जनक-वसिष्ठादि संवाद, इन्द्र की चिंता, सरस्वती का इन्द्र को समझाना
जनकजी, वसिष्ठजी और अन्य श्रेष्ठ जन धर्मसम्मत निर्णय पर विचार करते हैं। उधर इन्द्र के मन में चिंता उठती है, पर सरस्वती उन्हें समझाकर उनके संशय का निवारण करती हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४५ / ४९
प्रकरण पाठ
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे॥ सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाहीं॥ १ ॥
अर्थ:
मुनि वसिष्ठजी के वचन सुनकर जनकजी प्रेम में मग्र हो गये। उनकी दशा देखकर ज्ञान और वैराग्य को भी वैराग्य हो गया (अर्थात् उनके ज्ञान-वैराग्य छूट-से गये)। वे प्रेम से शिथिल हो गये और मन में विचार करने लगे कि हम यहाँ आये, यह अच्छा नहीं किया।
रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना॥ हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई॥ २ ॥
अर्थ:
राजा दशरथजी ने श्रीरामजी को वन जाने के लिये कहा और स्वयं अपने प्रिय के प्रेम को प्रमाणित (सच्चा) कर दिया (प्रियवियोग में प्राण त्याग दिये)। परन्तु हम अब इन्हें वन से [और गहन] वन को भेजकर अपने विवेक की बड़ाई में आनन्दित होते हुए लौटेंगे [कि हमें जरा भी मोह नहीं है; हम श्रीरामजी को वन में छोड़कर चले आये, दशरथजी की तरह मरे नहीं]।
सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी॥ प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू॥ १ ॥
अर्थ:
भरतजी यह सुनकर पुलकितशरीर हो नेत्रों में जल भरकर बड़ा भारी धीरज धरकर बोले-- हे प्रभो! आप हमारे पिता के समान प्रिय और पूज्य हैं। और कुलगुरु के समान हितैषी तो माता-पिता भी नहीं हैं।
एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर॥ छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता॥ ३ ॥
अर्थ:
इस समाज और [पुण्य] स्थल में आप [जैसे ज्ञानी और पूज्य] का पूछना! इस पर यदि मैं मौन रहता हूँ तो मलिन समझा जाऊँगा; और बोलना पागलपन होगा; तथापि मैं छोटे मुँह बड़ी बात कहता हूँ। हे तात! विधाता को प्रतिकूल जानकर क्षमा कीजियेगा।
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना॥ स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू॥ ४ ॥
अर्थ:
वेद, शास्त्र और पुराणों में प्रसिद्ध है और जगत् जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है। स्वामिधर्म में (स्वामी के प्रति कर्तव्यपालन में) और स्वार्थ में विरोध है (दोनों एक साथ नहीं निभ सकते)। वैर अंधा होता है और प्रेम को ज्ञान नहीं रहता [मैं स्वार्थवश कहूँगा या प्रेमवश, दोनों में ही भूल होने का भय है]।
भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ॥ सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे॥ १ ॥
अर्थ:
भरतजी के वचन सुनकर और उनका स्वभाव देखकर समाजसहित राजा जनक उनकी सराहना करने लगे। भरतजी के वचन सुगम और अगम, सुन्दर, कोमल और कठोर हैं। उनमें अक्षर थोड़े हैं, परन्तु अर्थ अत्यन्त अपार भरा हुआ है।
ज्यों मुखु मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी॥ भूप भरतु मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू॥ २ ॥
अर्थ:
जैसे मुख [का प्रतिबिम्ब] दर्पण में दीखता है और दर्पण अपने हाथ में है, फिर भी वह (मुख का प्रतिबिम्ब) पकड़ा नहीं जाता, इसी प्रकार भरतजी की यह अद्भुत वाणी भी पकड़ में नहीं आती (शब्दों से उसका आशय समझ में नहीं आता)। [किसी से कुछ उत्तर देते नहीं बना] तब राजा जनकजी, भरतजी तथा मुनि वसिष्ठजी समाज के साथ वहाँ गये जहाँ देवतारूपी कुमुदों के खिलानेवाले (सुख देनेवाले) चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी थे।
सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा॥ देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी॥ ३ ॥
अर्थ:
यह समाचार सुनकर सब लोग सोच से व्याकुल हो गये; जैसे नये जल के संयोग से मछलियाँ व्याकुल होती हैं। देवताओं ने पहले कुलगुरु वसिष्ठजी की [प्रेमविहल] दशा देखी, फिर विदेहजी के विशेष स्नेह को देखा।
राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे॥ सब कोउ राम पेममय पेखा। भए अलेख सोच बस लेखा॥ ४ ॥
अर्थ:
और तब श्रीरामभक्तिमय भरतजी को देखा। इन सब को देखकर स्वार्थी देवता घबड़ाकर हृदय में हार मान गये (निराश हो गये)। उन्होंने सब किसी को श्रीरामप्रेम में सराबोर देखा। इससे देवता इतने सोच के वश हो गये कि जिसका कोई हिसाब नहीं।
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही॥ फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया॥ १ ॥
अर्थ:
देवताओं ने सरस्वती का स्मरण कर उनकी सराहना (स्तुति) की और कहा--हे देवि! देवता आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीजिये। अपनी माया रचकर भरतजी की बुद्धि को फेर दीजिये। और छल की छाया कर देवताओं के कुल का पालन (रक्षा) कीजिये।
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी॥ मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू॥ २ ॥
अर्थ:
देवताओं की विनती सुनकर और देवताओं को स्वार्थ के वश होने से मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वतीजी बोलीं--मुझसे कह रहे हो कि भरतजी की मति पलट दो! हजार नेत्रों से भी तुम्हें सुमेरु नहीं सूझ पड़ता!
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी॥ सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी॥ ३ ॥
अर्थ:
ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माया बड़ी प्रबल है! किन्तु वह भी भरतजी की बुद्धि की ओर ताक नहीं सकती। उस बुद्धि को तुम मुझसे कह रहे हो कि भोली कर दो (भुलावे में डाल दो)! अरे! चाँदनी कहीं प्रचण्ड किरणवाले सूर्य को चुरा सकती है?
भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू॥ अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका॥ ४ ॥
अर्थ:
भरतजी के हृदय में श्रीसीतारामजी का निवास है। जहाँ सूर्य का प्रकाश है, वहाँ कहीं अँधेरा रह सकता है? ऐसा कहकर सरस्वतीजी ब्रह्मलोक को चली गयीं। देवता ऐसे व्याकुल हुए जैसे रात्रि में चकवा व्याकुल होता है।
करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥ गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा॥ १ ॥
अर्थ:
कुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि काम का बनना-बिगड़ना सब भरतजी के हाथ है। इधर राजा जनकजी [मुनि वसिष्ठ आदि के साथ] श्रीरघुनाथजी के पास गये। सूर्यकुल के दीपक श्रीरामचन्द्रजी ने सबका सम्मान किया।