अयोध्यावासियों सहित श्रीभरत-शत्रुघ्न आदि का वनगमन

भरतजी, शत्रुघ्नजी, माताएँ, गुरुजन और असंख्य अयोध्यावासी श्रीरामजी से मिलने के लिए वन की ओर प्रस्थान करते हैं। समूची यात्रा प्रेम, विरह और आशा से भरी हुई है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २९ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी॥ जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना॥ १ ॥

अर्थ:

नगर के नर-नारी चकवे-चकवी की भाँति हृदय में अत्यन्त आर्त होकर प्रातःकाल का होना चाहते हैं। सारी रात जागते-जागते सबेरा हो गया। तब भरतजी ने चतुर मन्त्रियों को बुलवाया—।

चौपाई

कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहि राजू॥ बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे॥ २ ॥

अर्थ:

और कहा—तिलक का सब सामान ले चलो। वन में ही मुनि वसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी को राज्य देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मन्त्रियों ने वन्दना की और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी सजवा दिये।

चौपाई

अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ॥ बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना॥ ३ ॥

अर्थ:

सबसे पहले मुनिराज वसिष्ठजी अरुन्धती और अग्नि समाऊ सहित रथ पर सवार होकर चले। फिर ब्राह्मणों के समूह, जो सब-के-सब तपस्या और तेज के भण्डार थे, अनेकों सवारियों पर चढ़कर चले।

चौपाई

नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना॥ सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भईं सब रानी॥ ४ ॥

अर्थ:

नगर के सब लोग सजा-सजाकर चित्रकूट को चल पड़े। जिनका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी सुन्दर पालकियों पर चढ़-चढ़कर सब रानियाँ चलीं।

दोहा

सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ। सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ॥ १८७ ॥

अर्थ:

विश्वासपात्र सेवकों को नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक रवाना करके, तब श्रीसीतारामजी के चरणों को स्मरण करके भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले।

दोहा 188 के अंतर्गत
चौपाई

राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी॥ बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के वश में हुए (दर्शन की अनन्य लालसा से) सब नर-नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी-हथिनी जल को तककर [बड़ी तेजी से बावले-से हुए] जा रहे हों। श्रीसीतारामजी [सब सुखों को छोड़कर] वन में हैं, मन में ऐसा विचार करके छोटे भाई सहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं।

चौपाई

देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे॥ जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली॥ २ ॥

अर्थ:

उनका स्नेह देखकर लोग प्रेम में मग्र हो गये और सब घोड़े, हाथी, रथों को छोड़कर उनसे उतरकर पैदल चलने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी भरतजी के पास जाकर और अपनी पालकी उनके समीप खड़ी करके कोमल वाणी से बोलीं—।

चौपाई

तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी॥ तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू॥ ३ ॥

अर्थ:

हे बेटा! माता बलैयाँ लेती है, तुम रथ पर चढ़ जाओ, नहीं तो सारा प्यारा परिवार दुखी हो जाएगा। तुम्हारे पैदल चलने से सभी लोग चलेंगे। शोक के मारे सब दुबले हो रहे हैं, पैदल मार्ग के योग्य नहीं हैं।

चौपाई

सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई॥ तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू॥ ४ ॥

अर्थ:

माता की आज्ञा को सिर पर धरकर और उनके चरणों में सिर नवाकर दोनों भाई रथ पर चढ़कर चलने लगे। पहले दिन तमसा पर वास करके दूसरा मुकाम गोमती के तीर पर किया।

दोहा

पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग। करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग॥ १८८ ॥

अर्थ:

कोई दूध ही पीते, कोई फलाहार करते और कुछ लोग रात को एक ही बार भोजन करते हैं। भूषण और भोग-विलास को छोड़कर सब लोग श्रीरामचन्द्रजी के लिये नियम और व्रत करते हैं।