वसिष्ठ-भरत संवाद, श्रीरामजी को लाने के लिए चित्रकूट जाने की तैयारी
गुरु वसिष्ठजी भरतजी को धर्म और राज्य की मर्यादा समझाते हैं, पर भरतजी का एक ही संकल्प रहता है कि श्रीरामजी को लौटा लाया जाए। इसी भावना से चित्रकूट जाने की तैयारी आरंभ होती है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण २८ / ४९
प्रकरण पाठ
कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ॥ बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका वर्णन करते-करते तो मुनिराजके नेत्रोंमें जल भर आया और वे शरीरसे पुलकित हो गये। फिर लक्ष्मणजी और सीताजीके प्रेमकी बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेहमें मग्र हो गये।
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥ सोचिअ नृपति जो नीति न जाना जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥ २ ॥
अर्थ:
सोच उस ब्राह्मण का करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय-भोग में ही लीन रहता है। उस राजा का सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणों के समान प्यारी नहीं है।
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू॥ सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी॥ ३ ॥
अर्थ:
उस वैश्य का सोच करना चाहिये जो धनवान् होकर भी कंजूस है, और जो अतिथि-सत्कार तथा शिवजी की भक्ति करने में कुशल नहीं है। उस शूद्र का सोच करना चाहिये जो ब्राह्मणों का अपमान करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, मान-बड़ाई चाहनेवाला और ज्ञान का घमंड रखनेवाला है।
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी॥ सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई॥ ४ ॥
अर्थ:
पुनः उस स्त्री का सोच करना चाहिये जो पति को छलने वाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है। उस ब्रह्मचारी का सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य-व्रत को छोड़ देता है और गुरु की आज्ञा के अनुसार नहीं चलता।
बैखानस सोइ सोचै जोगू। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥ सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥ १ ॥
अर्थ:
वानप्रस्थ वही सोच करने योग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओं के साथ विरोध रखनेवाला है।
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी॥ सोचनीय सबहीं बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई॥ २ ॥
अर्थ:
सब प्रकार से उसका सोच करना चाहिये जो दूसरों का अनिष्ट करता है, अपने ही शरीर का पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है। और वह तो सभी प्रकार से सोच करने योग्य है जो छल छोड़कर हरि का भक्त नहीं होता।
बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका॥ करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी॥ २ ॥
अर्थ:
यह वेद में प्रसिद्ध है और [स्मृति-पुराणादि] सभी शास्त्रों के द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानि का त्याग कर दो। मेरे वचन को हित समझकर मानो।
परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि॥ सौंपेहु राजु राम के आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ॥ ४ ॥
अर्थ:
जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजी के श्रेष्ठ सम्बन्ध को जान लेगा, वह सभी प्रकार से तुमसे भला मानेगा। श्रीरामचन्द्रजी के लौट आने पर राज्य उन्हें सौंप देना और सुन्दर स्नेह से उनकी सेवा करना।
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु॥ सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी॥ ४ ॥
अर्थ:
भरतजी ने गुरु के वचनों और मन्त्रियों के अभिनन्दन (अनुमोदन) को सुना, जो उनके हृदय के लिये मानो चन्दन के समान [शीतल] थे। फिर उन्होंने शील, स्नेह और सरलता के रस में सनी हुई माता की कोमल वाणी सुनी।
सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरतु ब्याकुल भए। लोचन सरोरुह स्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए॥ सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की। तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की॥
अर्थ:
सरलता के रस में सनी हुई माता की वाणी सुनकर भरतजी व्याकुल हो गये। उनके नेत्र-कमल जल (आँसू) बहाकर हृदय के विरह-रूपी नवीन अंकुर को सींचने लगे। (नेत्रों के आँसुओं ने उनके वियोग-दुःख को बहुत ही बढ़ाकर उन्हें अत्यन्त व्याकुल कर दिया।) उनकी वह दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीर की सुध भूल गयी। तुलसीदासजी कहते हैं--स्वाभाविक प्रेम की सीमा श्रीभरतजी की सब लोग आदरपूर्वक सराहना करने लगे॥।
गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी॥ उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू॥ २ ॥
अर्थ:
[क्योंकि] गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहृद् (मित्र) की वाणी सुनकर प्रसन्न मन से उसे अच्छी समझकर करना (मानना) चाहिये। उचित-अनुचित का विचार करने से धर्म जाता है और सिर पर पाप का भार चढ़ता है।
राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे॥ कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई॥ ४ ॥
अर्थ:
यह इसका यही कारण है कि ये प्राण श्रीरामरूपी पवित्र विषय-रसमें आसक्त नहीं हैं। ये लालची भूमि और भोगोंके ही भूखे हैं। मैं अपने हृदयकी कठोरता कहाँतक कहूँ ? जिसने वज्रका भी तिरस्कार करके बड़ाई पायी है।
कैकेई भव तनु अनुरागे। पावँर प्रान अघाइ अभागे॥ जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे॥ १ ॥
अर्थ:
कैकेयी से उत्पन्न देह में प्रेम करनेवाले ये पामर प्राण भरपेट (पूरी तरह से) अभागे हैं। जब प्रिय के वियोग में भी मुझे प्राण प्रिय लग रहे हैं तब अभी आगे मैं और भी बहुत कुछ देखूँ-सुनूँगा।
गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना॥ मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँबिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ॥ १ ॥
अर्थ:
गुरुजी ज्ञानके समुद्र हैं, यह सारा जगत जानता है, जिनके लिये विश्व हथेली पर रखे हुए बेर के समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलक का साज सजा रहे हैं। सत्य है, विधाता के विपरीत होने पर सब कोई विपरीत हो जाते हैं।
परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥ सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी को छोड़कर जगत में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थ में मेरी सम्मति नहीं है। मैं उसे सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा। क्योंकि जहाँ पानी होता है, वहाँ अन्त में कीचड़ होता ही है।
भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा॥ चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के॥ १ ॥
अर्थ:
सब के मन में कम आनन्द नहीं हुआ (अर्थात् बहुत ही आनन्द हुआ)! मानो मेघों की गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों। [दूसरे दिन] प्रातःकाल चलने का सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभी को प्राणप्रिय हो गये।
मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई॥ धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं॥ २ ॥
अर्थ:
मुनि वसिष्ठजी की वन्दना करके और भरतजी को सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घर को चले। जगत् में भरतजी का जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्नेह की सराहना करते जाते हैं।
संपति सब रघुपति कै आही। जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही॥ तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई॥ २ ॥
अर्थ:
सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजी की है। यदि उसकी [रक्षा की] व्यवस्था किये बिना उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूँ, तो परिणाम में मेरी भलाई नहीं है। क्योंकि स्वामी का द्रोह सब पापों में शिरोमणि (श्रेष्ठ) है।