अयोध्यावासियों सहित श्रीभरत-शत्रुघ्न आदि का वनगमन
भरतजी, शत्रुघ्नजी, माताएँ, गुरुजन और असंख्य अयोध्यावासी श्रीरामजी से मिलने के लिए वन की ओर प्रस्थान करते हैं। समूची यात्रा प्रेम, विरह और आशा से भरी हुई है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २९ / ४९
प्रकरण पाठ
राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी॥ बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के वश में हुए (दर्शन की अनन्य लालसा से) सब नर-नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी-हथिनी जल को तककर [बड़ी तेजी से बावले-से हुए] जा रहे हों। श्रीसीतारामजी [सब सुखों को छोड़कर] वन में हैं, मन में ऐसा विचार करके छोटे भाई सहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं।
देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे॥ जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली॥ २ ॥
अर्थ:
उनका स्नेह देखकर लोग प्रेम में मग्र हो गये और सब घोड़े, हाथी, रथों को छोड़कर उनसे उतरकर पैदल चलने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी भरतजी के पास जाकर और अपनी पालकी उनके समीप खड़ी करके कोमल वाणी से बोलीं—।
तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी॥ तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू॥ ३ ॥
अर्थ:
हे बेटा! माता बलैयाँ लेती है, तुम रथ पर चढ़ जाओ, नहीं तो सारा प्यारा परिवार दुखी हो जाएगा। तुम्हारे पैदल चलने से सभी लोग चलेंगे। शोक के मारे सब दुबले हो रहे हैं, पैदल मार्ग के योग्य नहीं हैं।