रामराज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की व्याकुलता तथा सरस्वतीजी से उनकी प्रार्थना
अयोध्या में रामराज्याभिषेक की तैयारियाँ आरंभ होती हैं, पर देवता रावण-वध हेतु चिंतित हो उठते हैं। वे सरस्वतीजी से प्रार्थना करते हैं कि लीला को ऐसा मोड़ दें जिससे प्रभु का वनगमन हो।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २ / ४९
प्रकरण पाठ
जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए॥ भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहिं सुख बारी॥ १ ॥
अर्थ:
जब से श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आए, तब से [अयोध्या में] नित्य नये मंगल हो रहे हैं और आनन्द के बधावे बज रहे हैं। चौदहों लोक रूपी बड़े भारी पर्वतों पर पुण्य रूपी मेघ सुख रूपी जल बरसा रहे हैं।
रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई॥ मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती॥ २ ॥
अर्थ:
ऋद्धि-सिद्धि और सम्पत्ति रूपी सुहावनी नदियाँ उमड़-उमड़कर अयोध्या रूपी समुद्र में आ मिलीं। नगर के स्त्री-पुरुष अच्छी जाति के मणियों के समूह हैं, जो सब प्रकार से पवित्र, अमूल्य और सुन्दर हैं।
नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें॥ तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरिभाग दसरथ सम नाहीं॥ २ ॥
अर्थ:
सब राजा उनकी कृपा चाहते हैं और लोकपालगण उनके रुख को रखते हुए (अनुकूल होकर) प्रीति करते हैं। [पृथ्वी, आकाश, पाताल] तीनों भुवनों में और [भूत, भविष्य, वर्तमान] तीनों कालों में दशरथजी के समान बड़भागी [और] कोई नहीं है।
सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही॥ बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाईं॥ २ ॥
अर्थ:
सभी को श्रीरामचन्द्र वैसे ही प्रिय हैं जैसे वे मुझको हैं। [उनके रूप में] आपका आशीर्वाद ही मानो शरीर धारण करके शोभित हो रहा है। हे स्वामी! सारे ब्राह्मण, परिवार सहित आपके ही समान उन पर स्नेह करते हैं।
जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं॥ मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें॥ ३ ॥
अर्थ:
जो लोग गुरु के चरणों की रज को मस्तक पर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्य को अपने वश में कर लेते हैं। इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसी ने नहीं किया। आपकी पावन चरण-रज की पूजा करके मैंने सब कुछ पा लिया।
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं॥ भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी॥ ४ ॥
अर्थ:
[वसिष्ठजी ने कहा--] हे राजन्! सुनिये, जिनसे विमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन बिना हृदय की जलन नहीं जाती, वही स्वामी (सर्वलोकमहेश्वर) श्रीरामजी आपके पुत्र हुए हैं, जो पवित्र प्रेम के अनुगामी हैं। [श्रीरामजी पवित्र प्रेम के पीछे-पीछे चलनेवाले हैं, इसी से तो प्रेमवश आपके पुत्र हुए हैं]।
मुदित महीपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए॥ कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए॥ १ ॥
अर्थ:
राजा आनन्दित होकर महल में आये और उन्होंने सेवकों को तथा मन्त्री सुमन्त्र को बुलवाया। उन लोगों ने जयजीव कहकर सिर नवाये। तब राजाने सुन्दर मङ्गलमय वचन (श्रीरामजी को युवराज-पद देने का प्रस्ताव) सुनाये।
जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा॥ नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा॥ ४ ॥
अर्थ:
आपने जगत् भर का मङ्गल करने वाला भला काम सोचा है। हे नाथ! शीघ्रता कीजिये, देर न लगाइये। मन्त्रियों की सुन्दर वाणी सुनकर राजा को ऐसा आनन्द हुआ मानो बढ़ती हुई बेल सुन्दर डाली का सहारा पा गयी हो।
चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती॥ मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका॥ २ ॥
अर्थ:
चँवर, मृगचर्म, बहुत प्रकार के वस्त्र, असंख्यों जातियों के ऊनी और रेशमी कपड़े, [नाना प्रकार की] मणियाँ (रत्न) तथा और भी बहुत-सी मङ्गल वस्तुएँ, जो जगत् में राज्याभिषेक के योग्य होती हैं [सबको मँगाने की उन्होंने आज्ञा दी]।
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा॥ बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा॥ १ ॥
अर्थ:
मुनीश्वर ने जिसको जिस काम के लिये आज्ञा दी, उसने वह काम [इतनी शीघ्रता से कर डाला कि] मानो पहले से ही कर रखा था। राजा ब्राह्मण, साधु और देवताओं को पूज रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजी के लिये सब मङ्गल कार्य कर रहे हैं।
पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं॥ भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी॥ ३ ॥
अर्थ:
पुलकित होकर वे दोनों प्रेम सहित एक-दूसरे से कहते हैं कि ये सब शकुन भरत के आने की सूचना देने वाले हैं। [उन्हें मामा के घर गये] बहुत दिन हो गये; बहुत ही अवसेर आ रही है (बार-बार उनसे मिलने की मन में आती है)। शकुनों से प्रिय (भरत) के मिलने का विश्वास होता है।
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं॥ रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भाँती॥ ४ ॥
अर्थ:
और भरत के समान जगत् में [हमें] कौन प्यारा है! शकुन का बस, यही फल है, दूसरा नहीं। श्रीरामचन्द्रजी को [अपने] भाई भरत का दिन-रात ऐसा सोच रहता है जैसा कछुए का हृदय अंडों में रहता है।
प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए॥ प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं॥ १ ॥
अर्थ:
सबसे पहले [रनिवास में] जाकर जिन्होंने ये वचन सुनाये, उन्होंने बहुत-से आभूषण और वस्त्र पाये। रानियों का शरीर प्रेम से पुलकित हो उठा और मन प्रेम में अनुरागी हो गया। वे सब मङ्गलकलश सजाने लगीं।
पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा॥ जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू॥ ३ ॥
अर्थ:
उन्होंने ग्रामदेवियों, देवताओं और नागों की पूजा की और फिर बलि भेंट देने को कहा (अर्थात् कार्य सिद्ध होने पर फिर पूजा करने की मनौती मानी); और प्रार्थना की कि जिस प्रकार से श्रीरामचन्द्रजी का कल्याण हो, दया करके वही वरदान दीजिये।
राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू॥ गुरु सिख देइ राय पहिं गयऊ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ॥ २ ॥
अर्थ:
[इसलिए] हे रामजी! आज आप [उपवास, हवन आदि विधिपूर्वक] सब संयम कीजिए, जिससे विधाता कुशलपूर्वक इस काम को निबाह दें (सफल कर दें)। गुरुजी शिक्षा देकर राजा दशरथजी के पास चले गए। श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में [यह सुनकर] इस बात का खेद हुआ कि--
बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू॥ प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई॥ ४ ॥
अर्थ:
पर इस निर्मल वंश में यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयों को छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़े का ही (मेरा ही) होता है। [तुलसीदासजी कहते हैं कि] प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का यह सुन्दर, प्रेमपूर्ण पछितावा भक्तों के मन की कुटिलता को हर ले।
बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना॥ भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं॥ १ ॥
अर्थ:
बहुत प्रकार के बाजे बज रहे हैं। नगर के अतिशय आनन्द का वर्णन नहीं हो सकता। सब लोग भरतजी के आगमन को मना रहे हैं और कह रहे हैं कि वे भी शीघ्र आवें और [राज्याभिषेक का उत्सव देखकर] नेत्रों का फल प्राप्त करें।
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती॥ देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी॥ १ ॥
अर्थ:
देवताओं की विनती सुनकर सरस्वतीजी खड़ी-खड़ी पछता रही हैं कि [हाय!] मैं कमलवन के लिये हेमन्त-ऋतु की रात हुई। उन्हें इस प्रकार पछताते देखकर देवता फिर विनय करके कहने लगे- हे माता! इसमें आपको जरा भी दोष न लगेगा।
बार बार गहि चरन सँकोची। चली बिचारि बिबुध मति पोची॥ ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती॥ ३ ॥
अर्थ:
बार-बार चरण पकड़कर देवताओं ने सरस्वती को संकोच में डाल दिया। तब वह यह विचारकर चली कि देवताओं की बुद्धि ओछी है। इनका निवास तो ऊँचा है, पर इनकी करनी नीची है। ये दूसरे का ऐश्वर्य नहीं देख सकते।
आगिल काजु बिचारि बहोरी। करिहहिं चाह कुसल कबि मोरी॥ हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई॥ ४ ॥
अर्थ:
परंतु आगे के काम का विचार करके चतुर कवि [श्रीरामजी के वनवास के चरित्रों का वर्णन करने के लिये] मेरी चाह करेंगे। ऐसा विचारकर सरस्वती हृदय में हर्षित होकर दशरथजी की पुरी अयोध्या में आयीं, मानो दुःसह दुःख देने वाली कोई ग्रहदशा आयी हो।