केवट का प्रेम और गंगा पार जाना

केवट प्रभु के चरणों को धोकर अपनी निष्कपट भक्ति अर्पित करता है। फिर वह अत्यंत प्रेम से श्रीरामजी, सीताजी और लक्ष्मणजी को गंगा पार उतारता है।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण १७ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

जासु बियोग बिकल पसु ऐसें। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें॥ बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए॥ १ ॥

अर्थ:

जिनके वियोग में पशु इस प्रकार व्याकुल हैं, उनके वियोग में प्रजा, माता और पिता कैसे जीते रहेंगे? श्रीरामचन्द्रजी ने जबर्दस्ती सुमन्त्र को लौटाया। तब आप गंगा जी के तीर पर आये।

चौपाई

मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥ चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीराम ने केवट से नाव माँगी, पर वह लाया नहीं। वह कहने लगा--मैंने तुम्हारा मर्म (भेद) जान लिया। तुम्हारे चरणकमलों की धूल के लिये सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है।

चौपाई

छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई॥ तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई॥ ३ ॥

अर्थ:

जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुन्दरी स्त्री हो गयी [मेरी नाव तो काठ की है]। काठ पत्थर से कठोर तो होता नहीं। मेरी नाव भी मुनि की स्त्री हो जायगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जायगी, मैं लुट जाऊँगा [अथवा रास्ता रुक जायगा जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोज़ी मारी जायगी] (मेरी कमाने-खाने की राह ही मारी जायगी)।

चौपाई

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू॥ जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं तो इसी नाव से सारे परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। दूसरा कोई धंधा नहीं जानता। हे प्रभु! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरण-कमल पखारने (धो लेने) के लिये कह दो।

छन्द

पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं॥ बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं। तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥

अर्थ:

हे नाथ! मैं चरणकमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे कुछ उतराई नहीं चाहता। हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथ जी की सौगंध है, मैं सब सच-सच कहता हूँ। लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारें, पर जब तक मैं पैरों को पखार न लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ! हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा॥

सोरठा

सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥ १०० ॥

अर्थ:

केवट के प्रेम में लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणाऐन श्रीरामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजी की ओर देखकर हँसे।

दोहा 101 के अंतर्गत
चौपाई

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेहिं तव नाव न जाई॥ बेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥ १ ॥

अर्थ:

कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजी केवट से मुसकराकर बोले-भाई ! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाय। जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे।

चौपाई

जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥ सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥ २ ॥

अर्थ:

एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर के पार उतर जाते हैं, और जिन्होंने [वामनावतार में] जगत् को तीन पग से भी छोटा कर दिया था (दो ही पग में त्रिलोकी को नाप लिया था), वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी [केवट से पार उतारने के लिये] केवट का निहोरा कर रहे हैं !।

चौपाई

पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी॥ केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रभु के इन वचनों को सुनकर देवनदी गंगा जी की बुद्धि मोह से खिंच गयी थी [कि ये साक्षात् भगवान् होकर भी पार उतारने के लिये केवट का निहोरा कर रहे हैं ]। परन्तु [समीप आने पर अपनी उत्पत्ति के स्थान] पदनखों को देखते ही [उन्हें पहचानकर] देवनदी गंगा जी हर्षित हो गयीं। (वे समझ गयीं कि भगवान् नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया; और इन चरणों का स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हर्षित हो गयीं।) केवट श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर कठौते में भरकर जल ले आया।

चौपाई

अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा॥ बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

अत्यन्त आनन्द और प्रेम में उमँगकर वह भगवान् के चरणकमल धोने लगा। सब देवता फूल बरसाकर सिहराने लगे कि इसके समान पुण्य की राशि कोई नहीं है।

दोहा

पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार। पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥ १०१ ॥

अर्थ:

चरणों को धोकर और सारे परिवार सहित स्वयं उस जल (चरणोदक) को पीकर पहले [उस महान् पुण्य के द्वारा] अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्र को गंगा जी के पार ले गया।

दोहा 102 के अंतर्गत
चौपाई

उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता। सीय रामु गुह लखन समेता॥ केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

निषादराज और लक्ष्मणजी सहित श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी [नाव से] उतरकर गंगा जी की रेत में खड़े हो गये। तब केवट ने उतरकर दण्डवत् की। [उसको दण्डवत् करते देखकर] प्रभु को संकोच हुआ कि इसे कुछ दिया नहीं।

चौपाई

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी॥ कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई॥ २ ॥

अर्थ:

पति के हृदय की जाननेवाली सीताजी ने आनन्दभरे मन से अपनी रत्नजटित अँगूठी अँगुली से उतारी। कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो। केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिये।

चौपाई

नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा॥ बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥ ३ ॥

अर्थ:

[उसने कहा--] हे नाथ! आज मैंने क्‍या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गयी है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। आज विधि ने बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी।

चौपाई

अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें॥ फिरती बार मोहि जो देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा॥ ४ ॥

अर्थ:

हे नाथ! हे दीनदयाल! आपकी कृपासे अब मुझे कुछ नहीं चाहिये। लौटती बार आप मुझे जो कुछ देंगे, वह प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा।

दोहा

बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ। बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ॥ १०२ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी ने बहुत आग्रह किया, पर केवट कुछ नहीं लेता। तब करुणाके धाम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ने निर्मल भक्ति का वरदान देकर उसे विदा किया।

दोहा 103 के अंतर्गत
चौपाई

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा॥ सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी॥ १ ॥

अर्थ:

फिर रघुकुल के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी ने स्नान करके पार्थिव पूजा की और सिर नवाया। सीताजी ने हाथ जोड़कर गंगा जी से कहा--हे माता! मेरा मनोरथ पूरा करियेगा।

चौपाई

पति देवर सँग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी॥ सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी॥ २ ॥

अर्थ:

जिससे मैं पति और देवर के साथ कुशलपूर्वक लौटकर तुम्हारी पूजा करूँ। सीताजी की प्रेमरस में सनी हुई विनती सुनकर तब गंगा जी के निर्मल जल से श्रेष्ठ वाणी हुई--

चौपाई

सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही॥ लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें॥ ३ ॥

अर्थ:

हे रघुवीरकी प्रियतमा जानकी ! सुनो, तुम्हारा प्रभाव जगत् में किसे नहीं मालूम है? तुम्हारे [कृपादृष्टिसे] देखते ही लोग लोकपाल हो जाते हैं। सब सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं।

चौपाई

तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई॥ तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होन हित निज बागीसा॥ ४ ॥

अर्थ:

तुमने जो मुझको बड़ी विनती सुनायी, यह तो मुझपर कृपा की और मुझे बड़ाई दी है। तो भी हे देवि! मैं अपनी वाणी सफल होनेके लिये तुम्हें आशीर्वाद दूँगी।

दोहा

प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ। पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ॥ १०३ ॥

अर्थ:

तुम अपने प्राणनाथ और देवरसहित कुशलपूर्वक अयोध्या लौटोगी। तुम्हारी सारी मनःकामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुन्दर यश जगत् भर में छा जायगा।

दोहा 104 के अंतर्गत
चौपाई

गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकूला॥ तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू॥ १ ॥

अर्थ:

मंगल के मूल गंगाजी के वचन सुनकर और देवनदी को अनुकूल देखकर सीताजी आनन्दित हुईं। तब प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने निषादराज गुह से कहा कि भैया! अब तुम घर जाओ। यह सुनते ही उसका मुँह सूख गया और हृदय में दाह उत्पन्न हो गया।

चौपाई

दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी॥ नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई॥ २ ॥

अर्थ:

गुह हाथ जोड़कर दीन वचन बोला-हे रघुकुलशिरोमणि! मेरी विनती सुनिये। मैं नाथ के साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, चार दिन चरणों की सेवा करके--।

चौपाई

जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई॥ तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई॥ ३ ॥

अर्थ:

हे रघुराई! जिस वन में आप जाकर रहेंगे, वहाँ मैं सुन्दर पर्णकुटी बना दूँगा। तब मुझे जैसी आज्ञा देंगे, मुझे रघुवीर की दुहाई है, मैं वही करूँगा।

चौपाई

सहज सनेह राम लखि तासू। संग लीन्ह गुह हृदयँ हुलासू॥ पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे॥ ४ ॥

अर्थ:

उसके स्वाभाविक प्रेम को देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने उसको साथ ले लिया, इससे गुह के हृदय में बड़ा आनन्द हुआ। फिर गुह ने अपनी जाति के लोगों को बुला लिया और उनका संतोष कराके तब उनको विदा किया।

दोहा

तबगनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ। सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ॥ १०४ ॥

अर्थ:

तब प्रभु श्रीरघुनाथजी गणेशजी और शिवजी का स्मरण करके तथा गंगाजी को मस्तक नवाकर सखा निषादराज, छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी सहित वन को चले।