जनकजी का पहुँचना, कोल-किरातादि की भेंट, सबका परस्पर मिलाप
राजा जनक चित्रकूट पहुँचते हैं और कोल-किरातादि से भेंट करते हुए सबके बीच प्रेमपूर्ण मिलन होता है। ऋषि, राजपरिवार और वनवासी एक ही भाव में जुड़कर शोक और धर्म की साझा अनुभूति करते हैं।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ४२ / ४९
प्रकरण पाठ
ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी॥ सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं॥ २ ॥
अर्थ:
ऊँच, नीच और मध्यम सभी श्रेणियों के स्त्री-पुरुष अपने-अपने भाव के अनुसार श्रीरामजी का दर्शन प्राप्त करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी सावधानी के साथ सबका सम्मान करते हैं और सभी कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी की सराहना करते हैं।
लरिकाइहि तें रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी॥ सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
लड़कपन से ही श्रीरामजी की यह बानी है कि वे प्रेम को पहचानकर नीति का पालन करते हैं। श्रीरघुनाथजी शील और संकोच के समुद्र हैं। वे सुन्दर मुख के [या सबके अनुकूल रहने वाले], सुन्दर नेत्र वाले [या सबको कृपा और प्रेम की दृष्टि से देखने वाले] और सरल स्वभाव हैं।
कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे॥ हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी के गुणसमूहों को कहते-कहते सब लोग प्रेम में भर गये और अपने भाग्य की सराहना करने लगे कि जगत में हमारे समान पुण्य की बड़ी पूँजी वाले थोड़े ही हैं; जिन्हें श्रीरामजी अपना करके जानते हैं।
बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे॥ सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा॥ १ ॥
अर्थ:
यह करुणा की नदी [इतनी बढ़ी हुई है कि] ज्ञान-वैराग्यरूपी किनारों को डुबाती जाती है। शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदी में मिलते हैं; और सोच की लम्बी साँसें (आहें) ही वायु के झकोरों से उठनेवाली तरंगें हैं, जो धैर्यरूपी किनारे के उत्तम वृक्षों को तोड़ रही हैं।
बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा॥ केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा॥ २ ॥
अर्थ:
भयानक विषाद (शोक) ही उस नदी की तेज धारा है। भय और भ्रम (मोह) ही उसके असंख्य भँवर और चक्र हैं। विद्वान् मल्लाह हैं, विद्या ही बड़ी नाव है। परन्तु वे उसे खे नहीं सकते हैं (उस विद्या का उपयोग नहीं कर सकते हैं), किसी को उसकी अटकल ही नहीं आती है।
अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा। दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा॥ सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की। तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की॥
अर्थ:
शोकसमुद्र में डुबकी लगाते हुए सभी स्त्री-पुरुष महान् व्याकुल होकर सोच (चिन्ता) कर रहे हैं। वे सब विधाता को दोष देते हुए क्रोधयुक्त होकर कह रहे हैं कि प्रतिकूल विधाता ने यह क्या किया? तुलसीदासजी कहते हैं कि देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनियों में कोई भी समर्थ नहीं है जो उस समय विदेह (जनकराज) की दशा देखकर प्रेम की नदी को पार कर सके (प्रेम में मग्न हुए बिना रह सके)।
जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा॥ तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई॥ १ ॥
अर्थ:
जिन राजा जनक का ज्ञानरूपी सूर्य भव (आवागमन) रूपी रात्रि का नाश कर देता है, और जिनकी वचनरूपी किरणें मुनिरूपी कमलों को खिला देती हैं (आनन्दित करती हैं), क्या मोह और ममता उनके निकट भी आ सकते हैं ? यह तो श्रीसीतारामजी के प्रेम की महिमा है! [ अर्थात् राजा जनक की यह दशा श्रीसीतारामजी के अलौकिक प्रेम के कारण हुई, लौकिक मोह-ममता के कारण नहीं। जो लौकिक मोह-ममता को पार कर चुके हैं उनपर भी श्रीसीतारामजी का प्रेम अपना प्रभाव दिखाये बिना नहीं रहता]।
बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने॥ राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू॥ २ ॥
अर्थ:
विषयी, साधक और ज्ञानवान् सिद्ध पुरुष--जगत् में ये तीन प्रकार के जीव वेद ने बताये हैं। इन तीनों में जिसका चित्त श्रीरामजी के स्नेह से सरस (सराबोर) रहता है, साधुओं की सभा में उसी का बड़ा आदर होता है।
सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी॥ पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू॥ ४ ॥
अर्थ:
स्त्री-पुरुष सब शोक से पूर्ण थे। वह दिन बिना ही जल के बीत गया (भोजन की बात तो दूर रही, किसी ने जल तक नहीं पिया)। पशु, पक्षी और हिरनों तक ने कुछ आहार नहीं किया। तब प्रियजनों एवं कुटुम्बियों का तो विचार ही क्या किया जाय ?
जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी॥ हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा॥ १ ॥
अर्थ:
जो दशरथजी की नगरी अयोध्या के रहनेवाले और जो मिथिलापति जनकजी के नगर जनकपुर के रहनेवाले ब्राह्मण थे, तथा हंस वंश के गुरु वसिष्ठजी और जनकजी के पुरोहित शतानन्दजी, जिन्होंने सांसारिक अभ्युदय का मार्ग तथा परमार्थ का मार्ग छान डाला था।
तब रघुनाथ कौसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ॥ मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई॥ ३ ॥
अर्थ:
तब श्रीरघुनाथजी ने विश्वामित्रजी से कहा कि हे नाथ! कल सब लोग बिना जल पिये ही रह गये थे [अब कुछ आहार करना चाहिये]। विश्वामित्रजी ने कहा कि श्रीरघुनाथजी उचित ही कह रहे हैं। ढाई पहर दिन [आज भी] बीत गया।
कामद भे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा॥ सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी की कृपा से सब पर्वत मनचाही वस्तु देनेवाले हो गये। वे देखने मात्र से ही दुःखों को सर्वथा हर लेते थे। वहाँ के तालाबों, नदियों, वन और पृथ्वी के सभी भागों में मानो आनन्द और प्रेम उमड़ रहा है।
बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला॥ तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू॥ २ ॥
अर्थ:
बेलें और वृक्ष सभी फल और फूलों से युक्त हो गये। पक्षी, पशु और भौरे अनुकूल बोलने लगे। उस अवसर पर वन में बहुत उत्साह (आनन्द) था, सब किसी को सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चल रही थी।
जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई॥ तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई॥ देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे॥ दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना॥ ३-४ ॥
अर्थ:
वन की मनोहरता वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी जनकजी की पहुनाई कर रही है। तब जनकपुरवासी सब लोग नहा-नहाकर श्रीरामचन्द्रजी, जनकजी और मुनि की आज्ञा पाकर, सुन्दर वृक्षों को देख-देखकर प्रेम में भरकर जहाँ-तहाँ उतरने लगे। पवित्र, सुन्दर और अमृत के समान अनेकों प्रकार के पत्ते, फल, मूल और कन्द--।
अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल॥ सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी के पर्वत, वन और तपस्वियों के स्थानों में घूमना और अमृत के समान कन्द, मूल, फलों का भोजन। चौदह वर्ष सुख के साथ पल के समान हो जायेंगे (बीत जायेंगे), जाते हुए जान ही न पड़ेंगे।