श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का वनगमन और नगर निवासियों को सोए छोड़कर आगे बढ़ना
तीनों वन के लिए प्रस्थान करते हैं और अयोध्या के लोग विलाप करते हुए पीछे-पीछे चलते हैं। बाद में श्रीरामजी सबको सोता छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं, ताकि उनका मोह और दुःख न बढ़े।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण १४ / ४९
प्रकरण पाठ
अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा॥ भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे॥ ३ ॥
अर्थ:
ऐसा विचार कर जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। माता की सीख सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने बड़ा सुख पाया। परन्तु राजा को ये वचन बाण के समान लगे। [वे सोचने लगे] अब भी अभागे प्राण क्यों नहीं निकलते !
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े॥ कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए॥ १ ॥
अर्थ:
राजमहल से निकलकर श्रीरामचन्द्रजी वसिष्ठजी के द्वार पर जा खड़े हुए और देखा कि सब लोग विरह की अग्नि में जल रहे हैं। उन्होंने प्रिय वचन कहकर सबको समझाया। फिर श्रीरामचन्द्रजी ने ब्राह्मणों की मण्डली को बुलाया।
राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू॥ कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हरष बिषाद बिबस सुरलोकू॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी के चलते ही बड़ा भारी विषाद हो गया। नगर का आर्तनाद (हाहाकार) सुना नहीं जाता। लंका में बुरे शकुन होने लगे, अयोध्या में अत्यन्त शोक छा गया और देवलोक में सब हर्ष और विषाद दोनों के वश में हो गये। [हर्ष इस बात का था कि अब राक्षसों का नाश होगा और विषाद अयोध्यावासियों के शोक के कारण था]।
जौं नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई॥ तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी॥ १ ॥
अर्थ:
यदि धैर्यवान् दोनों भाई न लौटें—क्योंकि श्रीरघुनाथजी प्रण के सच्चे और दृढ़तासे नियम का पालन करनेवाले हैं—तो तुम हाथ जोड़कर विनती करना कि हे प्रभो! जनककुमारी सीताजी को तो लौटा दीजिये।
चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा॥ कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी को जाते हुए और अयोध्या को अनाथ [होते हुए] देखकर सब लोग व्याकुल होकर उनके साथ हो लिये। कृपासिंधु श्रीरामजी उन्हें बहुत तरह से समझाते हैं, तो वे [अयोध्या की ओर] लौट जाते हैं; परन्तु प्रेमवश फिर लौट आते हैं।
घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता॥ बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोबर देखि न जाहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
घर श्मशान, कुटुम्बी भूत-प्रेत और पुत्र, हितैषी और मित्र मानो यमराज के दूत हैं। बगीचों में वृक्ष और बेलें कुम्हला रही हैं। नदी और तालाब ऐसे भयानक लगते हैं कि उनकी ओर देखा भी नहीं जाता।
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े॥ नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी के वियोग में सभी व्याकुल हुए जहाँ-तहाँ [ऐसे चुपचाप स्थिर होकर] खड़े हैं, मानो तसवीरों में लिखकर बनाये हुए हैं। नगर मानो फलों से परिपूर्ण बड़ा भारी सघन वन था। नगर निवासी सब स्त्री-पुरुष बहुत-से पशु-पक्षी थे। (अर्थात् अवधपुरी अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों को देने वाली नगरी थी और सब स्त्री-पुरुष सुख से उन फलों को प्राप्त करते थे।)
सबहिं बिचारु कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं॥ जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू॥ ३ ॥
अर्थ:
सब ने मन में विचार कर लिया कि श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी के बिना सुख नहीं है। जहाँ श्रीरामजी रहेंगे, वहीं सारा समाज रहेगा। श्रीरामचन्द्रजी के बिना अयोध्या में हम लोगों का कुछ काम नहीं है।
चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई॥ राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही॥ ४ ॥
अर्थ:
ऐसा विचार दृढ़ करके देवताओं को भी दुर्लभ सुखों से पूर्ण घरों को छोड़कर सब श्रीरामचन्द्रजी के साथ चल पड़े। जिनको श्रीरामजी के चरणकमल प्रिय हैं, उन्हें क्या कभी विषयभोग वश में कर सकते हैं।
रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी॥ करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई॥ १ ॥
अर्थ:
प्रजा को प्रेमवश देखकर श्रीरघुनाथजी के दयालु हृदय में बड़ा दुःख हुआ। प्रभु श्रीरघुनाथजी करुणामय हैं। परायी पीड़ा को वे तुरंत पा जाते हैं (अर्थात् दूसरे का दुःख देखकर वे तुरंत स्वयं दुःखित हो जाते हैं)।
जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती॥ खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता॥ ४ ॥
अर्थ:
जब दो पहर रात बीत गयी, तब श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेमपूर्वक मन्त्री सुमन्त्र से कहा—हे तात! रथ के खोज मारकर (अर्थात् पहियों के चिह्नों से दिशा का पता न चले इस प्रकार) रथ को हाँकिये। और किसी उपाय से बात नहीं बनेगी।
निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना॥ जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा॥ ३ ॥
अर्थ:
वे लोग अपनी निन्दा करते हैं और मछलियों की सराहना करते हैं। [कहते हैं--] श्रीरामचन्द्रजी के बिना हमारे जीने को धिक्कार है। विधाता ने यदि प्यारे का वियोग ही रचा, तो फिर उसने माँगने पर मृत्यु क्यों नहीं दी!।
एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा॥ बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना॥ ४ ॥
अर्थ:
इस प्रकार बहुत-से प्रलाप करते हुए वे सन्ताप से भरे हुए अयोध्याजी में आये। उन लोगों के विषम वियोग की दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता। [चौदह साल की] अवधि की आशा से ही वे प्राणों को रख रहे हैं।