श्रीराम-दशरथ-संवाद, अवधवासियों का विषाद, कैकेयी को समझाना
श्रीरामजी व्याकुल दशरथ को सांत्वना देते हैं, पर अयोध्या का हृदय विषाद से भर उठता है। नगरवासी और परिवारजन कैकेयी को समझाने का प्रयत्न करते हैं, किंतु उसका निश्चय नहीं बदलता।
अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ७ / ४९
प्रकरण पाठ
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी॥ आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी॥ ४ ॥
अर्थ:
फिर महादेवजी का स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं--हे सदाशिव! आप मेरी विनती सुनिये। आप आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होनेवाले) और अवढरदानी (मुँहमाँगा दे डालनेवाले) हैं। अतः मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दुःख को दूर कीजिये।
अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला॥ रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी॥ २ ॥
अर्थ:
राजा मन ही मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं। उनका मन पीपल के पत्ते की तरह डोल रहा है। श्रीरघुनाथजी ने पिता को प्रेम के वश जानकर और यह अनुमान करके कि माता फिर कुछ कहेगी [तो पिताजी को दुःख होगा]--
अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा॥ देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता॥ ४ ॥
अर्थ:
इस अत्यन्त तुच्छ बात के लिये आपने इतना दुःख पाया। मुझे किसी ने पहले कहकर यह बात नहीं जनायी। स्वामी (आप) को इस दशा में देखकर मैंने माता से पूछा। उनसे सारा प्रसंग सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गये (मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई)।
धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू॥ चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें॥ १ ॥
अर्थ:
इस पृथ्वीतल पर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिता को परम आनन्द हो। जिसको माता-पिता प्राणों के समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) उसके करतलगत (मुट्ठी में) रहते हैं।
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बस उतरु न दीन्हा॥ नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी॥ ३ ॥
अर्थ:
ऐसा कहकर तब श्रीरामचन्द्रजी वहाँ से चल दिये। राजा ने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया। वह बहुत ही तीखी (अप्रिय) बात नगर भर में इतनी जल्दी फैल गयी मानो डंक मारते ही बिच्छू का विष सारे शरीर में चढ़ गया हो।
सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी॥ जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई॥ ४ ॥
अर्थ:
इस बात को सुनकर सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गये जैसे दावानल देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहाँ सुनता है वह वहीं सिर धुनने लगता है। बड़ा विषाद है, किसी को धीरज नहीं बँधता।
जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु॥ एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने॥ २ ॥
अर्थ:
जो हठ करके (कैकेयी की बात को पूरा करने में अड़े रहकर) स्वयं सब दुःखों के पात्र हो गए। स्त्री के वश होने के कारण मानो उसका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक (दूसरे) जो धर्म की मर्यादा को जानते हैं और सयाने हैं, वे राजा को दोष नहीं देते।
भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना॥ करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू॥ ३ ॥
अर्थ:
[वे कहती हैं—] तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्रीरामचन्द्र के समान मुझे भरत भी प्यारे नहीं हैं; यह बात सारा जगत जानता है। श्रीरामचन्द्रजी पर तो तुम सहज ही स्नेह करती रही हो। आज किस अपराध से उन्हें वन दे रही हो?
सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम। राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम॥ ४९ ॥
अर्थ:
क्या सीताजी अपने प्रिय के साथ छोड़ देंगी? क्या लक्ष्मणजी घर में रहेंगे? क्या भरत जी अयोध्या के नगर का राज्य भोगेंगे? और क्या राजा श्रीराम के बिना जीवित रहेंगे? (अर्थात न सीताजी यहाँ रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे, न भरतजी राज्य करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे; सब उजाड़ हो जाएगा)।
नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे॥ गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी राज्य के भूखे नहीं हैं। वे धर्म की धुरी को धारण करने वाले और विषय-रस से रूखे हैं (अर्थात उनमें विषयासक्ति है ही नहीं)। [इसलिए तुम यह शंका न करो कि श्रीराम वन न गए तो भरत के राज्य में विघ्न करेंगे; इतने पर भी मन न माने तो] तुम राजा से दूसरा ऐसा वर ले लो कि श्रीराम घर छोड़कर गुरु के घर रहें।
जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही। हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥ जिमिभानुबिनुदिनुप्रानबिनु तनुचंदबिनुजिमि जामिनी। तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी॥
अर्थ:
जिस तरह [नगर भर का] शोक और [तुम्हारा] कलंक मिटे, वही उपाय करके कुल की रक्षा कर। हठ करके राम को वन जाते हुए लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं—जैसे सूर्य के बिना दिन, प्राण के बिना शरीर और चन्द्रमा के बिना रात [निर्जीव तथा शोभाहीन हो जाती है], वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी के बिना अयोध्या हो जाएगी; हे भामिनी! तू अपने हृदय में इस बात को समझ (विचार कर देख) तो सही॥
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी॥ ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी॥ १ ॥
अर्थ:
कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दुःसह क्रोध के मारे रूखी (बेमुरव्वत) हो रही है। ऐसे देखती है मानो भूखी बाघिन हरिनियों को देख रही हो। तब सखियों ने रोग को असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसे मंदबुद्धि, अभागिनी कहती हुई चल दीं।
राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई॥ एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं॥ २ ॥
अर्थ:
राज्य करते हुए इस कैकेयी को दैव ने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा! नगर के स्त्री-पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयी को करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं।
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा॥ बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी॥ ३ ॥
अर्थ:
लोग विषम ज्वर से जल रहे हैं। लंबी साँसें लेते हुए वे कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के बिना जीने की कौन-सी आशा है? महान् वियोग की आशंका से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गई है मानो पानी सूख जाने पर जलचर जीवों का समुदाय व्याकुल हो।
अति बिषाद बस लोग लोगाईं। गए मातु पहिं रामु गोसाईं॥ मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ॥ ४ ॥
अर्थ:
सभी पुरुष और स्त्रियाँ अत्यन्त विषाद के वश हो रहे हैं। स्वामी श्रीरामचन्द्रजी माता कौसल्या के पास गये। उनका मुख प्रसन्न है और चित्त में चौगुना चाव है। यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रोक न लें।