श्रीराम-दशरथ-संवाद, अवधवासियों का विषाद, कैकेयी को समझाना

श्रीरामजी व्याकुल दशरथ को सांत्वना देते हैं, पर अयोध्या का हृदय विषाद से भर उठता है। नगरवासी और परिवारजन कैकेयी को समझाने का प्रयत्न करते हैं, किंतु उसका निश्चय नहीं बदलता।

अयोध्याकाण्ड · प्रकरण ७ / ४९

प्रकरण पाठ

चौपाई

अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे॥ सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे॥ १ ॥

अर्थ:

जब राजा ने सुना कि श्रीरामचन्द्र पधारे हैं तो उन्होंने धीरज धर के नेत्र खोले। मन्त्री ने सँभालकर राजा को बैठाया। राजा ने श्रीरामचन्द्रजी को अपने चरणों में पड़ते (प्रणाम करते) देखा।

चौपाई

लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई॥ रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू॥ २ ॥

अर्थ:

स्नेह से विकल राजा ने रामजी को हृदय से लगा लिया। मानो साँप ने अपनी खोयी हुई मणि फिर पा ली हो। राजा दशरथजी श्रीरामजी को देखते ही रह गये। उनके नेत्रों से आँसुओं की धारा बह चली।

चौपाई

सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहि बारा॥ बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

शोक के विशेष वश होने के कारण राजा कुछ कह नहीं सकते। वे बार-बार श्रीरामचन्द्रजी को हृदय से लगाते हैं और मन में ब्रह्माजी को मनाते हैं कि जिससे श्रीरघुनाथजी वन को न जायँ।

चौपाई

सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी॥ आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर महादेवजी का स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं--हे सदाशिव! आप मेरी विनती सुनिये। आप आशुतोष (शीघ्र प्रसन्न होनेवाले) और अवढरदानी (मुँहमाँगा दे डालनेवाले) हैं। अतः मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दुःख को दूर कीजिये।

दोहा

तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु। बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु॥ ४४ ॥

अर्थ:

आप प्रेरकरूप से सब के हृदय में हैं। आप श्रीरामचन्द्र को ऐसी बुद्धि दीजिये जिससे वे मेरे वचन को त्यागकर और शील-स्नेह को छोड़कर घर ही में रह जायँ।

दोहा 45 के अंतर्गत
चौपाई

अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ॥ सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही॥ १ ॥

अर्थ:

जगत में चाहे अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाय। चाहे मैं नरक में गिरूँ, अथवा स्वर्ग चला जाऊँ। और भी सब प्रकार के दुःसह दुःख आप मुझसे सहन करा लें। पर श्रीरामचन्द्र मेरी आँखों की ओट न हों।

चौपाई

अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला॥ रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी॥ २ ॥

अर्थ:

राजा मन ही मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं। उनका मन पीपल के पत्ते की तरह डोल रहा है। श्रीरघुनाथजी ने पिता को प्रेम के वश जानकर और यह अनुमान करके कि माता फिर कुछ कहेगी [तो पिताजी को दुःख होगा]--

चौपाई

देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी॥ तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई॥ ३ ॥

अर्थ:

देश, काल और अवसर के अनुकूल विचारकर विनीत वचन कहे-हे तात! मैं कुछ कहता हूँ, यह ढिठाई करता हूँ। इस अनौचित्य को मेरी बाल्यावस्था समझकर क्षमा कीजियेगा।

चौपाई

अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा॥ देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता॥ ४ ॥

अर्थ:

इस अत्यन्त तुच्छ बात के लिये आपने इतना दुःख पाया। मुझे किसी ने पहले कहकर यह बात नहीं जनायी। स्वामी (आप) को इस दशा में देखकर मैंने माता से पूछा। उनसे सारा प्रसंग सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गये (मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई)।

दोहा

मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात। आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात॥ ४५ ॥

अर्थ:

हे पिताजी! इस मंगल समय स्नेहवश होकर सोच करना छोड़ दीजिये और हृदय में हर्षित होकर मुझे आज्ञा दीजिये। यह कहते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के सर्वांग पुलकित हो गये।

दोहा 46 के अंतर्गत
चौपाई

धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू॥ चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें॥ १ ॥

अर्थ:

इस पृथ्वीतल पर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिता को परम आनन्द हो। जिसको माता-पिता प्राणों के समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) उसके करतलगत (मुट्ठी में) रहते हैं।

चौपाई

आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई॥ बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी॥ २ ॥

अर्थ:

आप की आज्ञा पालि करके और जन्म का फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊँगा, अतः कृपया आज्ञा दीजिये। माता से विदा माँग आता हूँ। फिर आपके पैर लगकर (प्रणाम करके) वन को चलूँगा।

चौपाई

अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बस उतरु न दीन्हा॥ नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी॥ ३ ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर तब श्रीरामचन्द्रजी वहाँ से चल दिये। राजा ने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया। वह बहुत ही तीखी (अप्रिय) बात नगर भर में इतनी जल्दी फैल गयी मानो डंक मारते ही बिच्छू का विष सारे शरीर में चढ़ गया हो।

चौपाई

सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी॥ जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई॥ ४ ॥

अर्थ:

इस बात को सुनकर सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गये जैसे दावानल देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहाँ सुनता है वह वहीं सिर धुनने लगता है। बड़ा विषाद है, किसी को धीरज नहीं बँधता।

दोहा

मुख सुखाहिं लोचन स्रवहिं सोकु न हृदयँ समाइ। मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ॥ ४६ ॥

अर्थ:

सबके मुख सूखे जाते हैं, आँखों से आँसू बहते हैं, शोक हृदय में नहीं समाता। मानो करुण रस की सेना अवध पर डंका बजाकर उतर आयी हो।

दोहा 47 के अंतर्गत
चौपाई

मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकइहि गारी॥ एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ॥ १ ॥

अर्थ:

सब मेल मिल गये थे (सब संयोग ठीक हो गये थे), इतने में ही विधाता ने बात बिगाड़ दी! जहाँ-तहाँ लोग कैकेयी को गाली दे रहे हैं! इस पापिनी को क्या सूझ पड़ा जो इसने छाए भवन पर आग रख दी।

चौपाई

निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा॥ कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी॥ २ ॥

अर्थ:

यह अपने हाथ से अपनी आँखें निकालकर देखना चाहती है, और अमृत फेंककर विष चखना चाहती है! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेयी रघुवंश रूपी बाँस के वन के लिये अग्नि हो गयी!

चौपाई

पालव बैठि पेड़ एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा॥ सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना॥ ३ ॥

अर्थ:

पत्ते पर बैठकर इसने पेड़ को काट डाला। सुख में शोक का ठाट धर ठटा दिया। श्रीरामचन्द्रजी इसे सदा प्राणों के समान प्रिय थे। फिर भी न जाने किस कारण इसने यह कुटिलता ठानी।

चौपाई

सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ॥ निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई॥ ४ ॥

अर्थ:

कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्री का स्वभाव सब प्रकार से पकड़ में न आने योग्य अथाह और भेदभरा होता है। अपनी परछाईं भले ही पकड़ जाय, पर भाई। स्त्रियों की गति (चाल) नहीं जानी जाती।

दोहा

काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ। का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ॥ ४७ ॥

अर्थ:

आग क्या नहीं जला सकती! समुद्र में क्या नहीं समा सकता! अबला कहानेवाली प्रबल स्त्री [जाति] क्या नहीं कर सकती! और जगत में काल किसको नहीं खाता!

दोहा 48 के अंतर्गत
चौपाई

का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा॥ एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

विधाता ने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब वह क्या दिखाना चाहता है! एक कहते हैं कि राजा ने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकयी को विचार कर वर नहीं दिया।

चौपाई

जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु॥ एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने॥ २ ॥

अर्थ:

जो हठ करके (कैकेयी की बात को पूरा करने में अड़े रहकर) स्वयं सब दुःखों के पात्र हो गए। स्त्री के वश होने के कारण मानो उसका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक (दूसरे) जो धर्म की मर्यादा को जानते हैं और सयाने हैं, वे राजा को दोष नहीं देते।

चौपाई

सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी॥ एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

वे शिबि, दधीचि और हरिचंद्र की कहानी एक-एक से कहकर बखानते हैं। एक भरत जी की सम्मति बताते हैं। एक उदास भाव से सुनकर रह जाते हैं।

चौपाई

कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा॥ सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे॥ ४ ॥

अर्थ:

कोई कान मूँदकर और दाँतों से जीभ पकड़कर कहते हैं कि यह बात झूठ है। ऐसा कहने से तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जाएंगे। भरत जी को तो श्रीरामचन्द्रजी प्राणों के समान प्यारे हैं।

दोहा

चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल। सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल॥ ४८ ॥

अर्थ:

चन्द्रमा चाहे [शीतल किरणों की जगह] आग की चिनगारियाँ बरसाने लगे और अमृत चाहे विष के समान हो जाए, परन्तु भरत जी स्वप्न में भी कभी श्रीरामचन्द्रजी के विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे।

दोहा 49 के अंतर्गत
चौपाई

एक बिधातहि दूषनु देहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं॥ खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू॥ १ ॥

अर्थ:

कोई एक विधाता को दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगर भर में खलबली मच गई, सब किसी को सोच हो गया। हृदय में दुःसह दाह हो गया, आनन्द-उत्साह मिट गया।

चौपाई

बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकई केरी॥ लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही॥ २ ॥

अर्थ:

ब्राह्मणों की स्त्रियाँ, कुल की माननीय बड़ी-बूढ़ी और जो कैकेयी की परम प्रिय थीं, वे उसके शील की सराहना करके उसे सीख देने लगीं। पर उसके वचन बाण के समान लगते हैं।

चौपाई

भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना॥ करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू॥ ३ ॥

अर्थ:

[वे कहती हैं—] तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्रीरामचन्द्र के समान मुझे भरत भी प्यारे नहीं हैं; यह बात सारा जगत जानता है। श्रीरामचन्द्रजी पर तो तुम सहज ही स्नेह करती रही हो। आज किस अपराध से उन्हें वन दे रही हो?

चौपाई

कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू॥ कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा॥ ४ ॥

अर्थ:

तुमने कभी सौतिया डाह नहीं किया। सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वास को जानता है। अब कौसल्या ने तुम्हारा कौन-सा बिगाड़ किया, जिसके कारण तुमने सारे नगर पर वज्र गिरा दिया।

दोहा

सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम। राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम॥ ४९ ॥

अर्थ:

क्या सीताजी अपने प्रिय के साथ छोड़ देंगी? क्या लक्ष्मणजी घर में रहेंगे? क्या भरत जी अयोध्या के नगर का राज्य भोगेंगे? और क्या राजा श्रीराम के बिना जीवित रहेंगे? (अर्थात न सीताजी यहाँ रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे, न भरतजी राज्य करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे; सब उजाड़ हो जाएगा)।

दोहा 50 के अंतर्गत
चौपाई

अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू॥ भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू॥ १ ॥

अर्थ:

हृदय में ऐसा विचार कर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलंक की कोठी मत बनो। भरत को अवश्य युवराज पद दो, पर श्रीरामचन्द्रजी का वन में क्या काम है!

चौपाई

नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे॥ गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी राज्य के भूखे नहीं हैं। वे धर्म की धुरी को धारण करने वाले और विषय-रस से रूखे हैं (अर्थात उनमें विषयासक्ति है ही नहीं)। [इसलिए तुम यह शंका न करो कि श्रीराम वन न गए तो भरत के राज्य में विघ्न करेंगे; इतने पर भी मन न माने तो] तुम राजा से दूसरा ऐसा वर ले लो कि श्रीराम घर छोड़कर गुरु के घर रहें।

चौपाई

जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे॥ जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई॥ ३ ॥

अर्थ:

जो तुम हमारे कहने पर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी न लगेगा। यदि तुमने कुछ हँसी की हो तो उसे प्रकट में कहकर जना दो [कि मैंने दिल्लगी की है]।

चौपाई

राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू॥ उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीराम के समान पुत्र क्या वन के योग्य है? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे! जल्दी उठो और वही उपाय करो जिससे इस शोक और कलंक का नाश हो।

छन्द

जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही। हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥ जिमिभानुबिनुदिनुप्रानबिनु तनुचंदबिनुजिमि जामिनी। तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी॥

अर्थ:

जिस तरह [नगर भर का] शोक और [तुम्हारा] कलंक मिटे, वही उपाय करके कुल की रक्षा कर। हठ करके राम को वन जाते हुए लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं—जैसे सूर्य के बिना दिन, प्राण के बिना शरीर और चन्द्रमा के बिना रात [निर्जीव तथा शोभाहीन हो जाती है], वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी के बिना अयोध्या हो जाएगी; हे भामिनी! तू अपने हृदय में इस बात को समझ (विचार कर देख) तो सही॥

सोरठा

सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित। तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥ ५० ॥

अर्थ:

इस प्रकार सखियों ने ऐसी सीख दी जो सुनने में मीठी और परिणाम में हितकारी थी। पर कुटिला कुबरी की सिखायी-पढ़ायी हुई कैकेयी ने इस पर जरा भी कान नहीं दिया।

दोहा 51 के अंतर्गत
चौपाई

उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी॥ ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी॥ १ ॥

अर्थ:

कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दुःसह क्रोध के मारे रूखी (बेमुरव्वत) हो रही है। ऐसे देखती है मानो भूखी बाघिन हरिनियों को देख रही हो। तब सखियों ने रोग को असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसे मंदबुद्धि, अभागिनी कहती हुई चल दीं।

चौपाई

राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई॥ एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं॥ २ ॥

अर्थ:

राज्य करते हुए इस कैकेयी को दैव ने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा! नगर के स्त्री-पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयी को करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं।

चौपाई

जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा॥ बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी॥ ३ ॥

अर्थ:

लोग विषम ज्वर से जल रहे हैं। लंबी साँसें लेते हुए वे कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के बिना जीने की कौन-सी आशा है? महान् वियोग की आशंका से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गई है मानो पानी सूख जाने पर जलचर जीवों का समुदाय व्याकुल हो।

चौपाई

अति बिषाद बस लोग लोगाईं। गए मातु पहिं रामु गोसाईं॥ मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

सभी पुरुष और स्त्रियाँ अत्यन्त विषाद के वश हो रहे हैं। स्वामी श्रीरामचन्द्रजी माता कौसल्या के पास गये। उनका मुख प्रसन्न है और चित्त में चौगुना चाव है। यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रोक न लें।

दोहा

नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान। छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान॥ ५१ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी का मन नये पकड़े हुए हाथी के समान और राजतिलक उस हाथी को बाँधने की काँटेदार लोहे की बेड़ी के समान है। “वन जाना है' यह सुनकर, अपने को बन्धन से छूटा जानकर, उनके हृदय में आनन्द बढ़ गया है।