों, ग्रहों और महामारियों से पीड़ित होकर किसी उत्तम देश और उत्तम राज्य में जाकर सुखी हो जाए, भरतजी की गति भी ठीक उसी प्रकार की हो रही है [अधिक वर्षा, न वर्षा, चूहों का उत्पात, टिड्डियाँ, तोते और दूसरे राजा की चढ़ाई—खेतों में बाधा देने वाले इन छः उपद्रवों को 'ईति' कहते हैं]।
भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी॥ सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ॥ ४ ॥
अर्थ:
यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) तथा नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) योद्धा हैं। पर्वत राजधानी है, शान्ति तथा सुबुद्धि दो सुन्दर पवित्र रानियाँ हैं। वह श्रेष्ठ राजा राज्य के सब अंगों से पूर्ण है और श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के आश्रित रहने से उसके चित्त में चाव है।
बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे॥ बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना॥ १ ॥
अर्थ:
वन प्रदेशों में मुनियों के बहुत-से निवासस्थान हैं, मानो शहरों, नगरों, गाँवों और खेड़ों का समूह हो। बहुत-से विचित्र पक्षी और अनेकों पशु ही मानो प्रजाओं का समाज हैं, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं॥ चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन॥ ३ ॥
अर्थ:
पानी के झरने झर रहे हैं और मतवाले हाथी चिघाड़ रहे हैं। वे ही मानो वहाँ अनेक प्रकार के नगाड़े बज रहे हैं। चकवा, चकोर, पपीहा, तोता तथा कोयलों के समूह और सुन्दर हंस प्रसन्न मन से कूज रहे हैं।
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा॥ नील सघन पल्लव फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला॥ २ ॥
अर्थ:
जिन श्रेष्ठ वृक्षों के बीच में एक सुन्दर विशाल बड़ का वृक्ष सुशोभित है, उसको देखकर मन मोहित हो जाता है। उसके पत्ते नीले और सघन हैं और उसमें लाल फल लगे हैं। उसकी घनी छाया सब काल सुख देनेवाली है।
हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका॥ रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी के चरणचिह्न देखकर दोनों भाई ऐसे हर्षित होते हैं मानो दरिद्र पारस पा गया हो। वहाँ की रज को मस्तक पर रखकर हृदय में और नेत्रों में लगाते हैं और श्रीरघुनाथजी के मिलने के समान सुख पाते हैं।
देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा॥ सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला॥ ३ ॥
अर्थ:
भरतजी की अत्यन्त अनिर्वचनीय दशा देखकर वन के पशु, पक्षी और जड़ (वृक्षादि) जीव प्रेम में मग्न हो गये। प्रेम के विशेष वश होने से सखा निषादराज को भी रास्ता भूल गया। तब देवता सुन्दर रास्ता बतलाकर फूल बरसाने लगे।
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे॥ होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को॥ ४ ॥
अर्थ:
भरत के प्रेम की इस स्थिति को देखकर सिद्ध और साधक लोग भी अनुराग से भर गये और उनके स्वाभाविक प्रेम की प्रशंसा करने लगे कि यदि इस पृथ्वीतल पर भरत का जन्म [अथवा प्रेम] न होता, तो जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कौन करता ?।
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर। मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर॥ २३८ ॥
अर्थ:
प्रेम अमृत है, विरह मन्दराचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी ने देवता और साधुओं के हित के लिये स्वयं [इस भरतरूपी गहरे समुद्र को अपने विरहरूपी मन्दराचल से] मथकर यह प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया है।
करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा॥ देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे॥ २ ॥
अर्थ:
आश्रम में प्रवेश करते ही भरतजी का दुःख और दाह (जलन) मिट गया, मानो योगी को परमार्थ (परमतत्त्व) की प्राप्ति हो गयी हो। भरतजी ने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभु के आगे खड़े हैं और पूछे हुए वचन प्रेमपूर्वक कह रहे हैं (पूछी हुई बात का प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं)।
सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें॥ बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू॥ ३ ॥
अर्थ:
सिर पर जटा है। कमर में मुनियों का (वल्कल) वस्त्र बाँधे हैं और उसी में तरकस कसे हैं। हाथ में बाण तथा कंधे पर धनुष है। वेदी पर मुनि तथा साधुओं का समुदाय बैठा है और सीताजी सहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हैं।
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनिबेष कीन्ह रति कामा॥ कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी के वल्कल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है [सीतारामजी ऐसे लगते हैं] मानो रति और कामदेव ने मुनि का वेष धारण किया हो। श्रीरामजी अपने करकमलों से धनुष-बाण फेर रहे हैं, और हँसकर देखते ही जी की जलन हर लेते हैं (अर्थात् जिसकी ओर भी एक बार हँसकर देख लेते हैं, उसी को परम आनन्द और शान्ति मिल जाती है)।
बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने॥ बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा॥ २ ॥
अर्थ:
प्रेमभरे वचनों से लक्ष्मणजी ने पहचान लिया और मन में जान लिया कि भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। [वे श्रीरामजी की ओर मुँह किये खड़े थे, भरतजी पीठ-पीछे थे; इससे उन्होंने देखा नहीं।] अब इस ओर तो भाई भरतजी का सरस प्रेम और उधर स्वामी श्रीरामचन्द्रजी की सेवा की प्रबल 'परवशता'।
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई॥ रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू॥ ३ ॥
अर्थ:
न तो [क्षण भर के लिये भी सेवा से पृथक होकर] मिलते ही बनता है और न [प्रेमवश] छोड़ते (उपेक्षा करते) ही। कोई श्रेष्ठ कवि ही लक्ष्मणजी के चित्त की इस गति (दुविधा) का वर्णन कर सकता है। वे सेवा पर भार रखकर रह गये (सेवा को ही विशेष महत्त्वपूर्ण समझकर उसी में लगे रहे) मानो चढ़ी हुई पतंग को खिलाड़ी (पतंग उड़ानेवाला) खींच रहा हो।
कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा॥ उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा॥ ४ ॥
अर्थ:
लक्ष्मणजी ने प्रेम सहित पृथ्वी पर मस्तक नवाकर कहा—हे रघुनाथजी! भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। यह सुनते ही श्रीरघुनाथजी प्रेम में अधीर होकर उठे। कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण।
अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को॥ सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती॥ ३ ॥
अर्थ:
भरतजी और श्रीरघुनाथजी का प्रेम अगम्य है, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का भी मन नहीं जा सकता। उस प्रेम को मैं कुबुद्धि किस प्रकार कहूँ! भला, गाँडर की ताँत से भी कहीं सुन्दर राग बज सकता है? [तालाबों और झीलों में एक तरह की घास होती है, उसे गाँडर कहते हैं।]
भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई॥ पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे॥ १ ॥
अर्थ:
तब लक्ष्मणजी ललककर (बड़ी उमंग के साथ) छोटे भाई शत्रुघ्न से मिले। फिर उन्होंने निषादराज को हृदय से लगा लिया। फिर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाइयों ने [उपस्थित] मुनियों को प्रणाम किया और इच्छित आशीर्वाद पाकर वे आनन्दित हुए।
सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा॥ पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए॥ २ ॥
अर्थ:
छोटे भाई शत्रुघ्न सहित भरतजी प्रेम में उमँगकर सीताजी के चरणकमलों की रज सिर पर धारण कर बार-बार प्रणाम करने लगे। सीताजी ने उन्हें उठाकर उनके सिर को अपने करकमल से स्पर्श कर (सिर पर हाथ फेरकर) उन दोनों को बैठाया।
सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं॥ सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता॥ ३ ॥
अर्थ:
सीताजी ने मन ही मन आशीर्वाद दिया; क्योंकि वे स्नेह में मग्न हैं, उन्हें देह की सुध-बुध नहीं है। सीताजी को सब प्रकार से अपने अनुकूल देखकर भरतजी सोच-रहित हो गये और उनके हृदय का कल्पित भय जाता रहा।
कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा॥ तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि॥ ४ ॥
अर्थ:
उस समय न तो कोई कुछ कहता है, न कोई कुछ पूछता है। मन प्रेम से परिपूर्ण है, वह अपनी गति से छूँछा (अर्थात् संकल्प-विकल्प और चंचलता से शून्य) है। उस अवसर पर केवट (निषादराज) धीरज धर और हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनती करने लगा—।
रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला॥ एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीरघुनाथजी की भक्ति सुन्दर मंगलों का मूल है, यह कहकर सराहना करते हुए देवता आकाश से फूल बरसाने लगे। वे कहने लगे—जगत् में इसके समान सर्वथा नीच कोई नहीं और वसिष्ठजी के समान बड़ा कौन है ?
सानुज मिलि पल महुँ सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू॥ यह बड़ि बात राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं॥ २ ॥
अर्थ:
उन्होंने लक्ष्मणजी सहित पल भर में सब किसी से मिलकर उनके दुःख और दारुण दाह को दूर कर दिया। श्रीरामचन्द्रजी के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है। जैसे करोड़ों घटों में एक सूर्य की छाया एक साथ ही दीखती है।
गुरतिय पद बंदे दुहु भाईं। सहित बिप्रतिय जे सँग आईं॥ गंग गौरि सम सब सनमानीं। देहिं असीस मुदित मृदु बानीं॥ १ ॥
अर्थ:
फिर दोनों भाइयों ने ब्राह्मणों की स्त्रियों सहित—जो भरतजी के साथ आई थीं—गुरुजी की पत्नी अरुन्धतीजी के चरणों की वन्दना की और उन सबका गंगा जी तथा गौरी जी के समान सम्मान किया। वे सब आनन्दित होकर कोमल वाणी से आशीर्वाद देने लगीं।
गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेंटी संपति अति रंका॥ पुनि जननी चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता॥ २ ॥
अर्थ:
तब दोनों भाई पैर पकड़कर सुमित्राजी की अंका में जा चिपटे। मानो किसी अत्यन्त रंक को सम्पत्ति से भेंट हो गयी हो। फिर दोनों भाई माता के चरणों में गिर पड़े। प्रेम के मारे उनके सारे अंग व्याकुल हो गये।
बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं॥ कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा॥ १ ॥
अर्थ:
सीताजी और सब रानियाँ स्नेह के मारे व्याकुल हैं। तब ज्ञानी गुरु ने सबको बैठ जाने के लिये कहा। फिर मुनिनाथ वसिष्ठजी ने जगत् की गति को मायिक कहकर (अर्थात् जगत् मायाका है, इसमें कुछ भी नित्य नहीं है, ऐसा कहकर) कुछ परमार्थ की कथाएँ कहीं।
मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए॥ ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा॥ ४ ॥
अर्थ:
फिर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी ने श्रीरामजी को समझाया। तब उन्होंने समाज सहित श्रेष्ठ नदी में स्नान किया। उस दिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने निर्जल व्रत किया। मुनि के कहने पर भी किसी ने जल ग्रहण नहीं किया।
करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी॥ जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला॥ १ ॥
अर्थ:
वेदों में जैसा कहा गया है, उसी के अनुसार पिता की क्रिया करके, पापरूपी अंधकार के नष्ट करनेवाले सूर्यरूप श्रीरामचन्द्रजी शुद्ध हुए! जिनका नाम पापरूपी रूई के [तुरंत जला डालने के] लिए अग्नि है; और जिनका स्मरणमात्र समस्त शुभ मङ्गलों का मूल है।
सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस॥ सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते॥ २ ॥
अर्थ:
वे [नित्य शुद्ध-बुद्ध] भगवान् श्रीरामजी शुद्ध हुए। साधुओं की ऐसी सम्मति है कि उनका शुद्ध होना वैसे ही है जैसे तीर्थों के आवाहन से गंगाजी शुद्ध होती हैं! (गंगाजी तो स्वभाव से ही शुद्ध हैं, उनमें जिन तीर्थों का आवाहन किया जाता है, उलटे वे ही गंगाजी के सम्पर्क में आने से शुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार सच्चिदानन्दरूप श्रीराम तो नित्य शुद्ध हैं, उनके संसर्ग से कर्म ही शुद्ध हो गये।) जब शुद्ध हुए दो दिन बीत गये तब श्रीरामचन्द्रजी प्रीति के साथ गुरुजी से बोले--।
सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ॥ बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई॥ ४ ॥
अर्थ:
अतः सबके साथ आप अयोध्यापुरी को पधारिये (लौट जाइये)। आप यहाँ हैं, और राजा अमरावती (स्वर्ग) में हैं (अयोध्या सूनी है)! मैंने बहुत कह डाला, यह सब बड़ी ढिठाई की है। हे गोसाईं! जैसा उचित हो, वैसा ही कीजिये।
राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू॥ सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकूला॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी के वचन सुनकर सारा समाज भयभीत हो गया। मानो बीच समुद्र में जहाज डगमगा गया हो। परन्तु जब उन्होंने गुरु वसिष्ठजी की श्रेष्ठ कल्याणमूलक वाणी सुनी, तो उस जहाज के लिए मानो हवा अनुकूल हो गयी।
पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं॥ मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि॥ २ ॥
अर्थ:
सब लोग पवित्र पयस्विनी नदी में [अथवा पयस्विनी नदी के पवित्र जल में] तीनों समय (सबेरे, दोपहर और सायंकाल) स्नान करते हैं, जिसके दर्शन से ही पापों के समूह नष्ट हो जाते हैं और मंगलमूर्ति श्रीरामचन्द्रजी को दण्डवत् प्रणाम कर-करके उन्हें नेत्र भर-भरकर देखते हैं।
राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं॥ झरना झरहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी॥ ३ ॥
अर्थ:
सब श्रीरामचन्द्रजी के पर्वत (कामदगिरि) और वन को देखने जाते हैं, जहाँ सभी सुख हैं और सभी दुःखों का अभाव है। झरने अमृत के समान जल झरते हैं और तीन प्रकार की (शीतल, मन्द, सुगन्ध) हवा तीनों प्रकार के (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) तापों को हर लेती है।