रामराज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की व्याकुलता तथा सरस्वतीजी से उनकी प्रार्थना

अयोध्या में रामराज्याभिषेक की तैयारियाँ आरंभ होती हैं, पर देवता रावण-वध हेतु चिंतित हो उठते हैं। वे सरस्वतीजी से प्रार्थना करते हैं कि लीला को ऐसा मोड़ दें जिससे प्रभु का वनगमन हो।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २ / ४९

प्रकरण पाठ

दोहा

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥ ० ॥

अर्थ:

श्रीगुरुजी के चरणकमलों की रज से अपने मनरूपी दर्पण को साफ करके मैं श्रीरघुनाथजी के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फलों को (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को) देनेवाला है।

चौपाई

जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥ भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी॥ १ ॥

अर्थ:

जब से श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आए, तब से [अयोध्या में] नित्य नये मंगल हो रहे हैं और आनन्द के बधावे बज रहे हैं। चौदहों लोक रूपी बड़े भारी पर्वतों पर पुण्य रूपी मेघ सुख रूपी जल बरसा रहे हैं।

चौपाई

रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई॥ मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती॥ २ ॥

अर्थ:

ऋद्धि-सिद्धि और सम्पत्ति रूपी सुहावनी नदियाँ उमड़-उमड़कर अयोध्या रूपी समुद्र में आ मिलीं। नगर के स्त्री-पुरुष अच्छी जाति के मणियों के समूह हैं, जो सब प्रकार से पवित्र, अमूल्य और सुन्दर हैं।

चौपाई

कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती॥ सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी॥ ३ ॥

अर्थ:

नगर का ऐश्वर्य कुछ कहा नहीं जाता। ऐसा जान पड़ता है, मानो ब्रह्माजी की कारीगरी बस इतनी ही है। सब नगरवासी श्रीरामचन्द्रजी के मुखचन्द्र को देखकर सब प्रकार से सुखी हैं।

चौपाई

मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली॥ राम रूपु गुन सीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

सब माताएँ और सखी-सहेलियाँ अपनी मनोरथरूपी बेल को फली हुई देखकर आनन्दित हैं। श्रीरामचन्द्रजी के रूप, गुण, शील और स्वभाव को देख-सुनकर राजा दशरथजी बहुत ही आनन्दित होते हैं।

दोहा

सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु। आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु॥ १ ॥

अर्थ:

सबके हृदय में ऐसी अभिलाषा है और सब महादेवजी को मनाकर (प्रार्थना करके) कहते हैं कि राजा अपने जीते-जी श्रीरामचन्द्रजी को युवराज पद दे दें।

दोहा 2 के अंतर्गत
चौपाई

एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा॥ सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू॥ १ ॥

अर्थ:

एक समय रघुकुल के राजा दशरथजी अपने सारे समाज सहित राजसभा में विराजमान थे। महाराज समस्त पुण्यों की मूर्ति हैं; उन्हें श्रीरामचन्द्रजी का सुन्दर यश सुनकर अत्यन्त आनन्द हो रहा है।

चौपाई

नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें॥ तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरिभाग दसरथ सम नाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

सब राजा उनकी कृपा चाहते हैं और लोकपालगण उनके रुख को रखते हुए (अनुकूल होकर) प्रीति करते हैं। [पृथ्वी, आकाश, पाताल] तीनों भुवनों में और [भूत, भविष्य, वर्तमान] तीनों कालों में दशरथजी के समान बड़भागी [और] कोई नहीं है।

चौपाई

मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिअ थोर सबु तासू॥ रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुटु सम कीन्हा॥ ३ ॥

अर्थ:

मङ्गलों के मूल श्रीरामचन्द्रजी जिनके पुत्र हैं, उनके लिये जो कुछ कहा जाय सब थोड़ा है। राजा ने स्वभाववश हाथ में दर्पण ले लिया और उसमें अपना मुँह देखकर मुकुट को सीधा किया।

चौपाई

श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा॥ नृप जुबराजु राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू॥ ४ ॥

अर्थ:

[देखा कि] कानों के पास बाल सफेद हो गये हैं, मानो बुढ़ापा ऐसा उपदेश कर रहा है कि हे राजन्‌! श्रीरामचन्द्रजी को युवराज-पद देकर अपने जीवन और जन्म का लाभ क्यों नहीं लेते।

दोहा

यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ। प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ॥ २ ॥

अर्थ:

हृदय में यह विचार लाकर (युवराज-पद देने का निश्चय कर) राजा दशरथजी ने शुभ दिन और सुन्दर समय पाकर, प्रेम से पुलकित शरीर हो आनन्दमग्न मन से उसे गुरु वसिष्ठजी को जा सुनाया।

दोहा 3 के अंतर्गत
चौपाई

कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक॥ सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी॥ १ ॥

अर्थ:

राजा ने कहा-हे मुनिराज! [कृपा करके यह निवेदन] सुनिए। श्रीरामचन्द्र अब सब प्रकार से सबके योग्य हो गये हैं। सेवक, मन्त्री, सब नगरवासी और जो हमारे शत्रु, मित्र या उदासीन हैं--।

चौपाई

सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही॥ बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाईं॥ २ ॥

अर्थ:

सभी को श्रीरामचन्द्र वैसे ही प्रिय हैं जैसे वे मुझको हैं। [उनके रूप में] आपका आशीर्वाद ही मानो शरीर धारण करके शोभित हो रहा है। हे स्वामी! सारे ब्राह्मण, परिवार सहित आपके ही समान उन पर स्नेह करते हैं।

चौपाई

जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं॥ मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें॥ ३ ॥

अर्थ:

जो लोग गुरु के चरणों की रज को मस्तक पर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्य को अपने वश में कर लेते हैं। इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसी ने नहीं किया। आपकी पावन चरण-रज की पूजा करके मैंने सब कुछ पा लिया।

चौपाई

अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें॥ मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू॥ ४ ॥

अर्थ:

अब मेरे मन में एक ही अभिलाषा है। हे नाथ! वह भी आप ही के अनुग्रह से पूरी होगी। राजा के सहज प्रेम को देखकर मुनि ने प्रसन्न होकर कहा--नरेश। आज्ञा दीजिये (कहिये, क्या अभिलाषा है ?)।

दोहा

राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार। फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार॥ ३ ॥

अर्थ:

हे राजन्‌! आपका नाम और यश ही सम्पूर्ण मनचाही वस्तुओं को देनेवाला है। हे राजाओं के मुकुटमणि। आपके मन की अभिलाषा फल का अनुगमन करती है (अर्थात् आपके इच्छा करने के पहले ही फल उत्पन्न हो जाता है)।

दोहा 4 के अंतर्गत
चौपाई

सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी॥ नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू॥ १ ॥

अर्थ:

अपने जी में गुरुजी को सब प्रकार से प्रसन्न जानकर, हर्षित होकर राजा कोमल वाणी से बोले-हे नाथ! श्रीरामचन्द्र को युवराज कीजिये। कृपा करके कहिये (आज्ञा दीजिये) तो तैयारी की जाय।

चौपाई

मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू॥ प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं॥ २ ॥

अर्थ:

मेरे जीते-जी यह आनन्द-उत्सव हो जाय, [जिससे] सब लोग अपने नेत्रों का लाभ प्राप्त करें। प्रभु के प्रसाद से शिवजी ने सब ही निबाह दिए; यही एक लालसा मन में रह गयी है।

चौपाई

पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ॥ सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए॥ ३ ॥

अर्थ:

[इस लालसा के पूर्ण हो जानेपर] फिर सोच नहीं, शरीर रहे या चला जाय, जिससे मुझे पीछे पछतावा न हो। दशरथजी के मंगल और आनन्द के मूल सुन्दर वचन सुनकर मुनि मन में बहुत प्रसन्न हुए।

चौपाई

सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं॥ भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी॥ ४ ॥

अर्थ:

[वसिष्ठजी ने कहा--] हे राजन्‌! सुनिये, जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन बिना हृदय की जलन नहीं जाती, वही स्वामी (सर्वलोकमहेश्वर) श्रीरामजी आपके पुत्र हुए हैं, जो पवित्र प्रेम के अनुगामी हैं। [श्रीरामजी पवित्र प्रेम के पीछे-पीछे चलनेवाले हैं, इसी से तो प्रेमवश आपके पुत्र हुए हैं]।

दोहा

बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु। सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु॥ ४ ॥

अर्थ:

हे राजन्‌! अब देर न कीजिये; शीघ्र सब सामान सजाइये। शुभ दिन और सुन्दर मंगल तभी है जब श्रीरामचन्द्रजी युवराज हो जायँ (अर्थात् उनके अभिषेक के लिये सभी दिन शुभ और मंगलमय हैं)।

दोहा 5 के अंतर्गत
चौपाई

मुदित महीपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए॥ कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए॥ १ ॥

अर्थ:

राजा आनन्दित होकर महल में आये और उन्होंने सेवकों को तथा मन्त्री सुमन्त्र को बुलवाया। उन लोगों ने जयजीव कहकर सिर नवाये। तब राजाने सुन्दर मङ्गलमय वचन (श्रीरामजी को युवराज-पद देने का प्रस्ताव) सुनाये।

चौपाई

जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका॥ २ ॥

अर्थ:

[और कहा--] यदि पंचों को (आप सबको) यह मत अच्छा लगे, तो हृदय में हर्षित होकर आप लोग श्रीरामचन्द्र का राजतिलक कीजिये।

चौपाई

मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी॥ बिनती सचिव करहिं कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी॥ ३ ॥

अर्थ:

इस प्रिय वाणी को सुनते ही मन्त्री ऐसे आनन्दित हुए मानो उनके मनोरथरूपी पौधे पर पानी पड़ गया हो। मन्त्री हाथ जोड़कर विनती करते हैं कि हे जगतपति! आप करोड़ों वर्ष जियें।

चौपाई

जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा॥ नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा॥ ४ ॥

अर्थ:

आपने जगत् भर का मङ्गल करने वाला भला काम सोचा है। हे नाथ! शीघ्रता कीजिये, देर न लगाइये। मन्त्रियों की सुन्दर वाणी सुनकर राजा को ऐसा आनन्द हुआ मानो बढ़ती हुई बेल सुन्दर डाली का सहारा पा गयी हो।

दोहा

कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ। राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ॥ ५ ॥

अर्थ:

राजाने कहा-श्रीरामचन्द्र के राज्याभिषेक के लिये मुनिराज वसिष्ठजी की जो-जो आज्ञा हो, आप लोग वही सब तुरंत करें।

दोहा 6 के अंतर्गत
चौपाई

हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी॥ औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना॥ १ ॥

अर्थ:

मुनिराज ने हर्षित होकर कोमल वाणी से कहा कि सम्पूर्ण श्रेष्ठ तीर्थों का जल ले आओ। फिर उन्होंने औषधि, मूल, फूल, फल और पत्ते आदि अनेक मङ्गलिक वस्तुओं के नाम गिनकर बताये।

चौपाई

चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती॥ मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका॥ २ ॥

अर्थ:

चँवर, मृगचर्म, बहुत प्रकार के वस्त्र, असंख्यों जातियों के ऊनी और रेशमी कपड़े, [नाना प्रकार की] मणियाँ (रत्न) तथा और भी बहुत-सी मङ्गल वस्तुएँ, जो जगत् में राज्याभिषेक के योग्य होती हैं [सबको मँगाने की उन्होंने आज्ञा दी]।

चौपाई

बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना॥ सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा॥ ३ ॥

अर्थ:

मुनि ने वेदों में कहा हुआ सब विधान बताकर कहा--नगर में बहुत-से मण्डप (चँदोवे) सजाओ। फलों समेत आम, सुपारी और केले के वृक्ष नगर की गलियों में चारों ओर रोप दो।

चौपाई

रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू॥ पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा॥ ४ ॥

अर्थ:

सुन्दर मणियों के मनोहर चौक पुरवाओ और बाजार को तुरंत सजाने के लिये कह दो। श्रीगणेशजी, गुरु और कुलदेवता की पूजा करो और भूदेव ब्राह्मणों की सब प्रकार से सेवा करो।

दोहा

ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग। सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग॥ ६ ॥

अर्थ:

ध्वजा, पताका, तोरण, कलश, घोड़े, रथ और हाथी सबको सजाओ। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठजी के वचनों को शिरोधार्य करके सब लोग अपने-अपने काम में लग गये।

दोहा 7 के अंतर्गत
चौपाई

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा॥ बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा॥ १ ॥

अर्थ:

मुनीश्वर ने जिसको जिस काम के लिये आज्ञा दी, उसने वह काम [इतनी शीघ्रता से कर डाला कि] मानो पहले से ही कर रखा था। राजा ब्राह्मण, साधु और देवताओं को पूज रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजी के लिये सब मङ्गल कार्य कर रहे हैं।

चौपाई

सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा॥ राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक की सुहावनी खबर सुनते ही अवध भर में बड़ी धूम से बधावे बजने लगे। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी के शरीर में भी शुभ शकुन सूचित हुए। उनके सुन्दर मङ्गल अंग फड़कने लगे।

चौपाई

पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं॥ भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी॥ ३ ॥

अर्थ:

पुलकित होकर वे दोनों प्रेम सहित एक-दूसरे से कहते हैं कि ये सब शकुन भरत के आने की सूचना देने वाले हैं। [उन्हें मामा के घर गये] बहुत दिन हो गये; बहुत ही अवसेर आ रही है (बार-बार उनसे मिलने की मन में आती है)। शकुनों से प्रिय (भरत) के मिलने का विश्वास होता है।

चौपाई

भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं॥ रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भाँती॥ ४ ॥

अर्थ:

और भरत के समान जगत् में [हमें] कौन प्यारा है! शकुन का बस, यही फल है, दूसरा नहीं। श्रीरामचन्द्रजी को [अपने] भाई भरत का दिन-रात ऐसा सोच रहता है जैसा कछुए का हृदय अंडों में रहता है।

दोहा

एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु। सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु॥ ७ ॥

अर्थ:

इसी समय यह परम मङ्गल समाचार सुनकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा। जैसे चन्द्रमा को बढ़ते देखकर समुद्र में लहरों का विलास सुशोभित होता है।

दोहा 8 के अंतर्गत
चौपाई

प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए॥ प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं॥ १ ॥

अर्थ:

सबसे पहले [रनिवास में] जाकर जिन्होंने ये वचन सुनाये, उन्होंने बहुत-से आभूषण और वस्त्र पाये। रानियों का शरीर प्रेम से पुलकित हो उठा और मन प्रेम में अनुरागी हो गया। वे सब मङ्गलकलश सजाने लगीं।

चौपाई

चौकें चारु सुमित्राँ पूरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रूरी॥ आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी॥ २ ॥

अर्थ:

सुमित्राजी ने मणियों के बहुत प्रकार के अत्यन्त सुन्दर और मनोहर चौक पूरे। आनन्द में मग्न हुई श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी ने ब्राह्मणों को बुलाकर बहुत दान दिये।

चौपाई

पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा॥ जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू॥ ३ ॥

अर्थ:

उन्होंने ग्रामदेवियों, देवताओं और नागों की पूजा की और फिर बलि भेंट देने को कहा (अर्थात् कार्य सिद्ध होने पर फिर पूजा करने की मनौती मानी); और प्रार्थना की कि जिस प्रकार से श्रीरामचन्द्रजी का कल्याण हो, दया करके वही वरदान दीजिये।

चौपाई

गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं॥ ४ ॥

अर्थ:

कोयल की-सी मीठी वाणी वाली, चन्द्रमा के समान मुख वाली और हिरन के बच्चे के-से नेत्रों वाली स्त्रियाँ मङ्गलगान करने लगीं।

दोहा

राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि। लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि॥ ८ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी का राज्याभिषेक सुनकर सभी स्त्री-पुरुष हृदय में हर्षित हो उठे और विधि को अनुकूल समझकर सब सुन्दर मङ्गल-साज सजाने लगे।

दोहा 9 के अंतर्गत
चौपाई

तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए॥ गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा॥ १ ॥

अर्थ:

तब राजाने वसिष्ठजी को बुलाया और शिक्षा देने के लिये श्रीरामचन्द्रजी के महल में भेजा। गुरु का आगमन सुनते ही श्रीरघुनाथजी ने दरवाजे पर आकर उनके चरणों में मस्तक नवाया।

चौपाई

सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने॥ गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी॥ २ ॥

अर्थ:

आदरपूर्वक अर्घ्य देकर उन्हें घर में लाये और षोडशोपचार से पूजा करके उनका सम्मान किया। फिर सीताजी सहित उनके चरण स्पर्श किये और कमल के समान दोनों हाथों को जोड़कर श्रीरामजी बोले--

चौपाई

सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू॥ तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती॥ ३ ॥

अर्थ:

यद्यपि सेवक के घर स्वामी का पधारना मङ्गलों का मूल और अमङ्गलों का नाश करने वाला होता है, तथापि हे नाथ! उचित तो यही था कि प्रेमपूर्वक दास को ही कार्य के लिये बुला भेजते; ऐसी ही नीति है।

चौपाई

प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू॥ आयसु होइ सो करौं गोसाईं। सेवकु लहइ स्वामि सेवकाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

परन्तु प्रभु ने प्रभुता छोड़कर (स्वयं यहाँ पधारकर) जो स्नेह किया, इससे आज यह घर पवित्र हो गया। हे गोसाईं! अब जो आज्ञा हो, मैं वही करूँ। स्वामी की सेवा में ही सेवक का लाभ है।

दोहा

सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस। राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस॥ ९ ॥

अर्थ:

[ श्रीरामचन्द्रजी के ] प्रेम में सने वचनों को सुनकर मुनि वसिष्ठजी ने श्रीरघुनाथजी की प्रशंसा करते हुए कहा कि हे राम! भला, आप ऐसा क्यों न कहें। आप हंसवंश के भूषण हैं।

दोहा 10 के अंतर्गत
चौपाई

बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ॥ भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के गुण, शील और स्वभाव का बखान कर, मुनिराज प्रेम से पुलकित होकर बोले-- [हे रामचन्द्रजी!]। राजा (दशरथजी) ने राज्याभिषेक की तैयारी की है। वे आपको युवराज-पद देना चाहते हैं।

चौपाई

राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू॥ गुरु सिख देइ राय पहिं गयऊ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ॥ २ ॥

अर्थ:

[इसलिए] हे रामजी! आज आप [उपवास, हवन आदि विधिपूर्वक] सब संयम कीजिए, जिससे विधाता कुशलपूर्वक इस काम को निबाह दें (सफल कर दें)। गुरुजी शिक्षा देकर राजा दशरथजी के पास चले गए। श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में [यह सुनकर] इस बात का खेद हुआ कि--

चौपाई

जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई॥ करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा॥ ३ ॥

अर्थ:

हम सब भाई एक ही साथ जन्मे; खाना, सोना, लड़कपन के खेल-कूद, कनछेदन, यज्ञोपवीत और विवाह आदि उत्सव सब साथ-साथ ही हुए।

चौपाई

बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू॥ प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई॥ ४ ॥

अर्थ:

पर इस निर्मल वंश में यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयों को छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़े का ही (मेरा ही) होता है। [तुलसीदासजी कहते हैं कि] प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का यह सुन्दर, प्रेमपूर्ण पछितावा भक्तों के मन की कुटिलता को हर ले।

दोहा

तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद। सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद॥ १० ॥

अर्थ:

उसी समय प्रेम और आनन्द में मग्न लक्ष्मणजी आये। रघुकुल कैरव चंद श्रीरामचन्द्रजी ने प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान किया।

दोहा 11 के अंतर्गत
चौपाई

बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना॥ भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं॥ १ ॥

अर्थ:

बहुत प्रकार के बाजे बज रहे हैं। नगर के अतिशय आनन्द का वर्णन नहीं हो सकता। सब लोग भरतजी के आगमन को मना रहे हैं और कह रहे हैं कि वे भी शीघ्र आवें और [राज्याभिषेक का उत्सव देखकर] नेत्रों का फल प्राप्त करें।

चौपाई

हाट बाट घर गलीं अथाईं। कहहिं परसपर लोग लोगाईं॥ कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा॥ २ ॥

अर्थ:

बाजार, रास्ते, घर, गली और चबूतरों पर (जहाँ-तहाँ) पुरुष और स्त्री आपस में यही कहते हैं कि कल वह शुभ लग्न (मुहूर्त) कितने समय है जब विधाता हमारी अभिलाषा पूरी करेंगे।

चौपाई

कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता॥ सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली॥ ३ ॥

अर्थ:

जब सीताजी सहित श्रीरामचन्द्रजी सुवर्ण के सिंहासन पर विराजेंगे और हमारा मनचाहा होगा (मनःकामना पूरी होगी)। इधर तो सब यह कह रहे हैं कि कल कब होगा, उधर कुचक्री देवता विघ्न मना रहे हैं।

चौपाई

तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा॥ सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्हें (देवताओं को) अवध के बधावे नहीं सुहाते, जैसे चोर को चाँदनी रात नहीं भाती। सरस्वतीजी को बुलाकर देवता विनय कर रहे हैं और बार-बार उनके पैरों को पकड़कर उन पर गिरते हैं।

दोहा

बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु। रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु॥ ११ ॥

अर्थ:

[वे कहते हैं--] हे माता! हमारी बड़ी विपत्ति को देखकर आज वही कीजिए जिससे श्रीरामचन्द्रजी राज्य त्यागकर वन को चले जाएँ और देवताओं का सब कार्य सिद्ध हो।

दोहा 12 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती॥ देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी॥ १ ॥

अर्थ:

देवताओं की विनती सुनकर सरस्वतीजी खड़ी-खड़ी पछता रही हैं कि [हाय!] मैं कमलवन के लिये हेमन्त-ऋतु की रात हुई। उन्हें इस प्रकार पछताते देखकर देवता फिर विनय करके कहने लगे- हे माता! इसमें आपको जरा भी दोष न लगेगा।

चौपाई

बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ॥ जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देवहित लागी॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी विषाद और हर्ष से रहित हैं। आप तो श्रीरामजी के सब प्रभाव को जानती ही हैं। जीव अपने कर्मवश ही सुख-दुःख का भागी होता है। अतएव देवताओं के हित के लिये आप अयोध्या जाइये।

चौपाई

बार बार गहि चरन सँकोची। चली बिचारि बिबुध मति पोची॥ ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती॥ ३ ॥

अर्थ:

बार-बार चरण पकड़कर देवताओं ने सरस्वती को संकोच में डाल दिया। तब वह यह विचारकर चली कि देवताओं की बुद्धि ओछी है। इनका निवास तो ऊँचा है, पर इनकी करनी नीची है। ये दूसरे का ऐश्वर्य नहीं देख सकते।

चौपाई

आगिल काजु बिचारि बहोरी। करिहहिं चाह कुसल कबि मोरी॥ हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई॥ ४ ॥

अर्थ:

परंतु आगे के काम का विचार करके चतुर कवि [श्रीरामजी के वनवास के चरित्रों का वर्णन करने के लिये] मेरी चाह करेंगे। ऐसा विचारकर सरस्वती हृदय में हर्षित होकर दशरथजी की पुरी अयोध्या में आयीं, मानो दुःसह दुःख देने वाली कोई ग्रहदशा आयी हो।