भरतजी का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट में पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिता का शोक और श्राद्ध

मंदाकिनी में स्नान करके भरतजी चित्रकूट पहुँचते हैं और श्रीरामजी, श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी तथा समस्त परिवार से करुण मिलन होता है। पिता महाराज दशरथ के वियोग का शोक प्रकट किया जाता है और श्राद्धादि कर्तव्य संपन्न किए जाते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३८ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौं सनमानहिं सेवकु मानी॥ मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही॥ १ ॥

अर्थ:

चाहे मुझे मलिन-मन जानकर छोड़ दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें—मेरे तो श्रीरामजी की पनही ही शरण है। श्रीरामजी तो अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सब जन ही का है।

चौपाई

जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना॥ अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता॥ २ ॥

अर्थ:

जगत में यश के पात्र तो चातक और मछली ही हैं, जो अपने नेम और प्रेम को नित्य नया बनाए रखने में निपुण हैं। ऐसा मन में सोचते हुए भरतजी मार्ग में चले जा रहे हैं। उनके सब अंग संकोच और स्नेह से शिथिल हो रहे हैं।

चौपाई

फेरति मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी॥ जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

माता की की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरज की धुरी को धारण करनेवाले भरतजी भक्ति के बल से चलते रहते हैं। जब श्रीरघुनाथजी के स्वभाव को समझते हैं, तब मार्ग में उनके पैर जल्दी-जल्दी पड़ने लगते हैं।

चौपाई

भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी॥ देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू॥ ४ ॥

अर्थ:

उस समय भरत की दशा कैसी है? जैसी जल के प्रवाह में जल-अलि की गति होती है। भरतजी का सोच और प्रेम देखकर उस समय निषाद देह-भूल हो गया।

दोहा

लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु। मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु॥ २३४ ॥

अर्थ:

मङ्गल-शकुन होने लगे। उन्हें सुनकर और विचारकर निषाद कहने लगा—सोच मिटेगा, हर्ष होगा, पर फिर अन्त में विषाद होगा।

दोहा 235 के अंतर्गत
चौपाई

सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने॥ भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी ने सेवक (गुह) के सब वचन सत्य जाने और वे आश्रम के निकट जाकर पहुँच गए। वहाँ के वन और पर्वतों के समूह को देखा तो भरतजी इतने आनन्दित हुए मानो कोई भूखा अच्छा अन्न पा गया हो।

चौपाई

ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी॥ जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी॥ २ ॥

अर्थ:

जैसे ईति और भीति से दुःखी प्रजा तीनों तापों, ग्रहों और महामारियों से पीड़ित होकर किसी उत्तम देश और उत्तम राज्य में जाकर सुखी हो जाए, भरतजी की गति भी ठीक उसी प्रकार की हो रही है [अधिक वर्षा, न वर्षा, चूहों का उत्पात, टिड्डियाँ, तोते और दूसरे राजा की चढ़ाई—खेतों में बाधा देने वाले इन छः उपद्रवों को 'ईति' कहते हैं]।

चौपाई

राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा॥ सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के निवास से वन की सम्पत्ति ऐसी सुशोभित है मानो अच्छे राज्य को पाकर प्रजा सुखी हो। सुहावना वन ही पवित्र देश है। विवेक उसका राजा है और वैराग्य मन्त्री है।

चौपाई

भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी॥ सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) तथा नियम (शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) योद्धा हैं। पर्वत राजधानी है, शान्ति तथा सुबुद्धि दो सुन्दर पवित्र रानियाँ हैं। वह श्रेष्ठ राजा राज्य के सब अंगों से पूर्ण है और श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के आश्रित रहने से उसके चित्त में चाव है।

दोहा

जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु। करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु॥ २३५ ॥

अर्थ:

मोहरूपी राजाको सेनासहित जीतकर विवेकरूपी राजा निष्कण्टक राज्य कर रहा है। उसके नगर में सुख, सम्पत्ति और सुकाल वर्तमान है।

दोहा 236 के अंतर्गत
चौपाई

बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे॥ बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना॥ १ ॥

अर्थ:

वन प्रदेशों में मुनियों के बहुत-से निवासस्थान हैं, मानो शहरों, नगरों, गाँवों और खेड़ों का समूह हो। बहुत-से विचित्र पक्षी और अनेकों पशु ही मानो प्रजाओं का समाज हैं, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

चौपाई

खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा॥ बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा॥ २ ॥

अर्थ:

देखकर सराहना ही बनती है। गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर, भैंस और बैलों को देखकर राज के साज को सराहा जाता है। ये सब वैर छोड़कर जहाँ-तहाँ एक साथ विचरते हैं। यही मानो चतुरङ्गिणी सेना है।

चौपाई

झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं॥ चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन॥ ३ ॥

अर्थ:

पानी के झरने झर रहे हैं और मतवाले हाथी चिघाड़ रहे हैं। वे ही मानो वहाँ अनेक प्रकार के नगाड़े बज रहे हैं। चकवा, चकोर, पपीहा, तोता तथा कोयलों के समूह और सुन्दर हंस प्रसन्न मन से कूज रहे हैं।

चौपाई

अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा॥ बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला॥ ४ ॥

अर्थ:

भौंरों का समूह गुंजार कर रहा है और मोर नाच रहे हैं। मानो उस अच्छे राज्य में चारों ओर मंगल हो रहा है। बेल, वृक्ष, तृण सब फल और फूलों से युक्त हैं। सारा समाज आनन्द और मंगल का मूल बन रहा है।

दोहा

राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु। तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु॥ २३६ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के पर्वत की शोभा देखकर भरतजी के हृदय में अत्यन्त प्रेम हुआ। जैसे तपस्वी नियम की समाप्ति होने पर तपस्या का फल पाकर सुखी होता है।

दोहा 237 के अंतर्गत
चौपाई

तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई।कहेउ भरत सन भुजा उठाई॥ नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला॥ १ ॥

अर्थ:

तब केवट ऊँचे चढ़कर दौड़ा और भुजा उठाकर भरतजी से कहने लगा—हे नाथ! ये जो पाकरि, जामुन, आम और तमाल के विशाल वृक्ष दिखायी देते हैं,

चौपाई

जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा॥ नील सघन पल्लव फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला॥ २ ॥

अर्थ:

जिन श्रेष्ठ वृक्षों के बीच में एक सुन्दर विशाल बड़ का वृक्ष सुशोभित है, उसको देखकर मन मोहित हो जाता है। उसके पत्ते नीले और सघन हैं और उसमें लाल फल लगे हैं। उसकी घनी छाया सब काल सुख देनेवाली है।

चौपाई

मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी॥ ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई॥ ३ ॥

अर्थ:

मानो ब्रह्माजी ने परम शोभा को एकत्र करके अन्धकार और लालिमामयी राशि-सी रच दी है। हे गोसाईं! ये वृक्ष नदी के समीप हैं, जहाँ श्रीराम की पर्णकुटी छायी है।

चौपाई

तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए॥ बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई॥ ४ ॥

अर्थ:

वहाँ तुलसी के बहुत-से सुन्दर वृक्ष सुशोभित हैं, जो कहीं-कहीं सीताजी ने और कहीं लक्ष्मणजी ने लगाये हैं। इसी बड़ की छाया में सीताजी ने अपने हाथों से सुन्दर वेदी बनायी है।

दोहा

जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान। सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान॥ २३७ ॥

अर्थ:

जहाँ सुजान श्रीसीतारामजी मुनिगण सहित बैठकर नित्य आगम, निगम और पुराणों की सब कथा-इतिहास सुनते हैं।

दोहा 238 के अंतर्गत
चौपाई

सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी॥ करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई॥ १ ॥

अर्थ:

सखा के वचन सुनकर और वृक्षों को देखकर भरतजी के नेत्रों में जल उमड़ आया। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले। उनके प्रेम का वर्णन करने में सरस्वतीजी भी सकुचाती हैं।

चौपाई

हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका॥ रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के चरणचिह्न देखकर दोनों भाई ऐसे हर्षित होते हैं मानो दरिद्र पारस पा गया हो। वहाँ की रज को मस्तक पर रखकर हृदय में और नेत्रों में लगाते हैं और श्रीरघुनाथजी के मिलने के समान सुख पाते हैं।

चौपाई

देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा॥ सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला॥ ३ ॥

अर्थ:

भरतजी की अत्यन्त अनिर्वचनीय दशा देखकर वन के पशु, पक्षी और जड़ (वृक्षादि) जीव प्रेम में मग्न हो गये। प्रेम के विशेष वश होने से सखा निषादराज को भी रास्ता भूल गया। तब देवता सुन्दर रास्ता बतलाकर फूल बरसाने लगे।

चौपाई

निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे॥ होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को॥ ४ ॥

अर्थ:

भरत के प्रेम की इस स्थिति को देखकर सिद्ध और साधक लोग भी अनुराग से भर गये और उनके स्वाभाविक प्रेम की प्रशंसा करने लगे कि यदि इस पृथ्वीतल पर भरत का जन्म [अथवा प्रेम] न होता, तो जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कौन करता ?।

दोहा

पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर। मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर॥ २३८ ॥

अर्थ:

प्रेम अमृत है, विरह मन्दराचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी ने देवता और साधुओं के हित के लिये स्वयं [इस भरतरूपी गहरे समुद्र को अपने विरहरूपी मन्दराचल से] मथकर यह प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया है।

दोहा 239 के अंतर्गत
चौपाई

सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा॥ भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन॥ १ ॥

अर्थ:

सखा निषादराज सहित इस मनोहर जोड़े को सघन वन की आड़ के कारण लक्ष्मणजी नहीं देख पाये। भरतजी ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के समस्त सुमंगलों के धाम और सुन्दर पवित्र आश्रम को देखा।

चौपाई

करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा॥ देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे॥ २ ॥

अर्थ:

आश्रम में प्रवेश करते ही भरतजी का दुःख और दाह (जलन) मिट गया, मानो योगी को परमार्थ (परमतत्त्व) की प्राप्ति हो गयी हो। भरतजी ने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभु के आगे खड़े हैं और पूछे हुए वचन प्रेमपूर्वक कह रहे हैं (पूछी हुई बात का प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं)।

चौपाई

सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें॥ बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू॥ ३ ॥

अर्थ:

सिर पर जटा है। कमर में मुनियों का (वल्कल) वस्त्र बाँधे हैं और उसी में तरकस कसे हैं। हाथ में बाण तथा कंधे पर धनुष है। वेदी पर मुनि तथा साधुओं का समुदाय बैठा है और सीताजी सहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हैं।

चौपाई

बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनिबेष कीन्ह रति कामा॥ कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के वल्कल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है [सीतारामजी ऐसे लगते हैं] मानो रति और कामदेव ने मुनि का वेष धारण किया हो। श्रीरामजी अपने करकमलों से धनुष-बाण फेर रहे हैं, और हँसकर देखते ही जी की जलन हर लेते हैं (अर्थात् जिसकी ओर भी एक बार हँसकर देख लेते हैं, उसी को परम आनन्द और शान्ति मिल जाती है)।

दोहा

लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु। ग्यान सभाँ जनु तनु धरें भगति सच्चिदानंदु॥ २३९ ॥

अर्थ:

सुन्दर मुनिमण्डली के बीच में सीताजी और रघुकुलचन्द्र श्रीरामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञान की सभा में साक्षात् भक्ति और सच्चिदानन्द शरीर धारण करके विराजमान हैं।

दोहा 240 के अंतर्गत
चौपाई

सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन॥ पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं। भूतल परे लकुट की नाईं॥ १ ॥

अर्थ:

सानुज सखा समेत भरतजी का मन [प्रेम में] मग्न हो रहा है। हर्ष-शोक, सुख-दुःख आदि सब भूल गये। 'हे नाथ! रक्षा कीजिये, हे गुसाईं! रक्षा कीजिये' ऐसा कहकर वे पृथ्वी पर दण्ड की तरह गिर पड़े।

चौपाई

बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने॥ बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा॥ २ ॥

अर्थ:

प्रेमभरे वचनों से लक्ष्मणजी ने पहचान लिया और मन में जान लिया कि भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। [वे श्रीरामजी की ओर मुँह किये खड़े थे, भरतजी पीठ-पीछे थे; इससे उन्होंने देखा नहीं।] अब इस ओर तो भाई भरतजी का सरस प्रेम और उधर स्वामी श्रीरामचन्द्रजी की सेवा की प्रबल 'परवशता'।

चौपाई

मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई॥ रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू॥ ३ ॥

अर्थ:

न तो [क्षण भर के लिये भी सेवा से पृथक होकर] मिलते ही बनता है और न [प्रेमवश] छोड़ते (उपेक्षा करते) ही। कोई श्रेष्ठ कवि ही लक्ष्मणजी के चित्त की इस गति (दुविधा) का वर्णन कर सकता है। वे सेवा पर भार रखकर रह गये (सेवा को ही विशेष महत्त्वपूर्ण समझकर उसी में लगे रहे) मानो चढ़ी हुई पतंग को खिलाड़ी (पतंग उड़ानेवाला) खींच रहा हो।

चौपाई

कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा॥ उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा॥ ४ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी ने प्रेम सहित पृथ्वी पर मस्तक नवाकर कहा—हे रघुनाथजी! भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। यह सुनते ही श्रीरघुनाथजी प्रेम में अधीर होकर उठे। कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण।

दोहा

बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान। भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान॥ २४० ॥

अर्थ:

कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें जबरदस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया। भरतजी और श्रीरामजी के मिलने की रीतिको देखकर सबको अपनी सुध भूल गयी।

दोहा 241 के अंतर्गत
चौपाई

मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी॥ परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई॥ १ ॥

अर्थ:

मिलन की प्रीति कैसे बखानी जाय? वह तो कविकुल के लिये कर्म, मन, वाणी तीनों से अगम है। दोनों भाई मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को भुलाकर परम प्रेम से पूर्ण हो रहे हैं।

चौपाई

कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई॥ कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा॥ २ ॥

अर्थ:

कहिये, उस श्रेष्ठ प्रेम को कौन प्रकट करे? कवि की बुद्धि किसकी छाया का अनुसरण करे? कवि को तो अक्षर और अर्थ का ही सच्चा बल है। नट ताल की गति के अनुसार ही नाचता है!

चौपाई

अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को॥ सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती॥ ३ ॥

अर्थ:

भरतजी और श्रीरघुनाथजी का प्रेम अगम्य है, जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का भी मन नहीं जा सकता। उस प्रेम को मैं कुबुद्धि किस प्रकार कहूँ! भला, गाँडर की ताँत से भी कहीं सुन्दर राग बज सकता है? [तालाबों और झीलों में एक तरह की घास होती है, उसे गाँडर कहते हैं।]

चौपाई

मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी॥ समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी और श्रीरामचन्द्रजी के मिलने का ढंग देखकर देवता भयभीत हो गये, उनकी धुकधुकी धड़कने लगी। देवगुरु बृहस्पतिजी ने समझाया, तब कहीं वे मूर्ख चेते और फूल बरसाकर प्रशंसा करने लगे।

दोहा

मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम। भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम॥ २४१ ॥

अर्थ:

प्रेम के साथ केवट ने रामजी से भेंट की। बड़े भाव से भरतजी लक्ष्मणजी से प्रणाम करते हुए मिले।

दोहा 242 के अंतर्गत
चौपाई

भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई॥ पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे॥ १ ॥

अर्थ:

तब लक्ष्मणजी ललककर (बड़ी उमंग के साथ) छोटे भाई शत्रुघ्न से मिले। फिर उन्होंने निषादराज को हृदय से लगा लिया। फिर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाइयों ने [उपस्थित] मुनियों को प्रणाम किया और इच्छित आशीर्वाद पाकर वे आनन्दित हुए।

चौपाई

सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा॥ पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए॥ २ ॥

अर्थ:

छोटे भाई शत्रुघ्न सहित भरतजी प्रेम में उमँगकर सीताजी के चरणकमलों की रज सिर पर धारण कर बार-बार प्रणाम करने लगे। सीताजी ने उन्हें उठाकर उनके सिर को अपने करकमल से स्पर्श कर (सिर पर हाथ फेरकर) उन दोनों को बैठाया।

चौपाई

सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं॥ सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता॥ ३ ॥

अर्थ:

सीताजी ने मन ही मन आशीर्वाद दिया; क्योंकि वे स्नेह में मग्न हैं, उन्हें देह की सुध-बुध नहीं है। सीताजी को सब प्रकार से अपने अनुकूल देखकर भरतजी सोच-रहित हो गये और उनके हृदय का कल्पित भय जाता रहा।

चौपाई

कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा॥ तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि॥ ४ ॥

अर्थ:

उस समय न तो कोई कुछ कहता है, न कोई कुछ पूछता है। मन प्रेम से परिपूर्ण है, वह अपनी गति से छूँछा (अर्थात् संकल्प-विकल्प और चंचलता से शून्य) है। उस अवसर पर केवट (निषादराज) धीरज धर और हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनती करने लगा—।

दोहा

नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग। सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग॥ २४२ ॥

अर्थ:

हे नाथ! मुनिनाथ वसिष्ठजी के साथ सब माताएँ, नगरवासी, सेवक, सेनापति, मन्त्री—सब आपके वियोग से व्याकुल होकर आये हैं।

दोहा 243 के अंतर्गत
चौपाई

सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू॥ चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला॥ १ ॥

अर्थ:

गुरु का आगमन सुनकर शील के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी ने सीताजी के पास रिपुदवनू को रख दिया और वे परम धीर, धर्मधुरन्धर, दीनदयालु श्रीरामचन्द्रजी उसी समय वेग के साथ चल पड़े।

चौपाई

गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे॥ मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई॥ २ ॥

अर्थ:

गुरुजी के दर्शन करके लक्ष्मणजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी प्रेम में भर गये और दण्ड प्रणाम करने लगे। मुनिवर दौड़कर उन्हें उर में लगा लिया। प्रेम उमंगकर दोनों भाई भेंटे।

चौपाई

प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू॥ रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर प्रेम से पुलकित होकर केवट (निषादराज) ने अपना नाम लेकर दूर से ही दण्डवत् प्रणाम किया। रामसखा ऋषि ने उसे जबर्दस्ती हृदय से लगा लिया। मानो जमीन पर लोटते हुए प्रेम को समेट लिया हो।

चौपाई

रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला॥ एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी की भक्ति सुन्दर मंगलों का मूल है, यह कहकर सराहना करते हुए देवता आकाश से फूल बरसाने लगे। वे कहने लगे—जगत् में इसके समान सर्वथा नीच कोई नहीं और वसिष्ठजी के समान बड़ा कौन है ?

दोहा

जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ। सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ॥ २४३ ॥

अर्थ:

जिसे देखकर मुनिराज वसिष्ठजी लक्ष्मणजी से भी अधिक प्रसन्न होकर मिले। सो सीतापति-भजन का प्रगट प्रताप-प्रभाव है।

दोहा 244 के अंतर्गत
चौपाई

आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना॥ जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी॥ १ ॥

अर्थ:

दया की खान, सुजान भगवान् श्रीरामजी ने सब लोगों को आर्त जाना। तब जो जिस भाव से मिलने का अभिलाषी था, उस-उस का तैसा तैसा रुख रखा।

चौपाई

सानुज मिलि पल महुँ सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू॥ यह बड़ि बात राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

उन्होंने लक्ष्मणजी सहित पल भर में सब किसी से मिलकर उनके दुःख और दारुण दाह को दूर कर दिया। श्रीरामचन्द्रजी के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है। जैसे करोड़ों घटों में एक सूर्य की छाया एक साथ ही दीखती है।

चौपाई

मिलि केवटहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा॥ देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं॥ ३ ॥

अर्थ:

समस्त पुरवासी प्रेम में उमंगकर केवट से मिलकर उसके भाग्य की सराहना करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने सब माताओं को दुखित देखा। मानो सुन्दर लताओं की अवली को हिम ने मार दिया हो।

चौपाई

प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई॥ पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

सबसे पहले रामजी कैकेयी से मिले और अपने सरल स्वभाव तथा भक्ति से उसकी बुद्धि भली कर दी। फिर चरणों में गिरकर काल, कर्म और विधाता के सिर दोष मढ़कर, श्रीरामजी ने उनको सान्त्वना दी।

दोहा

भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु। अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु॥ २४४ ॥

अर्थ:

फिर श्रीरघुनाथजी सब माताओं से मिले। उन्होंने सबको समझा-बुझाकर सन्तोष कराया कि हे अंब! जगत् ईश्वर के अधीन है, किसी को भी दोष नहीं देना चाहिए।

दोहा 245 के अंतर्गत
चौपाई

गुरतिय पद बंदे दुहु भाईं। सहित बिप्रतिय जे सँग आईं॥ गंग गौरि सम सब सनमानीं। देहिं असीस मुदित मृदु बानीं॥ १ ॥

अर्थ:

फिर दोनों भाइयों ने ब्राह्मणों की स्त्रियों सहित—जो भरतजी के साथ आई थीं—गुरुजी की पत्नी अरुन्धतीजी के चरणों की वन्दना की और उन सबका गंगा जी तथा गौरी जी के समान सम्मान किया। वे सब आनन्दित होकर कोमल वाणी से आशीर्वाद देने लगीं।

चौपाई

गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेंटी संपति अति रंका॥ पुनि जननी चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता॥ २ ॥

अर्थ:

तब दोनों भाई पैर पकड़कर सुमित्राजी की अंका में जा चिपटे। मानो किसी अत्यन्त रंक को सम्पत्ति से भेंट हो गयी हो। फिर दोनों भाई माता के चरणों में गिर पड़े। प्रेम के मारे उनके सारे अंग व्याकुल हो गये।

चौपाई

अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए॥ तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू॥ ३ ॥

अर्थ:

बड़े ही अनुराग से अंब ने उन्हें उर में लगा लिया और नेत्रों से बहते स्नेह-जल से नहला दिया। उस समय के हर्ष-विषाद को कवि कैसे कहे ? जैसे गूंगा स्वाद को कैसे बताए ?

चौपाई

मिलि जननिहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ॥ पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित माता से मिलकर गुरु से कहा कि पधारिये। तदनन्तर मुनीश्वर वसिष्ठजी की आज्ञा पाकर अयोध्यावासी सब लोग जल और थल का सुभीता देख-देखकर उतर गये।

दोहा

महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ। पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ॥ २४५ ॥

अर्थ:

ब्राह्मण, मन्त्री, माताएँ और गुरु आदि गिने-चुने लोगों को साथ लिये हुए, भरतजी, लक्ष्मणजी और श्रीरघुनाथजी पवित्र आश्रम को चले।

दोहा 246 के अंतर्गत
चौपाई

सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी॥ गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता॥ १ ॥

अर्थ:

सीताजी आकर मुनिवर के चरणों में लगीं और उन्होंने मन-माँगी उचित आशीष पायी। फिर गुरुपत्नी अरुन्धतीजी सहित मुनियों की स्त्रियों से मिलीं। उनका जितना प्रेम था, वह कहा नहीं जाता।

चौपाई

बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के॥ सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं॥ २ ॥

अर्थ:

सीताजी ने सभी के चरणों की वन्दना करके अपने हृदय को प्रिय जी के आशीर्वचन पाये। जब सुकुमारी सीताजी ने सब सासुओं को देखा, तब उन्होंने सहमकर अपनी आँखें बंद कर लीं।

चौपाई

परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं॥ तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा॥ ३ ॥

अर्थ:

वे मानो बधिक के वश में पड़ी हुई मरालियाँ हों। क्या किया करतार ने कुचाली? उन्हें सीताजी को निरखकर निपट दुःख हुआ। सो सब सहिअ जो दैउ सहावा।

चौपाई

जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा॥ मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई॥ ४ ॥

अर्थ:

तब जनकसुता ने धीरज धरकर नील कमल के समान नेत्रों में जल भर लिया। सीताजी सब सासुओं से जाकर मिलीं। उस अवसर पर करुणा पृथ्वी पर छा गयी।

दोहा

लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग। हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग॥ २४६ ॥

अर्थ:

सीताजी सबके पैरों लग-लगकर अत्यन्त प्रेम से मिल रही हैं, और सब सासुएँ स्नेहवश हृदय से आशीर्वाद दे रही हैं कि तुम सुहाग से भरी रहो।

दोहा 247 के अंतर्गत
चौपाई

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं॥ कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा॥ १ ॥

अर्थ:

सीताजी और सब रानियाँ स्नेह के मारे व्याकुल हैं। तब ज्ञानी गुरु ने सबको बैठ जाने के लिये कहा। फिर मुनिनाथ वसिष्ठजी ने जगत् की गति को मायिक कहकर (अर्थात् जगत् मायाका है, इसमें कुछ भी नित्य नहीं है, ऐसा कहकर) कुछ परमार्थ की कथाएँ कहीं।

चौपाई

नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा॥ मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी॥ २ ॥

अर्थ:

राजा के सुरपुर गमन की बात सुनायी। सुनकर रघुनाथजी ने दुःसह दुःख पाया। अपने नेह को मरन का हेतु विचारकर धीरधुरन्धर अत्यन्त व्याकुल हो गये।

चौपाई

कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी॥ सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू॥ ३ ॥

अर्थ:

वज्र के समान कठोर, कड़वी वाणी सुनकर लक्ष्मणजी, सीताजी और सब रानियाँ विलाप करने लगीं। सारा समाज शोक से अत्यन्त व्याकुल हो गया। मानो राजा आज ही मर गये हों।

चौपाई

मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए॥ ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी ने श्रीरामजी को समझाया। तब उन्होंने समाज सहित श्रेष्ठ नदी में स्नान किया। उस दिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने निर्जल व्रत किया। मुनि के कहने पर भी किसी ने जल ग्रहण नहीं किया।

दोहा

भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह। श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह॥ २४७ ॥

अर्थ:

भोर हुए मुनि ने रघुनंदन को जो-जो आज्ञा दी, वह सब प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने श्रद्धा-भक्ति समेत आदर के साथ किया।

दोहा 248 के अंतर्गत
चौपाई

करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी॥ जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला॥ १ ॥

अर्थ:

वेदों में जैसा कहा गया है, उसी के अनुसार पिता की क्रिया करके, पापरूपी अंधकार के नष्ट करनेवाले सूर्यरूप श्रीरामचन्द्रजी शुद्ध हुए! जिनका नाम पापरूपी रूई के [तुरंत जला डालने के] लिए अग्नि है; और जिनका स्मरणमात्र समस्त शुभ मङ्गलों का मूल है।

चौपाई

सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस॥ सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते॥ २ ॥

अर्थ:

वे [नित्य शुद्ध-बुद्ध] भगवान् श्रीरामजी शुद्ध हुए। साधुओं की ऐसी सम्मति है कि उनका शुद्ध होना वैसे ही है जैसे तीर्थों के आवाहन से गंगाजी शुद्ध होती हैं! (गंगाजी तो स्वभाव से ही शुद्ध हैं, उनमें जिन तीर्थों का आवाहन किया जाता है, उलटे वे ही गंगाजी के सम्पर्क में आने से शुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार सच्चिदानन्दरूप श्रीराम तो नित्य शुद्ध हैं, उनके संसर्ग से कर्म ही शुद्ध हो गये।) जब शुद्ध हुए दो दिन बीत गये तब श्रीरामचन्द्रजी प्रीति के साथ गुरुजी से बोले--।

चौपाई

नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी॥ सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता॥ ३ ॥

अर्थ:

हे नाथ! सब लोग यहाँ अत्यन्त दुखी हो रहे हैं। कंद, मूल, फल और जल का ही आहार करते हैं। भाई शत्रुघ्न सहित भरत को, मंत्रियों को और सब माताओं को देखकर मुझे एक-एक पल युग के समान बीत रहा है।

चौपाई

सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ॥ बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई॥ ४ ॥

अर्थ:

अतः सबके साथ आप अयोध्यापुरी को पधारिये (लौट जाइये)। आप यहाँ हैं, और राजा अमरावती (स्वर्ग) में हैं (अयोध्या सूनी है)! मैंने बहुत कह डाला, यह सब बड़ी ढिठाई की है। हे गोसाईं! जैसा उचित हो, वैसा ही कीजिये।

दोहा

धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम। लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम॥ २४८ ॥

अर्थ:

[वसिष्ठजी ने कहा--] हे राम! तुम धर्म के सेतु और दया के धाम हो, तुम भला ऐसा क्यों न कहो? लोग दुखी हैं। दो दिन तुम्हारा दर्शन कर शान्ति लाभ कर लें।

दोहा 249 के अंतर्गत
चौपाई

राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू॥ सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकूला॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के वचन सुनकर सारा समाज भयभीत हो गया। मानो बीच समुद्र में जहाज डगमगा गया हो। परन्तु जब उन्होंने गुरु वसिष्ठजी की श्रेष्ठ कल्याणमूलक वाणी सुनी, तो उस जहाज के लिए मानो हवा अनुकूल हो गयी।

चौपाई

पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं॥ मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि॥ २ ॥

अर्थ:

सब लोग पवित्र पयस्विनी नदी में [अथवा पयस्विनी नदी के पवित्र जल में] तीनों समय (सबेरे, दोपहर और सायंकाल) स्नान करते हैं, जिसके दर्शन से ही पापों के समूह नष्ट हो जाते हैं और मंगलमूर्ति श्रीरामचन्द्रजी को दण्डवत् प्रणाम कर-करके उन्हें नेत्र भर-भरकर देखते हैं।

चौपाई

राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं॥ झरना झरहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी॥ ३ ॥

अर्थ:

सब श्रीरामचन्द्रजी के पर्वत (कामदगिरि) और वन को देखने जाते हैं, जहाँ सभी सुख हैं और सभी दुःखों का अभाव है। झरने अमृत के समान जल झरते हैं और तीन प्रकार की (शीतल, मन्द, सुगन्ध) हवा तीनों प्रकार के (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) तापों को हर लेती है।

चौपाई

बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती॥ सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

असंख्य जाति के वृक्ष, लताएँ और तृण हैं तथा बहुत तरह के फल, फूल और पत्ते हैं। सुन्दर शिलाएँ हैं। वृक्षों की छाया सुख देने वाली है। वन की शोभा किससे वर्णन की जा सकती है?

दोहा

सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग। बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग॥ २४९ ॥

अर्थ:

तालाबों में कमल खिले हैं, जल के पक्षी कूज रहे हैं, भौरे गुंजार कर रहे हैं और बहुत रंगों के पक्षी और पशु वन में वैररहित होकर विहार कर रहे हैं।