वसिष्ठ-भरत संवाद, श्रीरामजी को लाने के लिए चित्रकूट जाने की तैयारी

गुरु वसिष्ठजी भरतजी को धर्म और राज्य की मर्यादा समझाते हैं, पर भरतजी का एक ही संकल्प रहता है कि श्रीरामजी को लौटा लाया जाए। इसी भावना से चित्रकूट जाने की तैयारी आरंभ होती है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २८ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी॥ सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥ १ ॥

अर्थ:

पिताजी के लिए भरतजी ने जैसी करनी की वह लाखों मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती। तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी आये और उन्होंने मन्त्रियों तथा सब महाजनोंको बुलवाया।

चौपाई

बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई॥ भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे॥ २ ॥

अर्थ:

सब लोग राजसभामें जाकर बैठ गये। तब मुनिने भरतजी तथा शत्रुघ्नजी दोनों भाइयोंको बुलवा भेजा। भरतजीको वसिष्ठजीने अपने पास बैठा लिया और नीति तथा धर्मसे भरे हुए वचन कहे।

चौपाई

प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी॥ भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा॥ ३ ॥

अर्थ:

पहले तो कैकेयीने जैसी कुटिल करनी की थी, श्रेष्ठ मुनिने वह सारी कथा कही। फिर राजाके धर्मत्रत और सत्यकी सराहना की, जिन्होंने शरीर त्यागकर प्रेमको निबाहा।

चौपाई

कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ॥ बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका वर्णन करते-करते तो मुनिराजके नेत्रोंमें जल भर आया और वे शरीरसे पुलकित हो गये। फिर लक्ष्मणजी और सीताजीके प्रेमकी बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेहमें मग्र हो गये।

दोहा

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥ १७१ ॥

अर्थ:

मुनिनाथने विलखकर (दुखी होकर) कहा-हे भरत! सुनो, भावी (होनहार) बड़ी बलवान्‌ है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाताके हाथ हैं।

दोहा 172 के अंतर्गत
चौपाई

अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू॥ तात बिचारु करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

ऐसा विचारकर किसे दोष दिया जाय? और व्यर्थ किस पर क्रोध किया जाय? हे तात! मन में विचार करो। राजा दशरथ सोच करने के योग्य नहीं हैं।

चौपाई

सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥ सोचिअ नृपति जो नीति न जाना जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥ २ ॥

अर्थ:

सोच उस ब्राह्मण का करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय-भोग में ही लीन रहता है। उस राजा का सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणों के समान प्यारी नहीं है।

चौपाई

सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू॥ सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी॥ ३ ॥

अर्थ:

उस वैश्य का सोच करना चाहिये जो धनवान् होकर भी कंजूस है, और जो अतिथि-सत्कार तथा शिवजी की भक्ति करने में कुशल नहीं है। उस शूद्र का सोच करना चाहिये जो ब्राह्मणों का अपमान करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, मान-बड़ाई चाहनेवाला और ज्ञान का घमंड रखनेवाला है।

चौपाई

सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी॥ सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई॥ ४ ॥

अर्थ:

पुनः उस स्त्री का सोच करना चाहिये जो पति को छलने वाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है। उस ब्रह्मचारी का सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य-व्रत को छोड़ देता है और गुरु की आज्ञा के अनुसार नहीं चलता।

दोहा

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग॥ १७२ ॥

अर्थ:

उस गृहस्थ का सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्ममार्ग का त्याग कर देता है; उस संन्यासी का सोच करना चाहिये जो प्रपंच में फँसा हुआ है और विवेक-वैराग्य से हीन है।

दोहा 173 के अंतर्गत
चौपाई

बैखानस सोइ सोचै जोगू। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥ सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥ १ ॥

अर्थ:

वानप्रस्थ वही सोच करने योग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओं के साथ विरोध रखनेवाला है।

चौपाई

सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी॥ सोचनीय सबहीं बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई॥ २ ॥

अर्थ:

सब प्रकार से उसका सोच करना चाहिये जो दूसरों का अनिष्ट करता है, अपने ही शरीर का पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है। और वह तो सभी प्रकार से सोच करने योग्य है जो छल छोड़कर हरि का भक्त नहीं होता।

चौपाई

सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥ भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा॥ ३ ॥

अर्थ:

कोसलराज दशरथजी सोच करने योग्य नहीं हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है। हे भरत! तुम्हारे पिता-जैसा राजा तो न हुआ, न है और न अब होने का ही है।

चौपाई

बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा॥ ४ ॥

अर्थ:

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिक्पाल सभी दशरथजी के गुणों की कथाएँ कहा करते हैं।

दोहा

कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु। राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु॥ १७३ ॥

अर्थ:

हे तात! कहो, उनकी बड़ाई कौन किस प्रकार करेगा जिनके श्रीराम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न-सरीखे पवित्र पुत्र हैं?

दोहा 174 के अंतर्गत
चौपाई

सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी॥ यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू॥ १ ॥

अर्थ:

राजा सब प्रकार से बड़भागी थे। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझकर सोच त्याग दो और राजा की आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो।

चौपाई

रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा॥ तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी॥ २ ॥

अर्थ:

राजा ने राजपद तुमको दिया है। पिता का वचन तुम्हें सत्य करना चाहिये, जिन्होंने वचन के लिये ही श्रीरामचन्द्रजी को त्याग दिया और राम-विरह की अग्नि में अपने शरीर की आहुति दे दी।

चौपाई

नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना॥ करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई॥ ३ ॥

अर्थ:

राजा को वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात! पिता के वचनों को प्रमाण (सत्य) करो! राजा की आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसमें तुम्हारी सब तरह भलाई है।

चौपाई

परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी॥ तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

परशुरामजी ने पिता की आज्ञा रखी और माता को मार डाला; सब लोक इस बात के साक्षी हैं। राजा ययाति के पुत्र ने पिता को अपनी जवानी दे दी। पिता की आज्ञा पालन करने से उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ।

दोहा

अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन॥ १७४ ॥

अर्थ:

जो अनुचित और उचित का विचार छोड़कर पिता के वचनों का पालन करते हैं, वे [यहाँ] सुख और सुयश के पात्र होकर अन्त में इन्द्रपुरी (स्वर्ग) में निवास करते हैं।

दोहा 175 के अंतर्गत
चौपाई

अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू॥ सुरपुर नृपु पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृतु सुजसु नहिं दोषू॥ १ ॥

अर्थ:

राजा का वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजा का पालन करो। ऐसा करने से स्वर्ग में राजा सन्तोष पावेंगे और तुमको पुण्य और सुन्दर यश मिलेगा, दोष नहीं लगेगा।

चौपाई

बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका॥ करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी॥ २ ॥

अर्थ:

यह वेद में प्रसिद्ध है और [स्मृति-पुराणादि] सभी शास्त्रों के द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानि का त्याग कर दो। मेरे वचन को हित समझकर मानो।

चौपाई

सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं॥ कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं॥ ३ ॥

अर्थ:

इस बात को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकीजी सुख पावेंगे और कोई पण्डित इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएँ भी प्रजा के सुख से सुखी होंगी।

चौपाई

परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि॥ सौंपेहु राजु राम के आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ॥ ४ ॥

अर्थ:

जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजी के श्रेष्ठ सम्बन्ध को जान लेगा, वह सभी प्रकार से तुमसे भला मानेगा। श्रीरामचन्द्रजी के लौट आने पर राज्य उन्हें सौंप देना और सुन्दर स्नेह से उनकी सेवा करना।

दोहा

कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि॥ १७५ ॥

अर्थ:

मन्त्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं—गुरुजी की आज्ञा का अवश्य ही पालन कीजिये। श्रीरघुनाथजी के लौट आने पर जैसा उचित हो, तब फिर वैसा ही कीजियेगा।

दोहा 176 के अंतर्गत
चौपाई

कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई॥ सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी॥ १ ॥

अर्थ:

कौसल्याजी भी धीरज धरकर कह रही हैं-हे पुत्र! गुरुजी की आज्ञा पथ्यरूप है। उसका आदर करना चाहिये और हित मानकर उसका पालन करना चाहिये। काल की गति को जानकर विषाद का त्याग कर देना चाहिये।

चौपाई

बन रघुपति सुरपुर नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू॥ परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी वन में हैं, महाराज स्वर्ग का राज्य करने चले गये। और हे तात! तुम इस प्रकार कातर हो रहे हो। हे पुत्र! कुटुम्ब, प्रजा, मन्त्री और सब माताओं के--सबके एक तुम ही सहारे हो।

चौपाई

लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई॥ सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू॥ ३ ॥

अर्थ:

विधाता को बाम और काल को कठिन देखकर धीरज धरो, माता तुम्हारी बलिहारी जाती है। गुरु की आज्ञा को सिर चढ़ाकर उसी के अनुसार कार्य करो और प्रजा का पालन कर परिजनों का दुःख हरो।

चौपाई

गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु॥ सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी ने गुरु के वचनों और मन्त्रियों के अभिनन्दन (अनुमोदन) को सुना, जो उनके हृदय के लिये मानो चन्दन के समान [शीतल] थे। फिर उन्होंने शील, स्नेह और सरलता के रस में सनी हुई माता की कोमल वाणी सुनी।

छन्द

सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए। लोचन सरोरुह स्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए॥ सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की। तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की॥

अर्थ:

सरलता के रस में सनी हुई माता की वाणी सुनकर भरतजी व्याकुल हो गये। उनके नेत्र-कमल जल (आँसू) बहाकर हृदय के विरह-रूपी नवीन अंकुर को सींचने लगे। (नेत्रों के आँसुओं ने उनके वियोग-दुःख को बहुत ही बढ़ाकर उन्हें अत्यन्त व्याकुल कर दिया।) उनकी वह दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीर की सुध भूल गयी। तुलसीदासजी कहते हैं--स्वाभाविक प्रेम की सीमा श्रीभरतजी की सब लोग आदरपूर्वक सराहना करने लगे॥।

सोरठा

भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि। बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि॥ १७६ ॥

अर्थ:

धैर्य की धुरी को धारण करनेवाले भरतजी धीरज धरकर, कमल के समान हाथों को जोड़कर, वचनों को मानो अमृत में डुबाकर सबको उचित उत्तर देने लगे--।

दोहा 177 के अंतर्गत
चौपाई

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का॥ मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

गुरुजी ने मुझे सुन्दर उपदेश दिया। [फिर] प्रजा, मन्त्री आदि सभी को यही सम्मत है। माता ने भी उचित समझकर ही आज्ञा दी है और मैं भी अवश्य उसको सिर चढ़ाकर वैसा ही करना चाहता हूँ।

चौपाई

गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी॥ उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू॥ २ ॥

अर्थ:

[क्योंकि] गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहृद्‌ (मित्र) की वाणी सुनकर प्रसन्न मन से उसे अच्छी समझकर करना (मानना) चाहिये। उचित-अनुचित का विचार करने से धर्म जाता है और सिर पर पाप का भार चढ़ता है।

चौपाई

तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई॥ जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें॥ ३ ॥

अर्थ:

आप तो मुझे वही सरल शिक्षा दे रहे हैं, जिसके आचरण करने में मेरा भला हो। यद्यपि मैं इस बात को भलीभाँति समझता हूँ, तथापि मेरे हृदय को सन्तोष नहीं होता।

चौपाई

अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू॥ ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू॥ ४ ॥

अर्थ:

अब आप मेरी विनती सुन लीजिये और मेरी योग्यता के अनुसार मुझे शिक्षा दीजिये। मैं उत्तर दूँ, यह अपराध क्षमा कीजिये। साधु पुरुष दुखी मनुष्य के दोष-गुणों को नहीं गिनते।

दोहा

पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु। एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु॥ १७७ ॥

अर्थ:

पिताजी स्वर्ग में हैं, श्रीसीतारामजी वन में हैं और मुझे आप राज्य करने के लिए कह रहे हैं। इसमें आप मेरा कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम [होने की आशा रखते हैं]?

दोहा 178 के अंतर्गत
चौपाई

हित हमार सियपति सेवकाईं। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाईं॥ मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

मेरा कल्याण तो सीतापति श्रीरामजी की सेवा में है, सो उसे माता की कुटिलता ने छीन लिया। मैंने अपने मन में अनुमान करके देख लिया है कि दूसरे किसी उपाय से मेरा कल्याण नहीं है।

चौपाई

सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें॥ बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू॥ २ ॥

अर्थ:

यह शोक का समुदाय राज्य किस गिनती में है, लक्ष्मण, श्रीराम और सीताजी के पद देखे बिना? जैसे कपड़ों के बिना गहनों का बोझ व्यर्थ है। वैराग्य के बिना ब्रह्मविचार व्यर्थ है।

चौपाई

सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा॥ जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई॥ ३ ॥

अर्थ:

रोगी शरीर के लिए नाना प्रकार के भोग व्यर्थ हैं। श्रीहरि की भक्ति के बिना जप और योग व्यर्थ हैं। जीव के बिना सुन्दर देह व्यर्थ है। वैसे ही श्रीरघुनाथजी के बिना मेरा सब कुछ व्यर्थ है।

चौपाई

जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू॥ मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू॥ ४ ॥

अर्थ:

मुझे आज्ञा दीजिये, मैं श्रीरामजी के पास जाऊँ! एक ही निश्चय मेरा हित इसी में है। और मुझे राजा बनाकर आप अपना भला चाहते हैं, यह भी आप स्नेह की जड़ता के वश होकर ही कह रहे हैं।

दोहा

कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज। तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज॥ १७८ ॥

अर्थ:

कैकेयी के पुत्र, कुटिलमति, रामविमुख और निर्लज्ज मुझ-से अधम के राज्य से आप मोह के वश होकर ही सुख चाहते हैं।

दोहा 179 के अंतर्गत
चौपाई

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू॥ मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं॥ १ ॥

अर्थ:

मैं सत्य कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें, धर्मशील को ही राजा होना चाहिये। मुझे राज्य हठ करके देंगे तभी पृथ्वी पाताल में धँस जायगी।

चौपाई

मोहि समान को पापनिवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू॥ रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥ २ ॥

अर्थ:

मेरे समान पापों का घर कौन है, जिसके लिए सीताजी और श्रीरामजी का बनवास हुआ ? राजा ने श्रीरामजी को वन दिया और उनके बिछुड़ते ही अमरपुर को गमन किया।

चौपाई

मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥ बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू॥ ३ ॥

अर्थ:

मैं दुष्ट, जो सारे अनर्थों का कारण हूँ, बैठा सब बातें सुन रहा हूँ! श्रीरघुनाथजी से रहित घर को देखकर और जगत् के उपहास को सहकर भी ये प्राण बने हुए हैं।

चौपाई

राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे॥ कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई॥ ४ ॥

अर्थ:

यह इसका यही कारण है कि ये प्राण श्रीरामरूपी पवित्र विषय-रसमें आसक्त नहीं हैं। ये लालची भूमि और भोगोंके ही भूखे हैं। मैं अपने हृदयकी कठोरता कहाँतक कहूँ ? जिसने वज्रका भी तिरस्कार करके बड़ाई पायी है।

दोहा

कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर॥ १७९ ॥

अर्थ:

कारण से कार्य कठिन होता ही है, इसमें मेरा दोष नहीं। हड्डी से वज्र और पत्थर से लोहा भयानक और कठोर होता है।

दोहा 180 के अंतर्गत
चौपाई

कैकेई भव तनु अनुरागे। पावँर प्रान अघाइ अभागे॥ जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे॥ १ ॥

अर्थ:

कैकेयी से उत्पन्न देह में प्रेम करनेवाले ये पामर प्राण भरपेट (पूरी तरह से) अभागे हैं। जब प्रिय के वियोग में भी मुझे प्राण प्रिय लग रहे हैं तब अभी आगे मैं और भी बहुत कुछ देखूँ-सुनूँगा।

चौपाई

लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा॥ लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू॥ २ ॥

अर्थ:

लक्ष्मण, श्रीरामजी और सीताजी को तो वन दिया; स्वर्ग भेजकर पति का कल्याण किया; स्वयं विधवापन और अपयश लिया; प्रजा को शोक और संताप दिया।

चौपाई

मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकईं सब कर काजू॥ एहि तें मोर काह अब नीका ॥ तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥ तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका॥ ३ ॥

अर्थ:

और मुझे सुख, सुजस, सुराज्य दिया! कैकेयी ने सब कर काज किया! इससे मेरा अब क्या भला है? उस पर भी आप लोग मुझे टीका देने को कहते हैं!।

चौपाई

कैकइ जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं॥ मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई॥ ४ ॥

अर्थ:

कैकेयी के जठर से जगत में जन्म लेकर यह मेरे लिये कुछ भी अनुचित नहीं है। मेरी सब बात तो विधाता ने ही बना दी है। [फिर] प्रजा पाँच क्‍यों करहु सहाई।

दोहा

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार॥ १८० ॥

अर्थ:

जिसे ग्रह लगे हों [अथवा जो पिशाचग्रस्त हो], फिर जो वायु रोग से पीड़ित हो और उसी को फिर बिच्छू डंक मार दे, उसको यदि मदिरा पिलायी जाय, तो कहिये यह कैसा इलाज है।

दोहा 181 के अंतर्गत
चौपाई

कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई॥ दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई॥ १ ॥

अर्थ:

कैकेयी के लड़के के लिये संसार में जो कुछ योग्य था, चतुर विधाता ने मुझे वही दिया। पर “दशरथजी का पुत्र” और “राम का छोटा भाई” होने की बड़ाई मुझे विधाता ने व्यर्थ ही दी।

चौपाई

तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका॥ उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही॥ २ ॥

अर्थ:

आप सब लोग भी मुझे टीका कढ़ाने के लिये कह रहे हैं! राजा की आज्ञा सभी के लिये अच्छी है। मैं किस-किस को किस-किस प्रकार से उत्तर दूँ? जिसकी जैसी रुचि हो, आप लोग सुखपूर्वक वही कहें।

चौपाई

मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई॥ मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

मेरी कुमाता समेत मुझे छोड़कर, कहिये, और कौन कहेगा कि यह काम अच्छा किया गया? जड़-चेतन जगत में मेरे सिवा और कौन है जिसको श्रीसीतारामजी प्राणों के समान प्यारे न हों।

चौपाई

परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहिं दूषन काहू॥ संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू॥ ४ ॥

अर्थ:

जो परम हानि है, उसीमें सबको बड़ा लाभ दीख रहा है। मेरा बुरा दिन है किसीका दोष नहीं। आप सब जो कुछ कहते हैं सो सब उचित ही है। क्योंकि आप लोग संशय, शील और प्रेम के वश हैं।

दोहा

राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि। कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि॥ १८१ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी की माता बहुत ही सरलहृदय हैं और मुझ पर उनका विशेष प्रेम है। इसलिये मेरी दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेहवश ही ऐसा कह रही हैं।

दोहा 182 के अंतर्गत
चौपाई

गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना॥ मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँबिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ॥ १ ॥

अर्थ:

गुरुजी ज्ञानके समुद्र हैं, यह सारा जगत जानता है, जिनके लिये विश्व हथेली पर रखे हुए बेर के समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलक का साज सजा रहे हैं। सत्य है, विधाता के विपरीत होने पर सब कोई विपरीत हो जाते हैं।

चौपाई

परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥ सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी को छोड़कर जगत में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थ में मेरी सम्मति नहीं है। मैं उसे सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा। क्योंकि जहाँ पानी होता है, वहाँ अन्त में कीचड़ होता ही है।

चौपाई

डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू॥ एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी॥ ३ ॥

अर्थ:

मुझे इसका डर नहीं है कि जगत् मुझे बुरा कहेगा और न मुझे परलोक का ही सोच है। मेरे हृदय में तो बस, एक ही दुःसह दावानल धधक रहा है कि मेरे कारण श्रीसीतारामजी दुखी हुए।

चौपाई

जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा॥ मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी॥ ४ ॥

अर्थ:

जीवन का उत्तम लाभ तो लक्ष्मण ने पाया, जिन्होंने सब कुछ तजकर श्रीरामजी के चरणों में मन लगाया। मेरा जन्म तो श्रीरामजी के वनवास के लिये ही हुआ था। मैं अभागा झूठ-मूठ क्‍या पछताता हूँ ?।

दोहा

आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ। देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ॥ १८२ ॥

अर्थ:

सबको सिर झुकाकर मैं अपनी दारुण दीनता कहता हूँ। श्रीरघुनाथजी के चरणों के दर्शन किये बिना मेरे जी की जलन न जायगी।

दोहा 183 के अंतर्गत
चौपाई

आन उपाउ मोहि नहिं सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा॥ एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता। श्रीरामजी के बिना मेरे हृदय की बात कौन जान सकता है? मन में एक ही निश्चय है कि प्रातःकाल प्रभु श्रीरामजी के पास चल दूँगा।

चौपाई

जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी॥ तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी॥ २ ॥

अर्थ:

यद्यपि मैं बुरा हूँ और अपराधी हूँ, और मेरे ही कारण यह सब उपद्रव हुआ है, तथापि श्रीरामजी मुझे शरण में सम्मुख आया हुआ देखकर सब अपराध क्षमा करके मुझपर विशेष कृपा करेंगे।

चौपाई

सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥ अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी शील, संकोच, अत्यन्त सरल स्वभाव, कृपा और स्नेह के घर हैं। श्रीरामजी ने कभी शत्रु का भी अनिष्ट नहीं किया। मैं यद्यपि टेढ़ा हूँ पर हूँ तो उनका बच्चा और गुलाम ही।

चौपाई

तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी॥ जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी॥ ४ ॥

अर्थ:

आप पंच (सब) लोग भी इसीमें मेरा कल्याण मानकर सुन्दर वाणीसे आज्ञा और आशीर्वाद दीजिये, जिसमें मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास जानकर श्रीरामचन्द्रजी राजधानीको लौट आवें।

दोहा

जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस। आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस॥ १८३ ॥

अर्थ:

यद्यपि मेरा जन्म कुमाता से हुआ है और मैं दुष्ट तथा सदा दोषयुक्त भी हूँ, तो भी मुझे श्रीरामजी का भरोसा है कि वे मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं।

दोहा 184 के अंतर्गत
चौपाई

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे॥ लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी के वचन सबको प्यारे लगे। मानो वे श्रीरामजी के प्रेमरूपी अमृत में पगे हुए थे। श्रीरामवियोगरूपी भीषण विषसे सब लोग जले हुए थे। वे मानो बीजसहित मन्त्र को सुनते ही जाग उठे।

चौपाई

मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी॥ भरतहि कहहिं सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही॥ २ ॥

अर्थ:

माता, सचिव, गुरु, नगरके स्त्री-पुरुष सभी स्नेहके कारण बहुत ही व्याकुल हो गये। सब भरतजीको सराह-सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेम की साक्षात्‌ मूर्ति ही है।

चौपाई

तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू॥ जो पावँरु अपनी जड़ताईं। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाईं॥ ३ ॥

अर्थ:

हे तात भरत! आप ऐसा क्‍यों न कहें। श्रीरामजीको आप प्राणोंके समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी जड़तासे आपकी माता कैकेयीकी कुटिलताको लेकर आपपर सन्देह करेगा,

चौपाई

सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता॥ अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई॥ ४ ॥

अर्थ:

वह दुष्ट करोड़ों पुरखोंसहित सौ कल्पोंतक नरकके घरमें निवास करेगा। साँपके पाप और अवगुणको मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विषको हर लेती है और दुःख तथा दरिद्रताको भस्म कर देती है।

दोहा

अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह। सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह॥ १८४ ॥

अर्थ:

हे भरतजी! वनको अवश्य चलिये, जहाँ श्रीरामजी हैं; आपने बहुत अच्छी सलाह विचारी। शोकसमुद्रमें डूबते हुए सब लोगोंको आपने [बड़ा] सहारा दे दिया।

दोहा 185 के अंतर्गत
चौपाई

भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा॥ चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के॥ १ ॥

अर्थ:

सब के मन में कम आनन्द नहीं हुआ (अर्थात् बहुत ही आनन्द हुआ)! मानो मेघों की गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों। [दूसरे दिन] प्रातःकाल चलने का सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभी को प्राणप्रिय हो गये।

चौपाई

मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई॥ धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

मुनि वसिष्ठजी की वन्दना करके और भरतजी को सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घर को चले। जगत् में भरतजी का जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्नेह की सराहना करते जाते हैं।

चौपाई

कहहिं परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू॥ जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी॥ ३ ॥

अर्थ:

आपस में कहते हैं, बड़ा काम हुआ। सभी चलने की तैयारी करने लगे। जिसको भी घर की रखवाली के लिये रहना हो, ऐसा कहकर रखते हैं, वही समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी।

चौपाई

कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू॥ ४ ॥

अर्थ:

कोई-कोई कहते हैं—रहने के लिये किसी को भी मत कहो, जगत् में जीवन का लाभ कौन नहीं चाहता ?

दोहा

जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ। सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ॥ १८५ ॥

अर्थ:

वह सम्पत्ति, घर, सुख, सुहृद, माता, पिता, भाई जल जाय जो श्रीरामजी के चरणों के सम्मुख होने में हँसते हुए (प्रसन्नतापूर्वक) सहायता न करे।

दोहा 186 के अंतर्गत
चौपाई

घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना॥ भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू॥ १ ॥

अर्थ:

घर-घर लोग अनेकों प्रकार की सवारियाँ सजा रहे हैं। हृदय में [बड़ा] हर्ष है कि सबेरे चलना है। भरतजी ने घर जाकर विचार किया कि नगर, घोड़े, हाथी, महल-खजाना आदि—।

चौपाई

संपति सब रघुपति कै आही। जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही॥ तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई॥ २ ॥

अर्थ:

सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजी की है। यदि उसकी [रक्षा की] व्यवस्था किये बिना उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूँ, तो परिणाम में मेरी भलाई नहीं है। क्योंकि स्वामी का द्रोह सब पापों में शिरोमणि (श्रेष्ठ) है।

चौपाई

करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई॥ अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले॥ ३ ॥

अर्थ:

सेवक वही है जो स्वामी का हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे। भरतजी ने ऐसा विचार कर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया जो कभी स्वप्न में भी अपने धर्म से नहीं डिगे थे।

चौपाई

कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा॥ करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी ने उनको सब भेद समझाकर फिर उत्तम धर्म बतलाया; और जो जिस योग्य था, उसे उसी काम पर नियुक्त कर दिया। सब व्यवस्था करके, रक्षकों को रखकर भरतजी राममाता कौसल्याजी के पास गये।

दोहा

आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान। कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान॥ १८६ ॥

अर्थ:

स्नेह के सुजान (प्रेम के तत्त्व को जानने वाले) भरतजी ने सब माताओं को आर्त (दुखी) जानकर उनके लिये पालकियाँ तैयार करने तथा सुखासन-यान (सुखपाल) सजाने के लिये कहा।