जनकजी का पहुँचना, कोल-किरातादि की भेंट, सबका परस्पर मिलाप

राजा जनक चित्रकूट पहुँचते हैं और कोल-किरातादि से भेंट करते हुए सबके बीच प्रेमपूर्ण मिलन होता है। ऋषि, राजपरिवार और वनवासी एक ही भाव में जुड़कर शोक और धर्म की साझा अनुभूति करते हैं।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४२ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी॥ सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति॥ १ ॥

अर्थ:

दूतोंने आकर राजा जनकजी की सभा में भरतजी की करनी का अपनी बुद्धि के अनुसार वर्णन किया। उसे सुनकर गुरु, परिजन, मन्त्री और राजा सभी सोच और स्नेह से अत्यन्त व्याकुल हो गये।

चौपाई

धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई॥ घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे॥ २ ॥

अर्थ:

फिर जनकजी ने धीरज धरकर और भरतजी की बड़ाई करके अच्छे योद्धाओं और साहनियों को बुलाया। घर, पुर, देश में रखवाले रखकर घोड़े, हाथी, रथ आदि बहुत-सी जान सँवारीं।

चौपाई

दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महिपाला॥ भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा॥ ३ ॥

अर्थ:

वे दुघरी साधकर उसी समय चल पड़े। राजा ने मार्ग में कहीं विश्राम नहीं किया। आज भोर में प्रयाग में स्नान करके चले हैं। जब सब लोग यमुना उतरने लगे।

चौपाई

खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा॥ साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे॥ ४ ॥

अर्थ:

तब हे नाथ! हमें खबर लेने के लिए भेजा। उन्होंने ऐसा कहकर पृथ्वी पर सिर नवाया। मुनिवर ने तुरत छह-सात किरात साथ दिए और दूतों को तुरंत विदा कर दिया।

दोहा

सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु। रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु॥ २७२ ॥

अर्थ:

जनकजी का आगमन सुनकर अवध का सारा समाज हर्षित हो गया। रघुनंदन को बड़ा संकोच हुआ और देवराज इन्द्र तो विशेष रूप से सोच के वश में हो गये।

दोहा 273 के अंतर्गत
चौपाई

गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई॥ अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी॥ १ ॥

अर्थ:

कुटिल कैकेयी मन-ही-मन ग्लानि (पश्चात्ताप) से गली जाती है। किससे कहे और किसको दोष दे? ऐसा मन में लाकर नर-नारी प्रसन्न हुए कि [ अच्छा हुआ, जनकजी के आने से] चार दिन और रहना हो गया।

चौपाई

एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ॥ करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी॥ २ ॥

अर्थ:

इस प्रकार वह दिन भी बीत गया। प्रातः स्नान करने सब कोई लगे। स्नान करके नर-नारी गणेशजी, गौरीजी, त्रिपुरारि और सूर्यभगवान् की पूजा करते हैं।

चौपाई

रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी॥ राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु के चरणों की वन्दना करके, दोनों हाथ जोड़कर, आँचल पसारकर विनती करते हैं कि श्रीरामजी राजा हों, जानकीजी रानी हों तथा राजधानी अयोध्या आनन्द की अवधि होकर--।

चौपाई

सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा॥ एहि सुख सुधाँ सींचि सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर समाजसहित सुखपूर्वक बसे और श्रीरामजी भरतजी को युवराज बनावें। हे देव! इस सुखरूपी अमृत से सींचकर सब किसी को जगत में जीने का लाभ दीजिये।

दोहा

गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ। अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ॥ २७३ ॥

अर्थ:

गुरु, समाज और भाइयों समेत श्रीरामजी का राज्य अवधपुरी में हो और श्रीरामजी के राजा रहते ही हम लोग अयोध्या में मरें। सब कोई यही माँगते हैं।

दोहा 274 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी॥ एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन॥ १ ॥

अर्थ:

अयोध्यावासियों की प्रेममयी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी योग और वैराग्य की निन्दा करते हैं। इस प्रकार नित्यकर्म करके नगरवासी श्रीरामजी को पुलकित शरीर से प्रणाम करते हैं।

चौपाई

ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी॥ सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं॥ २ ॥

अर्थ:

ऊँच, नीच और मध्यम सभी श्रेणियों के स्त्री-पुरुष अपने-अपने भाव के अनुसार श्रीरामजी का दर्शन प्राप्त करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी सावधानी के साथ सबका सम्मान करते हैं और सभी कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी की सराहना करते हैं।

चौपाई

लरिकाइहि तें रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी॥ सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

लड़कपन से ही श्रीरामजी की यह बानी है कि वे प्रेम को पहचानकर नीति का पालन करते हैं। श्रीरघुनाथजी शील और संकोच के समुद्र हैं। वे सुन्दर मुख के [या सबके अनुकूल रहने वाले], सुन्दर नेत्र वाले [या सबको कृपा और प्रेम की दृष्टि से देखने वाले] और सरल स्वभाव हैं।

चौपाई

कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे॥ हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के गुणसमूहों को कहते-कहते सब लोग प्रेम में भर गये और अपने भाग्य की सराहना करने लगे कि जगत में हमारे समान पुण्य की बड़ी पूँजी वाले थोड़े ही हैं; जिन्हें श्रीरामजी अपना करके जानते हैं।

दोहा

प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु। सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु॥ २७४ ॥

अर्थ:

उस समय सब लोग प्रेम में मग्न हैं। इतने में मिथिलापति जनकजी को आते हुए सुनकर सूर्यकुलरूपी कमल के सूर्य श्रीरामचन्द्रजी सभासहित आदरपूर्वक जल्दी से उठ खड़े हुए।

दोहा 275 के अंतर्गत
चौपाई

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा॥ गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनामु रथ त्यागेउ तबहीं॥ १ ॥

अर्थ:

भाई, मन्त्री, गुरु और पुरवासियों को साथ लेकर श्रीरघुनाथजी आगे चले। जनकजी ने ज्यों ही पर्वतश्रेष्ठ को देखा, त्यों ही प्रणाम करके रथ छोड़ दिया।

चौपाई

राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू॥ मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के दर्शन की लालसा और उत्साह के कारण किसी को मार्ग की थकावट और क्लेश नहीं है। मन तो वहाँ है जहाँ रघुबर और वैदेही हैं। बिना मन के तन के सुख-दुःख की सुध किसको हो?

चौपाई

आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती॥ आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे॥ ३ ॥

अर्थ:

जनकजी इस प्रकार चले आ रहे हैं। समाज सहित उनकी बुद्धि प्रेम में मतवाली हो रही है। निकट आये देखकर सब प्रेम में भर गये और आदरपूर्वक आपस में मिलने लगे।

चौपाई

लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन॥ भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि॥ ४ ॥

अर्थ:

जनकजी मुनिजनों के चरणों की वन्दना करने लगे और रघुनंदन श्रीरामजी ने ऋषियों को प्रणाम किया। फिर भाइयों सहित श्रीरामजी राजा जनकजी से मिलकर उन्हें समाज सहित ले चले।

दोहा

आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु॥ २७५ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी का आश्रम शान्त रस से परिपूर्ण पवित्र समुद्र है। जनकजी की सेना/समाज मानो करुणा की नदी है, जिसे श्रीरघुनाथजी [उस आश्रमरूपी शान्त-रस-सागर में मिलाने के लिए] लिये जा रहे हैं।

दोहा 276 के अंतर्गत
चौपाई

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥ सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥ १ ॥

अर्थ:

यह करुणा की नदी [इतनी बढ़ी हुई है कि] ज्ञान-वैराग्यरूपी किनारों को डुबाती जाती है। शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदी में मिलते हैं; और सोच की लम्बी साँसें (आहें) ही वायु के झकोरों से उठनेवाली तरंगें हैं, जो धैर्यरूपी किनारे के उत्तम वृक्षों को तोड़ रही हैं।

चौपाई

बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा॥ केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा॥ २ ॥

अर्थ:

भयानक विषाद (शोक) ही उस नदी की तेज धारा है। भय और भ्रम (मोह) ही उसके असंख्य भँवर और चक्र हैं। विद्वान् मल्लाह हैं, विद्या ही बड़ी नाव है। परन्तु वे उसे खे नहीं सकते हैं (उस विद्या का उपयोग नहीं कर सकते हैं), किसी को उसकी अटकल ही नहीं आती है।

चौपाई

बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे॥ आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई॥ ३ ॥

अर्थ:

वन में विचरनेवाले बेचारे कोल-किरात ही यात्री हैं, जो उस नदी को देखकर हृदय में हारकर थक गये हैं। यह करुणा-नदी जब आश्रम-समुद्र में जाकर मिली, तो मानो वह समुद्र अकुला उठा (खौल उठा)।

चौपाई

सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा॥ भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही॥ ४ ॥

अर्थ:

दोनों राजसमाज शोक से व्याकुल हो गये। किसी को न ज्ञान रहा, न धैर्य और न लाज ही रही। राजा दशरथजी के रूप, गुण और शील की सराहना करते हुए सब रो रहे हैं और शोकसमुद्र में डुबकी लगा रहे हैं।

छन्द

अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा। दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा॥ सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की। तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की॥

अर्थ:

शोकसमुद्र में डुबकी लगाते हुए सभी स्त्री-पुरुष महान् व्याकुल होकर सोच (चिन्ता) कर रहे हैं। वे सब विधाता को दोष देते हुए क्रोधयुक्त होकर कह रहे हैं कि प्रतिकूल विधाता ने यह क्या किया? तुलसीदासजी कहते हैं कि देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनियों में कोई भी समर्थ नहीं है जो उस समय विदेह (जनकराज) की दशा देखकर प्रेम की नदी को पार कर सके (प्रेम में मग्न हुए बिना रह सके)।

सोरठा

किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह। धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन॥ २७६ ॥

अर्थ:

जहाँ-तहाँ श्रेष्ठ मुनियों ने लोगों को अपरिमित उपदेश दिये और वसिष्ठजी ने विदेह (जनकजी) से कहा-हे राजन्! आप धैर्य धारण कीजिये।

दोहा 277 के अंतर्गत
चौपाई

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा॥ तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई॥ १ ॥

अर्थ:

जिन राजा जनक का ज्ञानरूपी सूर्य भव (आवागमन) रूपी रात्रि का नाश कर देता है, और जिनकी वचनरूपी किरणें मुनिरूपी कमलों को खिला देती हैं (आनन्दित करती हैं), क्या मोह और ममता उनके निकट भी आ सकते हैं ? यह तो श्रीसीतारामजी के प्रेम की महिमा है! [ अर्थात् राजा जनक की यह दशा श्रीसीतारामजी के अलौकिक प्रेम के कारण हुई, लौकिक मोह-ममता के कारण नहीं। जो लौकिक मोह-ममता को पार कर चुके हैं उनपर भी श्रीसीतारामजी का प्रेम अपना प्रभाव दिखाये बिना नहीं रहता]।

चौपाई

बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने॥ राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू॥ २ ॥

अर्थ:

विषयी, साधक और ज्ञानवान् सिद्ध पुरुष--जगत् में ये तीन प्रकार के जीव वेद ने बताये हैं। इन तीनों में जिसका चित्त श्रीरामजी के स्नेह से सरस (सराबोर) रहता है, साधुओं की सभा में उसी का बड़ा आदर होता है।

चौपाई

सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू॥ मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। राम घाट सब लोग नहाए॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के प्रेम के बिना ज्ञान शोभा नहीं देता, जैसे कर्णधार के बिना जहाज। वसिष्ठजी ने विदेहराज (जनकजी) को बहुत प्रकार से समझाया। तदनन्तर सब लोगों ने श्रीरामजी के घाट पर स्नान किया।

चौपाई

सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी॥ पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू॥ ४ ॥

अर्थ:

स्त्री-पुरुष सब शोक से पूर्ण थे। वह दिन बिना ही जल के बीत गया (भोजन की बात तो दूर रही, किसी ने जल तक नहीं पिया)। पशु, पक्षी और हिरनों तक ने कुछ आहार नहीं किया। तब प्रियजनों एवं कुटुम्बियों का तो विचार ही क्या किया जाय ?

दोहा

दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात। बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात॥ २७७ ॥

अर्थ:

निमिराज जनकजी और रघुराज रामचन्द्रजी तथा दोनों ओर के समाज ने दूसरे दिन सबेरे स्नान किया और सब बड़े वृक्ष के नीचे जा बैठे। सबके मन उदास और शरीर दुबले हैं।

दोहा 278 के अंतर्गत
चौपाई

जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी॥ हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा॥ १ ॥

अर्थ:

जो दशरथजी की नगरी अयोध्या के रहनेवाले और जो मिथिलापति जनकजी के नगर जनकपुर के रहनेवाले ब्राह्मण थे, तथा हंस वंश के गुरु वसिष्ठजी और जनकजी के पुरोहित शतानन्दजी, जिन्होंने सांसारिक अभ्युदय का मार्ग तथा परमार्थ का मार्ग छान डाला था।

चौपाई

लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका॥ कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं॥ २ ॥

अर्थ:

वे सब धर्म, नीति, वैराग्य तथा विवेकयुक्त अनेकों उपदेश देने लगे। विश्वामित्रजी ने पुरानी कथाएँ (इतिहास) कह-कहकर सारी सभा को सुन्दर वाणी से समझाया।

चौपाई

तब रघुनाथ कौसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ॥ मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई॥ ३ ॥

अर्थ:

तब श्रीरघुनाथजी ने विश्वामित्रजी से कहा कि हे नाथ! कल सब लोग बिना जल पिये ही रह गये थे [अब कुछ आहार करना चाहिये]। विश्वामित्रजी ने कहा कि श्रीरघुनाथजी उचित ही कह रहे हैं। ढाई पहर दिन [आज भी] बीत गया।

चौपाई

रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू॥ कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना॥ ४ ॥

अर्थ:

विश्वामित्रजी का रुख देखकर तिरहुतराज जनकजी ने कहा-यहाँ अन्न खाना उचित नहीं है। राजा का सुन्दर कथन सबके मन को अच्छा लगा। सब आज्ञा पाकर नहाने चले।

दोहा

तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार। लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार॥ २७८ ॥

अर्थ:

उसी समय अनेकों प्रकार के बहुत-से फल, फूल, पत्ते, मूल आदि बहँगियों और बोझों में भर-भरकर वनवासी (कोल-किरात) लोग ले आये।

दोहा 279 के अंतर्गत
चौपाई

कामद भे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा॥ सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी की कृपा से सब पर्वत मनचाही वस्तु देनेवाले हो गये। वे देखने मात्र से ही दुःखों को सर्वथा हर लेते थे। वहाँ के तालाबों, नदियों, वन और पृथ्वी के सभी भागों में मानो आनन्द और प्रेम उमड़ रहा है।

चौपाई

बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला॥ तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू॥ २ ॥

अर्थ:

बेलें और वृक्ष सभी फल और फूलों से युक्त हो गये। पक्षी, पशु और भौरे अनुकूल बोलने लगे। उस अवसर पर वन में बहुत उत्साह (आनन्द) था, सब किसी को सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चल रही थी।

चौपाई

जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई॥ तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई॥ देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे॥ दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना॥ ३-४ ॥

अर्थ:

वन की मनोहरता वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी जनकजी की पहुनाई कर रही है। तब जनकपुरवासी सब लोग नहा-नहाकर श्रीरामचन्द्रजी, जनकजी और मुनि की आज्ञा पाकर, सुन्दर वृक्षों को देख-देखकर प्रेम में भरकर जहाँ-तहाँ उतरने लगे। पवित्र, सुन्दर और अमृत के समान अनेकों प्रकार के पत्ते, फल, मूल और कन्द--।

दोहा

सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार। पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार॥ २७९ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के गुरु वसिष्ठजी ने सबके पास बोझे भर-भरकर आदरपूर्वक भेजे। तब वे पितर-देवता, अतिथि और गुरु की पूजा करके फलाहार करने लगे।

दोहा 280 के अंतर्गत
चौपाई

एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी॥ दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार चार दिन बीत गये। श्रीरामचन्द्रजी को देखकर सभी नर-नारी सुखी हैं। दोनों समाजों के मन में ऐसी इच्छा है कि श्रीसीतारामजी के बिना लौटना अच्छा नहीं है।

चौपाई

सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू॥ परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीसीतारामजी के साथ वन में रहना करोड़ों देवलोकों के [निवासके] समान सुखदायक है। श्रीलक्ष्मणजी, श्रीरामजी और श्रीजानकीजी को छोड़कर जिसको घर अच्छा लगे, विधाता उसके विपरीत हैं।

चौपाई

दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही॥ मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला॥ ३ ॥

अर्थ:

जब दैव सबके अनुकूल हो, तभी श्रीरामजी के पास वन में निवास हो सकता है। मन्दाकिनीजी में तीनों काल स्नान और आनन्द तथा मंगलों की माला रूप श्रीराम का दर्शन,

चौपाई

अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल॥ सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के पर्वत, वन और तपस्वियों के स्थानों में घूमना और अमृत के समान कन्द, मूल, फलों का भोजन। चौदह वर्ष सुख के साथ पल के समान हो जायेंगे (बीत जायेंगे), जाते हुए जान ही न पड़ेंगे।

दोहा

एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु। सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु॥ २८० ॥

अर्थ:

सब लोग कह रहे हैं कि हम इस सुख के योग्य नहीं हैं, हमारे ऐसे भाग्य कहाँ ? दोनों समाजों का श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सहज स्वभाव से ही प्रेम है।