निषाद की शंका और सावधानी

भरतजी की विशाल सेना को देखकर निषादराज को आशंका होती है कि कहीं श्रीरामजी के लिए कोई संकट न हो। वे तुरंत सावधानी बरतते हैं और अपने लोगों को सजग कर देते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३० / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने॥ समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा॥ १ ॥

अर्थ:

रातभर सई नदी के तीर पर निवास करके सबेरे वहाँ से चल दिये और सब श्रृंगवेरपुर के समीप जा पहुँचे। निषादराज ने सब समाचार सुने, तो वह दुखी होकर हृदय में विचार करने लगा—।

चौपाई

कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं॥ जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई॥ २ ॥

अर्थ:

क्या कारण है जो भरत वन को जा रहे हैं, मन में कुछ कपट-भाव अवश्य है। यदि मन में कुटिलता न होती, तो साथ में सेना क्यों ले चले हैं।

चौपाई

जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी॥ भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी॥ ३ ॥

अर्थ:

समझते हैं कि छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीराम को मारकर सुख से निष्कण्टक राज्य करूँगा। भरत ने हृदय में राजनीति को स्थान नहीं दिया। तब [पहले] तो कलंक ही था, अब तो जीवन से ही हाथ धोना पड़ेगा।

चौपाई

सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा॥ का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

सम्पूर्ण देवता और दैत्य वीर जुट जाय, तो भी श्रीरामजी को रण में जीतनेवाला कोई नहीं है। भरत जो ऐसा कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है? विष की बेलें अमृत-फल कभी नहीं फलतीं।

दोहा

अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु। हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु॥ १८९ ॥

अर्थ:

ऐसा विचारकर गुह (निषादराज) ने अपनी जाति वालों से कहा कि सब लोग सावधान हो जाओ। नावों को हाथ में (कब्जे में) कर लो और फिर उन्हें डुबा दो तथा सब घाटों को रोक दो।

दोहा 190 के अंतर्गत
चौपाई

होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा॥ सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ॥ १ ॥

अर्थ:

सुसज्जित होकर घाटों को रोक लो और सब लोग मरने के साज सजा लो (अर्थात्‌ भरत से युद्ध में लड़कर मरने के लिये तैयार हो जाओ)। मैं भरत से सामने (मैदान में) लोहा लूँगा (मुठभेड़ करूँगा) और जीते-जी उन्हें गंगापार न उतरने दूँगा।

चौपाई

समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा॥ भरत भाइ नृपु मैं जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू॥ २ ॥

अर्थ:

युद्ध में मरण, फिर गंगाजी का तट, श्रीरामजी का काम और क्षणभंगुर शरीर (जो चाहे जब नाश हो जाय); भरत श्रीरामजी के भाई और राजा हैं और मैं नीच सेवक हूँ—बड़े भाग्य से ऐसी मृत्यु मिलती है।

चौपाई

स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी॥ तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें॥ ३ ॥

अर्थ:

मैं स्वामी के काम के लिये रण में लड़ाई करूँगा और चौदहों लोकों को अपने यश से उज्ज्वल कर दूँगा। श्रीरघुनाथजी के निमित्त प्राण त्याग दूँगा। मेरे तो दोनों ही हाथों में आनन्द के लड्डू हैं (अर्थात्‌ जीत गया तो रामसेवक का यश प्राप्त करूंगा और मारा गया तो श्रीरामजी की नित्य सेवा प्राप्त करूँगा)।

चौपाई

साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा॥ जायँ जिअत जग सो महिभारू। जननी जौबन बिटप कुठारू॥ ४ ॥

अर्थ:

साधुओं के समाज में जिसकी गिनती नहीं और श्रीरामजी के भक्तों में जिसका स्थान नहीं, वह जगत्‌ में पृथ्वी का भार होकर व्यर्थ ही जीता है। वह माता के यौवनरूपी वृक्ष के काटने के लिये कुल्हाड़ा मात्र है।

दोहा

बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु। सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु॥ १९० ॥

अर्थ:

इस प्रकार श्रीरामजी के लिये प्राणसमर्पण का निश्चय करके निषादराज विषाद से रहित हो गया और सब का उत्साह बढ़ाकर तथा श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकस, धनुष और कवच माँगा।

दोहा 191 के अंतर्गत
चौपाई

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ॥ भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा॥ १ ॥

अर्थ:

[उसने कहा--] हे भाइयो! जल्दी करो और सब सामान सजाओ। मेरी आज्ञा सुनकर कोई मन में कायरता न लावे। सब हर्ष के साथ बोल उठे-हे नाथ! बहुत अच्छा; और आपस में एक दूसरे का जोश बढ़ाने लगे।

चौपाई

चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी॥ सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं॥ २ ॥

अर्थ:

निषादराज को जोहार कर-करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राम में लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों की जूतियों का स्मरण करके उन्होंने भाथियाँ बाँधकर धनुषों पर प्रत्यंचा चढ़ायीं।

चौपाई

अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं॥ एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहिं गगन मनहुँ छिति छाँड़े॥ ३ ॥

अर्थ:

कवच पहनकर सिर पर लोहेका टोप रखते हैं और फरसे, बाँस तथा सेल को सीधा कर रहे हैं (सुधार रहे हैं)। कोई तलवार के वार रोकने में अत्यन्त ही कुशल हैं। वे ऐसे उमंग में भरे हैं मानो धरती छोड़कर आकाश में कूद (उछल) रहे हों।

चौपाई

निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई॥ देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने॥ ४ ॥

अर्थ:

अपना-अपना साज-समाज (लड़ाई का सामान और दल) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुह को जोहार की। निषादराज ने सुन्दर योद्धाओं को देखकर, सब को सुयोग्य जाना और नाम ले-लेकर सब का सम्मान किया।

दोहा

भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि॥ १९१ ॥

अर्थ:

[उसने कहा--] हे भाइयो! धोखा न लाना (अर्थात्‌ मरने से न घबराना), आज मेरा बड़ा भारी काम है। यह सुनकर सब योद्धा बड़े जोश के साथ बोल उठे-हे वीर! अधीर मत हो।

दोहा 192 के अंतर्गत
चौपाई

राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे॥ जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं॥ १ ॥

अर्थ:

हे नाथ! श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप से और आपके बल से हमलोग भरत की सेना को बिना भट और बिना घोड़े की कर देंगे (एक-एक वीर और एक-एक घोड़े को मार डालेंगे)। जीते-जी पीछे पाँव न रखेंगे। पृथ्वी को रुण्ड-मुण्डमयी कर देंगे (सिरों और धड़ों से छा देंगे)।

चौपाई

दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू॥ एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए॥ २ ॥

अर्थ:

निषादराज ने वीरों का बढ़िया दल देखकर कहा--जुझाऊ (लड़ाई का) ढोल बजाओ। इतना कहते ही बायीं ओर छींक हुई। शकुन विचारने वालों ने कहा कि खेत सुन्दर हैं (जीत होगी)।

चौपाई

बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी॥ रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

एक बूढ़े ने शकुन विचारकर कहा-भरत से मिल लीजिये, उनसे लड़ाई नहीं होगी। भरत श्रीरामचन्द्रजी को मनाने जा रहे हैं। शकुन ऐसा कह रहा है कि विरोध नहीं है।

चौपाई

सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा॥ भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें॥ ४ ॥

अर्थ:

यह सुनकर निषादराज गुह ने कहा--बूढ़ा ठीक कह रहा है। जल्दी में (बिना विचारे) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं। भरतजी का शील-स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करने में हित की बहुत बड़ी हानि है।

दोहा

गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ। बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ॥ १९२ ॥

अर्थ:

अतएव हे वीरो! तुमलोग इकट्ठे होकर सब घाटों को रोक लो, मैं जाकर भरतजी से मिलकर उनका मर्म लेता हूँ। उनका भाव मित्र का है या शत्रु का या उदासीन का, यह जानकर तब आकर वैसा (उसी के अनुसार) प्रबन्ध करूँगा।