भरतजी चित्रकूट के मार्ग में
भरतजी विनय और विरह से भरे हुए चित्रकूट की ओर बढ़ते हैं। मार्ग में जो भी उन्हें देखता है, वह उनके प्रेम, त्याग और दीनभाव से प्रभावित हो उठता है।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ३५ / ४९
प्रकरण पाठ
जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू॥ रातिहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी॥ १ ॥
अर्थ:
उस दिन यमुनाजी के किनारे निवास किया। समयानुसार सबके लिये [खान-पान आदि] सुन्दर व्यवस्था हुई। [निषादराज का सल्लेत पाकर] रात ही रात में घाट-घाट की अगणित नावें वहाँ आ गयीं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।
सेवक सुहृद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा॥ जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा॥ ४ ॥
अर्थ:
सेवक, सुहृद और सचिव-पुत्र उनके साथ हैं। लक्ष्मण, सीताजी और श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते जा रहे हैं। जहाँ-जहाँ श्रीरामजी ने निवास और विश्राम किया था, वहाँ-वहाँ वे प्रेमसहित प्रणाम करते हैं।
कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं॥ बय बपु बरन रूपु सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली॥ १ ॥
अर्थ:
गाँवों की स्त्रियाँ एक-दूसरी से प्रेमपूर्वक कहती हैं—सखी! ये राम-लक्ष्मण हैं कि नहीं? हे सखी! इनकी अवस्था, शरीर और रंग-रूप तो वही है। शील, स्नेह उन्हीं के सदृश है और चाल भी उन्हीं के समान है।
बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा॥ नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा॥ २ ॥
अर्थ:
परन्तु हे सखी! इनका न तो वह वेष है (वल्कल-वस्त्रधारी मुनिवेष), न सीताजी ही संग हैं। और इनके आगे चतुरंगिणी सेना चली जा रही है। फिर इनके मुख प्रसन्न नहीं हैं, इनके मन में खेद है। हे सखी! इसी भेद के कारण सन्देह होता है।
तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी॥ तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी॥ ३ ॥
अर्थ:
उसका तर्क (युक्ति) अन्य स्त्रियों के मन भाया। सब कहती हैं कि इसके समान सयानी (चतुर) कोई नहीं है। उसकी सराहना करके और 'तेरी वाणी सत्य है' इस प्रकार उसका सम्मान करके दूसरी स्त्री मीठे वचन बोली।
हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें॥ सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं॥ २ ॥
अर्थ:
छोटे भाई के साथ भरतजी को देखकर हम सब भी आज धन्य जुबती जन की गिनती में आ गयीं। इस प्रकार भरतजी के गुण सुनकर और उनकी दशा देखकर स्त्रियाँ पछताती हैं और कहती हैं--यह पुत्र कैकेयी-जैसी माताके योग्य नहीं है।
कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन॥ कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी॥ ३ ॥
अर्थ:
कोई कहती हैं--इसमें रानी का भी दोष नहीं है। यह सब विधाता ने ही किया है, जो हमारे अनुकूल है। कहाँ तो हम लोक और वेद दोनों की विधि (मर्यादा) से हीन, कुल और करतूत दोनों से मलिन तुच्छ स्त्रियाँ।
बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा॥ अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा॥ ४ ॥
अर्थ:
जो बुरे देश (जंगली प्रान्त) और बुरे गाँव में बसती हैं और [स्त्रियों में भी] नीच स्त्रियाँ हैं! और कहाँ यह महान पुण्यों का परिणामस्वरूप इनका दर्शन! ऐसा ही आनन्द और आश्चर्य गाँव-गाँव में हो रहा है। मानो मरुभूमि में कल्पवृक्ष उग गया हो।
निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा॥ तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा॥ १ ॥
अर्थ:
[इस प्रकार] अपने गुणों सहित श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की कथा सुनते और श्रीरघुनाथजी को स्मरण करते हुए भरतजी चले जा रहे हैं। वे तीर्थ देखकर स्नान और मुनियों के आश्रम तथा देवताओं के मन्दिर देखकर प्रणाम करते हैं।
जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे॥ एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी॥ ४ ॥
अर्थ:
जो लोग कहते हैं कि हमने उनको कुशलपूर्वक देखा है, उनको ये श्रीराम-लक्ष्मण के समान ही प्यारे मानते हैं। इस प्रकार सबसे सुन्दर वाणी से पूछते और श्रीरामजी के वनवास की कहानी सुनते जाते हैं।
मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू॥ भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटिहि दुख दाहू॥ १ ॥
अर्थ:
सबको मंगलसूचक शकुन हो रहे हैं। सुख देनेवाले [पुरुषों के दाहिने और स्त्रियों के बायें] नेत्र और भुजाएँ फड़क रही हैं। समाज सहित भरतजी को उत्साह हो रहा है कि श्रीरामचन्द्रजी मिलेंगे और दुःख का दाह मिट जायगा।
करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके॥ सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं॥ २ ॥
अर्थ:
जिसके जी में जैसा है, वह वैसा ही मनोरथ करता है। सब स्नेहरूपी मदिरा से छके ( प्रेम में मतवाले हुए) चले जा रहे हैं। अंग शिथिल हैं, रास्ते में पैर डगमगा रहे हैं और प्रेमवश विह्वल वचन बोल रहे हैं।